अशोक प्रियदर्शी
जिन क्षेत्रों में बाहुबलियों का बोलवाला बड़ा है उन क्षेत्रों में से लड़वइया दूर होने लगे हैं। लिहाजा, लड़वइया का अकाल पड़ने लगा है। नवादा जिले के वारिसलीगंज और हिसुआ विधानसभा की तस्वीर कुछ ऐसी है। हिंसाग्रस्त वारिसलीगंज में आठ और हिसुआ में नौ प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। जबकि नवादा, गोविंदपुर और रजौली सुरक्षित में 12 प्रत्याशी हैं। वारिसलीगंज विधानसभा से बाहुबली अशोक महतो के सहयोगी रहे प्रदीप कुमार जदयू से हैं, जबकि बाहुबली अखिलेश सिंह की पत्नी अरूणा देवी भाजपा से उम्मीदवार हैं। बाकी साधारण पृष्ठभूमि के प्रत्याशी हैं।
फिलहाल, प्रदीप कुमार वारिसीगंज एमएलए हैं। प्रदीप के पहले अरूणा देवी एमएलए थीं। विदित है कि करीब एक दशक तक वारिसलीगंज जातीय नरसंहार के कारण सुर्खियों में रहा था। इस दौरान करीब 200 लोगों की हत्या हुई थी। इस जातीय नरसंहार का आरोप अखिलेश सिंह और अशोक महतो पर है। प्रदीप के खिलाफ आठ और अखिलेश पर दर्जन से अधिक गंभीर मुकदमा है। अरूणा पर भी मामले दर्ज हैं। लिहाजा, दो बाहुबली चेहरे के सामने आने से पार्टी कार्यकर्ता चुनाव से विमुख होते जा रहे हैं।

देखें तो स्थिति और भी स्पष्ट हो जाती है। फरवरी 2005 के चुनाव में हिसुआ में 19 और वारिसलीगंज में 14 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे। जबकि गोविंदपुर में 15, रजौली में 12 और नवादा में 21 लोग चुनावी मैदान में थे। वहीं अक्तूबर 2005 में हिसुआ में सात और वारिसलीगंज में 14 प्रत्याशी जबकि रजौली में 10, गोविंदपुर में 9 और नवादा में 19 प्रत्याशी थे। 2010 के चुनाव में हिसुआ और वारिसलीगंज में 13-13 प्रत्याशी थे। लेकिन गोविंदपुर में 14, रजौली में 12 और नवादा में 16 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे।
लेकिन इस दफा बाहुबलियों के क्षेत्र में प्रत्याशियों ने दिलचस्पी कम कर दिया है। वरिष्ठ साहित्यकार रामरतन प्रसाद रत्नाकर कहते हैं कि जब से राजनीतिक दलों ने बाहुबलियों को गले लगाना शुरू किया है तब से राजनैतिक कार्यकर्ताओं की रूचि घट गई है। बाहुबलियों के खिलाफ राजनैतिक कार्यकर्ताओं नही टिक पाते हैं।
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