जहानाबाद जिले के सिकरिया गांव के शिवभजन सिंह के पास एक बीघा से भी कम जमीन थी. मकान जर्जर था फिर भी उसने हथियारों को तवज्जो दी, उसने बीवी के गहने बेचकर राइफल खरीदी. ऐसा करने वाला वह बिहार के नक्सल प्रभावित गांव का अकव्ला शख्स नहीं था. ढाई दर्जन ग्रामीणों ने कमजोर आर्थिक हैसियत के बावजूद राइफल और बंदूकें खरीदी थी.
ग्रामीणों के सामने ऐसी स्थिति मजदूरी के विवाद को लेकर मजदूरों और किसानों के बीच शुरू हुए खूनी संघर्ष से पैदा हुई थीं. लेकिन हथियारों के प्रति ग्रामीणों का लगाव तब तक दिखा जब तक ग्रामीणों में असुरक्षा का भाव था. 21 जनवरी, 2006 को सिकरिया में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 'आपकी सरकार, आपके द्वार' कार्यक्रम की शुरुआत की तब से गांव की दशा-दिशा ही बदल गई है. उसके बाद हत्या की घटनाएं घटी ही नहीं.
गांव में सैप जवानों को तैनात किया गया था लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण यह कि पंचायत में समग्र विकास की योजनाएं शुरू की गईं. इससे मजदूरों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ने के साथ ही किसानों के लिए आय के कई विकल्प भी खुल गए.
कड़ौना हाल्ट से सिकरिया तक चौड़ी सड़कों का निर्माण किया गया. गांव में आधुनिक मार्केट कॉम्प्लेक्स का निर्माण हुआ जिसमें पंचायत भवन, अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ केंद्र, प्रशासनिक भवन, ग्रामीण बैंक, किसान भवन, वसुधा केंद्र, ग्रामीण ज्ञान केंद्र, कंप्यूटर ट्रेनिंग सेंटर आदि का निर्माण कराया गया.
नालियों और गलियों का विकास किया गया. गांव में प्राइमरी से इंटर तक शिक्षा की व्यवस्था की गई. इतना ही नहीं, सिकरिया पहली पंचायत है जिसकी अपनी वेबसाइट बनाई गई है.
यही नहीं, बदले की भावना में जीने वाले ग्रामीण विकास कार्यों में दिलचस्पी दिखाने लगे हैं. अपनों के खोने के गम में उलझी महिलाएं 11 स्वयं सहायता समूहों का गठन कर चुकी हैं. खास यह कि रामप्रवेश सिंह और धर्मराज सिंह की हत्या से खूनी दौर शुरू हुआ था, लेकिन उन दोनों के बेटों ने सेना में रोजगार हासिल कर सिकरिया के बदलाव की तस्वीर पेश की है. जहानाबाद के जिलाधिकारी बाला मुरगन डी बताते हैं, ''खेती, शिक्षा और रोजगार के लिए जरूरतमंद ग्रामीणों को आर्थिक मदद भी मिलेगी.''
जब 21 जनवरी, 2011 को मुख्यमंत्री दोबारा सिकरिया पहुंचे तो उन्हें गांव के बदलाव पर ताज्जुब हुआ. इस बार मुख्यमंत्री के सामने ग्रामीण पहली बार की तरह सुरक्षा की चिंता नहीं कर रहे थे बल्कि शिक्षकों की गैर-मौजूदगी, कंप्यूटर सेंटर में विस्तार और बिजली में सुधार की ओर ध्यान दिला रहे थे.
दरअसल, यहां खूनी संघर्ष की कहानी उस दिन से शुरू हुई जब उत्तर प्रदेश के आगरा के मजदूर नेता डॉ विनियन जेपी आंदोलन में भाग लेने बिहार आए थे. वे 1978 को सिकरिया पहुंचे और मजदूरों के पक्ष में खड़े हो गए. अगले साल डॉ. विनियन और गांव के पूर्व प्रखंड प्रमुख जंगबहादुर सिंह ने मजदूर किसान संग्राम समिति का गठन किया.
इसके जवाब में किसानों ने भूमि सेना का दामन थामा. तब भूमि सेना को पराजित करने के लिए समिति ने लिबरेशन से हाथ मिला लिया. लिहाजा, किसानों और मजदूरों के नाम पर संगठनों के वर्चस्व की लड़ाई प्रारंभ हो गई, जिसके कारण मध्य बिहार में सामूहिक नरसंहार की 50 से ज्यादा घटनाएं घटीं. अकव्ले सिकरिया गांव में क्रमवार तरीके से 34 लोगों की हत्या कर दी गई. लिहाजा, ग्रामीणों के समक्ष हथियार के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं था. बाद में नक्सलियों ने ग्रामीणों के सारे हथियार भी लूट लिए थे.
सिकरिया ही नहीं, जहानाबाद के सेवनन, मांदेविगहा, जामुक, भवानीचक, सुरंगापुर पंचायतों को विकसित किया जा रहा है. पटना, गया, जहानाबाद, रोहतास, मुंगेर, पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण और अरवल जिले के 65 पंचायतों में सिकरिया मॉडल को लागू करने के प्रयास हो रहे हैं.
सरकार की कोशिश है कि नक्सल प्रभावित इलाकों के विकास के साथ ग्रामीणों की क्षमताओं में इजाफा भी हो. सरकार डीएम और एसपी के समन्वय से काम करने का प्रयास कर रही है. इसी समन्वय से सिकरिया देश के आदर्श गांव के रूप में उभरकर सामने आया है. डीएम विकास कार्य चलाएं और एसपी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए पदाधिकारियों को सुरक्षा प्रदान कराएं.
बहरहाल, मुंगेर के धरहरा प्रखंड के कसैली में नक्सलियों के जरिए छह ग्रामीणों की हत्या और ग्यारह लोगों को अगवा करने की घटना '80 के दशक में मामूली कारणों से सिकरिया में शुरू हुई हत्या की घटनाओं की ताजा कड़ी है. लिहाजा, सिकरिया मॉडल का यहीं अंत नहीं होता. ग्रामीणों की जीजिविषा को कायम रखना और सिकरिया की तर्ज पर नक्सल प्रभावित दूसरे गांवों को विकास की पटरी पर लाना सरकार और प्रशासन के लिए अब भी सबसे बड़ी चुनौती है.
http://aajtak.intoday.in/index.php?option=com_content&task=view&id=59948§ionid=66 |