Thursday, 7 April 2016

बिहार: बेटियों ने दिखा दिया अपना दम

Monday, 4 April 2016

जिस कुष्ठ अस्पताल में रोगी बनकर आये थे रामप्रवेश, अब उसी के भरोसे कुष्ठ अस्पताल की जिम्मेवारी


अशोक प्रियदर्शी
बात 40 साल पहले की है। बिहार के नालंदा जिले के कंचनपुर निवासी रामप्रवेश प्रसाद कुष्ठ रोगी था। कई जगह इलाज के बाद हार गए थे। उनसे गांव समाज के लोग छुआछूत करते थे। तभी एक परिचित ने उन्हें बताया था कि नवादा जिले के कौआकोल प्रखंड के कपसिया कुष्ठ अस्पताल में कुष्ठ रोगियों का इलाज किया जाता है। तब रामप्रवेश 16 साल के थे। कपसिया कुष्ठ अस्पताल में भर्ती हुए। तीन साल तक इलाज के बाद रामप्रवेश को काफी राहत मिल गई थी। अस्पताल में मुफ्त आवासीय इलाज की व्यवस्था थी। 
         अस्पताल उन्हें मुक्त कर दिया था। लेकिन रामप्रवेश गांव लौटने को राजी नही थे। वह कुष्ठ रोगियों की सेवा करना चाहते थे। लिहाजा, वह चिकित्सक के कामों में हाथ बंटाने लगे। उसने भभुआ गांधी कुष्ठ निवारण प्रतिष्ठान में डेढ़ साल तक ट्रेनिंग भी लिया। तब से वह लगातार कपसिया कुष्ठ अस्पताल में रोगियों की सेवा में जुटे हैं। चिकित्सक चन्द्रशेखर मिश्र की आकस्मिक निधन हो गया। उसके बाद से रामप्रवेश ही बतौर चिकित्सक रोगियों का इलाज करने लगे। यही नहीं, 2003 में जब भारत सरकार ने देश में कुष्ठ उन्मूलन की घोषणा कर दी तब से से इस अस्पताल को अनुदान मिलना भी बंद हो गया।
ताज्जुब कि उसके बाद भी रामप्रवेश ने अस्पताल से नाता नही तोड़ा। रामप्रवेश के अलावा जमुई के विष्णुदेव यादव और कौआकोल के नवल मांझी आज भी अस्पताल से जुड़े हैं। रामप्रवेश कहते हैं कि उनके साथ जैसा व्यवहार हुआ, वैसा व्यवहार दूसरे के साथ नही हो। इसलिए कुष्ठ प्रभावितों को सेवा करने में सकून मिलता है।

कुष्ठ रोगी से किया शादी, बच्चे को दिया अच्छा परवरिश
रामप्रवेश ने अस्पताल की एक कुष्ठ रोगी राजो देवी से शादी कर सामाजिक जीवन में भी मिसाल प्रस्तुत किया। परिवार के लोग इस शादी के खिलाफ थे। लेकिन रामप्रवेश ने इसका परवाह नही किया। रामप्रवेश तीन भाइयों में छोटे थे। लेकिन शादी के बाद से परिवार के लोग भी उनसे भेदभाव करने लगे हैं। हालांकि चार साल पहले पत्नी की मौत हो गई। रामप्रवेश को एक पुत्र भी है। उसका स्वस्थ्य लड़की से शादी हुई। पुत्रवधू शिक्षिका हैं। एक पौत्र भी है।

कब खुला था कुष्ठ अस्पताल
  आजादी के समय नवादा, गया, जमुई, लखीसराय, नालंदा, गिरिडीह के सुदूरवर्ती इलाका में कुष्ठ रोगियों की काफी तादाद थी। इसी को ध्यान में रखकर 1955 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने कपसिया में 40 बेड का अस्पताल स्थापित किया था। इसका  तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ राजेन्द्र प्रसाद ने उद्घाटन किया था। कुष्ठ रोगियों के इलाज और जागरूकता के लिए भारत सरकार अनुदान दिया करती थी। लेकिन 2003 से अनुदान बंद कर दिया गया है। 
         उसके बाद जेपी की सामाजिक संस्था ग्राम निर्माण मंडल के सहयोग से यह अस्पताल संचालित किया जा रहा है। संस्था के प्रधान मंत्री अरविंद शर्मा कहते हैं कि आसपास के ग्रामीण इलाका में अब भी कुष्ठ रोग का प्रभाव दिखता है। वेलोग सार्वजनिक तौर पर इलाज नही कराना चाहते। लिहाजा, प्रत्येक साल गुपचुप तरीके से तकरीबन 50 मरीज दाखिल होते हैं। उनका इलाज किया जाता है। यही नहीं, रोगियों को पीएचसी और सदर अस्पताल में इलाज के लिए प्रेरित किया जाता है।
 

ग्वालियर सम्मेलन- डाॅ प्रियदर्शी ने किया बिहार के युवा इतिहासकारों का नेतृत्व, मिला सम्मान




 ग्वालियर में आयोजित युवा इतिहासकारों के राष्ट्रीय सम्मेलन में पत्रकार और एसकेएम काॅलेज नवादा के हिस्ट्री के लेक्चरर डाॅ अशोक कुमार प्रियदर्शी ने दमदार उपस्थिति दर्ज कराई है। इस मौके पर जीवाजी यूनिवर्सिटी के रजिस्टार प्रो आनंद मिश्र और अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के अध्यक्ष व वरिष्ठ इतिहासकार प्रो सतीश चन्द्र मिततल ने डाॅ अशोक प्रियदर्शी को प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया है। गौरतलब हो कि 19-20 मार्च को मध्य प्रदेश के ग्वालियर स्थित जीवाजी यूनिवर्सिटी में युवा इतिहासकारों का दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। इसका आयोजन जीवाजी यूनिवर्सिटी और अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।


      इसमें बिहार से पांच युवा इतिहासकार शामिल हुए थे, जिसका प्रतिनिधित्व डाॅ प्रियदर्शी ने किया। सम्मेलन में डाॅ प्रियदर्शी के अलावा नालंदा से डाॅ हेगोयल, मुजफ्फरपुर से अनामिका ब्रजवंशी, हाजीपुर से वेदवती और वैशाली से डाॅ मनीष सिंह शामिल हुए। बता दें कि दिसंबर 2015 में मैसूर में आयोजित इतिहास पुनर्लेखन सेमिनार में डाॅ प्रियदर्शी ने रेवरा आंदोलन में महिलाओं की भूमिका को रेखांकित किया था। तब डाॅ प्रियदर्शी को बिहार का प्रतिनिधित्व करने का दायित्व दिया गया था।


क्या उठाए सवाल
राष्ट्रीय सम्मेलन में डाॅ प्रियदर्शी ने इतिहास पुनर्लेखन की विसंगतियों पर सवाल उठाया। उन्होंने सवाल किया कि युवा इतिहासकार इन विसंगतियों से उबरकर कैसे जनपथ का इतिहास लेखन कर सकता है। काफी समय बीत चुका है। साक्ष्य भी गुम पड़ रहे हैं। ऐसे में तर्कपूर्ण और प्रमाणिक इतिहास लेखन बढ़ाने के तरीके क्या होंगे। डाॅ प्रियदर्शी ने 1857 के स्वातंत्रता संग्राम में मगध के जवाहिर रजवार और एतवा रजवार की ब्रिट्रिश अधिकारियों की गलत व्याख्या पर सवाल उठाया। डाॅ प्रियदर्शी ने कहा कि जो हमारे नायक थे, उन्हें ब्रिट्रिश अधिकारी डकैत का नाम दे रखा था। लिहाजा, अब भी जवाहिर और एतवा की भूमिका गुमनाम है।









वरिष्ठ इतिहासकार डाॅ मितल का जवाब
डाॅ मितल ने कहा कि स्थानीय स्तर पर जवाहिर और एतवा के बारे में जानकारी हासिल कर बेहतर इतिहास लेखन संभव है। पत्रों और दस्तावेजों के जरिए भी उनके योगदानों के बारे में जानकारी हासिल किया जा सकता है। डाॅ मितल का मानना है कि भारतीय इतिहास लेखन पक्षपातपूर्ण रहा है। ब्रिट्रिश लेखकों ने लेखन में भी भारतीय को नीचा दिखाने की कोशिश की है। जबकि मुगलकालीन लेखकों ने शासकों का पसंदीदा इतिहास लेखन किया। बाद में भारतीय इतिहास लेखन शुरू हुआ लेकिन उसमें राष्ट्रीय चेतना का अभाव है।



कौन है जवाहिर और एतवा
जवाहिर नवादा जिले के नारदीगंज थाना के पसई गांव का रहने वाला था। जबकि एतवा रोह थाना के कर्णपुर गांव का रहनेवाला था। 1857 में जवाहिर और एतवा ने अंग्रेज अधिकारियों और जमींदारों के खिलाफ विद्रोह किया था। अंग्रेजों ने इसे डकैत का नाम दे रखा था, ताकि जवाहिर और एतवा के पक्ष में सामुहिक धु्रवीकरण नही हो।

नारदः संग्रहालयः पूर्वी कला शैली का अद्भूत संगम

डाॅ अशोक कुमार प्रियदर्शी
पत्रकार, संयोजक, विरासत बचाओ अभियान. बिहार 

        दुर्लभ कलाकृतियों और मूर्तियांे के संग्रह को लेकर बिहार के नवादा जिले का नारदः संग्रहालय देश और दुनिया के लिए ख्यातिप्राप्त है। इस संग्रहालय में पुरातत्व कला, मुद्रा, प्राकृतिक इतिहास, अस्त्र-शस्त्र, पांडुलिपियां, भूतत्व और पत्थरकटट्ी की आधुनिक कला की पांच हजार से अधिक कला वस्तुएं संग्रहित है। इसमें मगध बंग शैली की सैकडों मूर्तियां हैं। लिहाजा, इस संग्रहालय को इस्टर्न स्कूल आॅफ आर्ट यानि पूर्वी कला शैली के अध्ययन का प्रमुख केन्द्र माना जाता है। यह संग्रहालय देश विदेश के शोधकर्ताओं की पहली पसंद है।
      छठी शताब्दी से दसवीं शताब्दी तक बिहार और बंगाल में मगघ बंग शैली विकसित हुई थी जिसे पाल सेन कला भी कहा जाता है। मगघ बंग शैली के विकसित रूप के लिए ही इस्टर्न आॅफ आर्ट यानि पूर्वी कला शैली का नाम आया हैं। इस शैली के स्वतंत्र अस्तित्व का विवरण तारानाथ के वृतांत में मिलता हैं। तारानाथ के अनुसार, देवपाल और धर्मपाल नामक पालवंशीय शासकों के समय में धीमान और उसके पुत्र वितपाल ने अनेक मूर्तियां बनाई थी। सलिमपुर अभिलेख में मगघ के एक प्रसिद्ध शिल्पी सोमेश्वर का नाम आया हैं जो इस क्षेत्र की समृद्ध कला परम्परा को इंगित करता हैं ।  
        नवादा नगर के मध्य में अवस्थित नारदः संग्रहालय इसी मगघ बंग शैली का प्रतिनिधित्व करता हैं। यहां इस शैली की सैकड़ों मूर्तियां संग्रहित हैं। जिले के सोनूबिगहा से प्राप्त वासुकी की प्रतिमा, मड़रा से प्राप्त नरसिहं अवतार, मरूई से प्राप्त नटराज और बोधिसत्व की मूतियां कलात्मक और मूर्ति विज्ञान की दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं। जिले के समाय, सिसवां, कोसला, पटवासराय, मरूई, महरावां, बेरमी और नरहट से प्राप्त विष्णु की  मूर्तियां और मकनपुर से प्राप्त जांभल की मूर्ति अति दुलर्भ है। 
       गया जिले के हड़ाही से प्राप्त हिन्दू देवी कंकाली महिषामर्दिनि की प्रतिमा, कुर्किहार से प्राप्त पदमपाणि अवलोकितेष्वर तथा धुरियावां से प्राप्त बौद्विस्ट देवी हारीति की प्रतिमा अदभूत है। हिन्दू साइट से प्राप्त होने पर हिन्दू देवी मंजु़श्री और बौद्धिस्ट साइट से प्राप्त होने पर बोधिसत्व की पुष्टि करता है। संग्रहालय के दीर्घाकक्ष में प्रदर्शित अधिकांश बौद्ध मूर्तियां अभिलेखयुक्त है। इसके कारण मूर्तियों का विशेष महत्व है। यह संग्रहालय पूर्वी कला शैली पर अध्ययन करने वालों के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना की पढाई शुरू करने वालों को अक्षर ज्ञान की जरूरत होती है। वरना इस संग्रहालय के मूर्तियां के अध्ययन के बिना पूर्वी कला शैली पर किए गए शोध को अधूरा माना जाएगा।
         नवादा के समाय से प्राप्त हरिहर की प्रतिमा शैव और वैणव धर्म की एकता का प्रतिनिधित्व करता हैं। अतौआ, छतिहर और बेरमी से प्राप्त सूर्य की प्रतिमा पुरातत्व की दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। सूर्य की प्रतिमा की खासियत है की उनके पैर में जूते हैं। हिन्दू धर्म में सूर्य के पैर में जूते के बारे में धार्मिक मान्यता है कि भगवान सूर्य के खाली पैर देखने से अनिष्ट होता हैं। लिहाजा, पैर में जूता पहनाया गया है। 
      पालकाल में गया, नवादा और नांलदा का इलाका मूर्तियों के विकास का स्वर्णिम काल था। इस क्षेत्र में मगध बंग शैली की मूर्तियां काफी संख्या में मिलती रही है। कुर्किहार में काफी संख्या में इस शैली की मूर्तियां मिली है, जो नवादा, पटना और कोलकाता समेत अनेक संग्रहालय में संरक्षित है। संभव है  कुर्किहार और इसके आसपास के क्षेत्र में कई शिल्पकार मूर्तियों का निर्माण करते थे। लिहाजा, इस क्षेत्र से बडी संख्या में वैष्णव, शैव, बौद्ध और जैन धर्म से जुड़ी मूर्तियां मिलती है।
        बता दें कि दुर्लभ कलावस्तुओं के संग्रह के लिए ख्यात नारदः संग्रहालय की स्थापना नवादा जिले के पहले जिलाधिकारी नरेन्द्र पाल सिंह के प्रयास से संभव हुआ था. उन्होंने बिखरी पड़ी मूर्तियों, पाण्डुलिपियों और कलाकृतियों को 1973 में एक टीन के सेड में संग्रह करने का काम शुरू किया था। जन सहयोग से शुरू किए गए संग्रह अभियान से यह संग्रहालय देश के महत्वपूर्ण संग्रहालयों में से एक बन गया है । इसका उदघाटन 2 मई 1974 को बिहार के तत्कालीन राज्यपाल आर डी भंडारी ने किया था।



‘देवता’ को नहीं मिलेगी दारू तो नीतीश को होगी परेशानी

सियासत

  |  3-मिनट में पढ़ें |   01-04-2016
बिहार के कई गांवों में परंपरा रही है कि देवताओं पर प्रसाद के रूप में दारू चढ़ाई जाती है. सदियों से डाकबाबा, गोरैयाबाबा, डीहवाल और मसानबाबा पर देसी दारू चढ़ाने की परंपरा है. लेकिन बिहार में पहली अप्रैल से देसी शराब पर पाबंदी लगा दी गई है. अब अगर देसी शराब उपलब्ध नहीं होगी तो देवताओं पर विदेशी शराब चढ़ा पाना गांववालों के लिए मुश्किल होगा. गांववालों का मानना है कि देवताओं पर दारू नहीं चढ़ पाएगी तो देवता नाराज हो जाएंगे और इसका खामियाजा ग्रामीणों को भुगतना पड़ सकता है.
देवता की नाराजगी और प्रसन्नता का असर तो गांव तक ही सीमित रहेगा, लेकिन अगर देसी शराब की पाबंदी में लापरवाही साबित हुई तो इसका सीधा असर राज्य सरकार पर पड़ेगा. जाहिर तौर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बड़े उदेश्य को लेकर पहले चरण में देसी शराब की बिक्री पर पाबंदी लगाई है. लेकिन इसे सख्ती से लागू नहीं किया गया तो इसका सीधा असर गांव के गरीबों पर पड़ेगा. देसी दारू का सेवन गांव के गरीब लोग करते थे. इनमें वे लोग भी शामिल हैं जो डीहवाल, डाकबाबा, गौरयाबाबा और मसानबाबा पर दारू चढ़ाने में आस्था रखते हैं.
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 पटना के डीएम संजय अग्रवाल देसी शराब की बोतलें नष्ट करते हुए
लेकिन सरकारी घोषणा के बावजूद अवैध तरीके से शराब की बिक्री होगी तो इसका खामियाजा गरीबों को भुगतना पड़ेगा. पहले जो व्यक्ति 30 रूपए की दारू से काम चला लेते थे उन्हें कालाबाजार में कई गुना अधिक राशि खर्च करनी पड़ेगी. यही नहीं, अवैध तरीके से महुआ शराब के निर्माण पर अंकुश नहीं लगाए जाने का असर भी उन सबों पर ही दिखेगा. अवैध शराब से मौत का खतरा विद्यमान रहता है. सरकारी स्तर पर जो कानून बनाए गए हैं, सरकार की लचर कार्यप्रणाली रही तो इसका खामियाजा भी गरीबों को भुगतना पड़ेगा. जेल जाएंगे, सजा होगी. ऐसी स्थिति में दारू बंद करने का श्रेय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जब मिलेगा तब व्यवस्था की लचर कार्यप्रणाली की जवाबदेही भी नीतीश के जिम्मे होगी.
बता दें कि राज्य में हर माह करीब 8232394 लीटर देशी शराब की खपत होती थी. जबकि 3677816 लीटर विदेशी और 3658646 लीटर बियर की खपत होती थी. लेकिन अब देसी शराब पर पाबंदी लगा दी गई है. सरकार ऐसा मान रही है कि देसी दारू पर प्रतिबंध लगाए जाने से ग्रामीणों को काफी राहत मिलेगी. जो गरीब अपनी मजदूरी का आधा हिस्सा दारू में खर्च कर देते थे. उनकी वह राशि बचेगी. महिलाओं पर अत्याचार की घटनाएं थमेंगी. बच्चों की पढ़ाई में मदद मिलेगी. लेकिन जब विफलता होगी तो गरीबों का गुस्सा भी सरकार पर होगा. क्योंकि विफलता की कीमत गरीबों को चुकानी पड़ेगी. जाहिर तौर पर यह गुस्सा नीतीश पर भारी पड़नेवाला है. क्योंकि इनकी आबादी बड़ी है.
इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.कॉम या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

लेखक

अशोक प्रियदर्शीअशोक प्रियदर्शी @ashok.priyadarshi.921
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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सोशल मीडिया पर गाली गलौज का नया वर्जन है 'भक्त' और 'बुद्धिजीवी'


सोशल मीडिया

  |  3-मिनट में पढ़ें |   07-03-2016
'भक्त' शब्द को अंग्रेजी में डिवोटी कहते हैं. उर्दू में मुरीद और संस्कृत में भक्त. इसी तरह 'बुद्धिजीवी' अंग्रेजी में इंटेलेक्च्यूल, उर्दू में अक्लमंद और संस्कृत में ज्ञानात्मन कहे जाते हैं. जाहिर तौर पर भक्त का मतलब भगवान के प्रति अटूट आस्था से है. इसमें तर्क की गुंजाइश नही होती. जबकि बुद्धिजीवी का मतलब विद्धान से है, जो बिना किसी भेदभाव का होता है. लेकिन सोशल मीडिया में भक्त और बुद्धिजीवी गाली गलौज के नए वर्जन के बतौर उभरकर सामने आया है.
ये दोनों शब्द अब एक दूसरे को ठेस पहुंचाने के लिए प्रयोग हो रहे हैं. जेएनयू में देशद्रोही नारे का ही मसला लें. देशद्रोह का आरोपी कन्हैया जेल से जमानत पर रिहा हुआ है. कोर्ट की प्रक्रिया अभी जारी है. लेकिन कन्हैया के पक्ष और विपक्ष में दो मजबूत धरा तैयार है. देखें तो, एक तबका है जो इस मुददे पर बहस के दौरान गाली गलौज के निचले स्तर की भाषा पर उतर जा रहे हैं. इससे अलग एक दूसरा वर्ग है, जो अपेक्षाकृत ज्यादा पढ़ा-लिखा वर्ग माना जाता है. वे लोग बहस के दौरान गली-गलौज की जगह भक्त और बुद्धिजीवी शब्दों का प्रयोग कर एक दूसरे को अपमानित करने की कोशिश करते दिखते हैं.
     यहां समझना जरूरी है कि भक्त और बुद्धिजीवी शब्द इतना अपमानजनक क्यों बन गया है. दरअसल, इन शब्दों को सियासी जुकाम लग गया है. सियासत में हर कोई अपने पक्ष को ही सही ठहराने की कोशिश करता है. सियासत में भक्त का मतलब एनडीए सरकार या फिर पीएम नरेंद्र मोदी के समर्थकों के लिए उपयोग किए जाते हैं. जबकि बुद्धिजीवी का मतलब विपक्षी कांग्रेस और खासकर वामपंथी विचारकों के लिए उपयोग किए जाने लगे हैं. जाहिर तौर पर भक्त और बुद्धिजीवी की कोई सीमा नही है. लेकिन जब दोनों कुतर्क पर उतर जाते हैं तब ऐसे शब्दों का प्रयोग कर चुप करने की कोशिश करते दिखते हैं. ये दोनों शब्द इतना दुर्द पहुंचानेवाला हो गया है कि इन शब्दों के बिना बहस पूरी ही नही होती.
देखें तो, सोशल मीडिया में ऐसे शब्दों का प्रचलन लोकसभा चुनाव के पहले से शुरू हुआ था. तब ये देश के दो बड़े सियासी दल कांग्रेस और भाजपा के नेताओं के लिए प्रयोग किए जाते थे. तब राहुल गांधी के लिए 'पप्पू' और नरेंद्र मोदी के लिए 'फेंकू' शब्द भी सोशल मीडिया पर काफी ट्रेंड हुआ था. तब दोनों ओर के समर्थक फेंकू और पप्पू नाम से एक दूसरे पर प्रहार किया करते थे. लेकिन चुनाव के बाद सियासी बहस में भक्त और बुद्धिजीवि का प्रचलन बढ़ा है.
मुश्किल यह है कि इन दो धरों के अलावा भी एक बड़ा वर्ग है जिसे मध्यमार्गी कह सकते हैं. जो नही किसी का प्रबल समर्थक और नही किसी का प्रबल विरोधी. लेकिन ऐसे शब्दों के कारण उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में पहुंच गई है. वैसे लोग जो इस कट्टरता से अलग विचार रखते हैं. वे अपनी बात को रखने से परहेज करने लगे हैं. क्योंकि इस बहस के बीच आने पर उन्हें भी इन शब्दों के बीच से गुजरना पड़ता है. इसकी पीड़ा अक्सर सोशल मीडिया में ट्रेंड करती दिखती है कि ना ही मैं संघी हूं और ना ही वामपंथी. उनके लिए देश पहले है, पार्टियां बाद में. लेकिन भक्त और बुद्धिजीवी जैसे शब्दों के कारण मध्यमार्गी के जुबान पर ताला लग गया है.
इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.कॉम या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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एक गांव जहां महाशिवरात्रि के दिन होती है स्वामी सहजानंद सरस्वती की पूजा

संस्कृति

  |  3-मिनट में पढ़ें |   07-03-2016
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सोमवार को महाशिवरात्रि है. महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव और पार्वती के विवाह रस्म की जाती है. पूरे देश में महाशिवरात्रि मनाई जाती है. लेकिन इससे इतर बिहार के नवादा जिले के रेवरा गांव में महाशिवरात्रि को किसान आंदोलन के अग्रणी नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती की पूजा अर्चना की जाती है. महाशिवरात्रि के दिन स्वामी सहजानंद सरस्वती का जन्म हुआ था. रेवरावासी मानते हैं कि स्वामीजी का जन्म नही हुआ होता तो न जानें कितने दिनों तक जमींदारों के अत्याचार से गांव की पीढ़ियां सजा भुगत रही होतीं. लिहाजा, रेवरावासियों के लिए मुक्ति दिवस माना जाता है.
दरअसल, स्थानीय जमींदार ने गांव के करीब डेढ़ हजार बीघा जमीन को नीलाम करवा लिया था. गांव के 500-600 व्यक्ति चिथरा पहने भूखों मरते थे. लड़कियां बेचीं जा रही थीं. हद तो ये कि जमींदार उससे भी आधे मूल्य जमींदारी और बकाए के रूप में वसूल रहे थे. जमींदारों के शोषण के कारण किसानों की जमीन नहीं बच पाई थी.
स्वामी सहजानन्द के ‘अपनी जीवन संघर्ष’ पुस्तक में उल्लेख है कि किसानों के छप्पर पर दो कद्दू फलते थे, तो उनमें से एक कद्दू जमींदार ले लेता था. दो बकरे में एक जमींदार का होता था. अत्याचार और जुल्म सितम का आलम यह था कि-एक बार गांव वालों से दूध की मांग की गई थी. जब जमींदार के कारिंदे ने कहा था कि गांव में दूध नही है तब औरतों को दूह लाओ का निर्देश दिया था.
तब स्थानीय जमींदार के अत्याचार से मुक्ति के लिए स्वामी सहजानंद ने रेवरा के ग्रामीणों का साथ दिया था. ताज्जुब कि जमींदारों से लड़ाई में जब पुरूषों का साहस कमजोर पड़ने लगा था तब महिलाओं ने लाठियां उठा ली थीं. महिलाएं तब तक आंदोलनरत रही थीं जब तक गांव जमींदारों के अत्याचार से मुक्त नही हुआ था. जैसा कि स्वामी सहजानंद ने जीवन संघर्ष पुस्तक में जिक्र किया है.
दरअसल, जमींदारों के जुल्मों सितम से परेशान ग्रामीण जमींदार, मजिस्ट्रेट, मंत्रियों और नेताओँ के पास दौड़ लगाते थक गए थे. लेकिन किसी ने मदद नही की थी. तब किसानों ने पंडित यदुनन्दन शर्मा का हाथ पकड़ा. स्वामीजी की सहमति से किसानों के मददगार बने थे. खास बात ये कि स्वामीजी के अलावा राहुल सांकृत्यायन, ब्रह्मचारी बेनीपुरी ने भी किसानों का पूरा साथ दिया था. स्वामीजी कहा करते थे कि किसान जब शक्तिवर्धक अन्न, मीठा गन्ना, ऊर्जा पैदा करने वाला फल-फूल पैदा कर सकता है तो वह किसान अपनों के बीच से नेता भी पैदा कर सकता है. इसका काफी असर रहा.
जमींदार के कारिंदों और पुलिस ने किसानों को हल जोतने पर प्रतिबन्ध लगा रखा था. लेकिन स्वामीजी के नेतृत्व में आन्दोलन इतना उग्र हो चुका था कि हल खुलवाने के लिए आने वाले पुलिसकर्मियों से कई लोग एक साथ लिपट जाते थे. पुलिस जब महिलाओं के साथ ज्यादती पर उतर गई तो महिलाओं ने लाठियां उठा ली थीं. लिहाजा, जमींदार को समझौते के लिए राजी होना पड़ा. तत्कालीन कलेक्टर हिटेकर ने पंडित यदुनंदन शर्मा से समझौते का प्रस्ताव भेजा. इसके तहत 150 बीघा जमीन को छोड़कर बाकी जमीन किसानों के बीच वितरित कर दी गई.
इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.कॉम या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है
http://www.ichowk.in/culture/a-village-of-bihar-worships-swami-sahajand-saraswati-on-mahashivaratri/story/1/2855.html