Sunday, 10 January 2016

पति की चिता की आग भी नही बुझी थी कि लावारिस नवजात को जीवन देने में जुट गई थी संगीता, संघर्ष और साहस की मिसाल है संगीता



अशोक प्रियदर्शी
बात चार साल पहले की है। संगीता के पति बबलू की छत पर से गिर जाने के कारण मौत हो गई थी। परिवार की सारी जिम्मेवारियां अचानक संगीता पर आ गई थी। दो बेटियों और एक बेटे की परवरिश की चिंता थी। पति का बिजनेस भी खत्म हो गया। संगीता के सगे संबंधी घर में रहकर बच्चों का परवरिश का सुझाव दे रहे थे। ताज्जुब कि पति की चिता की आग बुझी भी नही थी कि संगीता ने लावारिश नवजात को जीवन देने में जुट गई। संगीता को अकबरपुर में एक लावारिश नवजात मिलने की जानकारी मिली। संगीता उसे आंचल में ली। फिर उसे बाल संरक्षण इकाई के जरिए जीवन देने में कामयाब रही। बिहार के नवादा जिले के न्यू एरिया निवासी संगीता का अकेला उदाहरण नही है। वह लगातार लावारिश नवजात को जीवन देने में अपनी अहम भूमिका निभा रही हैं। 
         यही नहीं, 40 वर्षीय संगीता अनाथ, गुमशुदा, लैंगिग शोषण के बारे में जानकारी और कानूनी शिक्षा प्रदान करने में अहम भूमिका निभा रही है। मानव व्यापार पर लगाम लगाने में भी डटकर मुकाबला कर रही है। पिछले दिनों नरहट अस्पताल में भी एक नवजात बच्चा मिला है। इसे भी जीवन प्रदान किया जा सका है। हिसुआ के उमरांव विगहा में एक नवजात लडकी को बाल संरक्षण इकाई के जरिए जीवन प्रदान किया जा सका है। भारत सरकार के महिला बाल विकास मंत्रालय द्वारा संगीता कुमारी को निःस्वार्थ और असाधारण कार्य के लिए जिला महिला सम्मान से सम्मानित किया जाएगा। बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग ने जिला पदाधिकारी को पत्र भेजकर ऐसा निर्णय लिया है। 

संघर्षपूर्ण की पृष्ठभूमि
 गया जिले के वजीरगंज प्रखंड के कारीसोवा निवासी लाखपत सिंह की अकेली बेटी संगीता की शादी 14 साल की आयु में नवादा नगर के न्यू एरिया निवासी बबलू कुमार से हुई थी। तब वह सातवीं में पढ़ रही थी। लेकिन वह शादी के बाद भी पढ़ाई जारी रखी। वह 1997 में इतिहास में एमए की। यही नहीं, पति की मौत के बाद 2013-14 सत्र में एमएसडब्लू से पीजी की। इसके पहले 2011 में नालंदा ओपन से बाल एवं महिला अधिकार विषय में डिप्लोमा की थी। वह 1987 में मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। संगीता की दो बेटियां और एक बेटा है। बेटियों में रूपाली यूपी के जौनपुर से बीएससी एजी कर रही है। रीतु सातवीं कक्षा में पढ़ रही है। जबकि पुत्र आनंद इंटरमीडिएट का स्टुडेंट है।

सामाजिक क्षेत्र में काम
2005 में बाल श्रमिक स्कूल से जुड़कर साक्षरता का काम की। 2010 में समाज कल्याण विभाग के तहत बाल कल्याण समिति की सदस्य बनी। 2011 में तटवासी समाज न्यास में उपसमन्वयक के तौर पर ज्वाइन की। फिलहाल वह बाल कल्याण समिति की सदस्य और उपसमन्वयक के तौर पर काम कर रही हैं।

क्या कहती हैं संगीता
संगीता कहती हैं कि असामयिक पति की मौत से उन्हें गहरा झटका लगा है। वह अपने पति को बचाने में कामयाब नही हो सकी। इसकी उन्हे हर समय चिंता रहती है। ऐसे में ऐसे नवजातों को जीवन देने से उन्हें राहत मिलती है।ऐसे बच्चों को जीवन देना उनके जीवन का हिस्सा बन गया है। यही नहीं, पारिवारिक जिम्मेवारी भी घर के चहारदीवारियों के जरिए संभव नही है। इसलिए उन्हें बाहर आना ही एकमात्र विकल्प था।

मिसाल-छात्र मज़बूरी में हुए साथ, तो मिल गई सफलता की राह


अशोक प्रियदर्शी
भारत के नये चीफ जस्टीस कौन बने? शिमला समझौता कब हुआ था? ब्रीक्स में भारत की भूमिका क्या है? बिहार के पहले राज्यपाल कौन थे? बिहार में सर्वाधिक दफा मुख्यमंत्री बनने का अवसर किसे मिला? जाहिर तौर पर इस तरह के सवाल किसी शिक्षण संस्थान में सुनने को मिलते हैं। लेकिन बिहार के नवादा जिला मुख्यालय के कन्हाई स्कूल के खेल मैदान में हर रोज शाम और सुबह ऐसे सवाल आपको सुनने को मिल जाएंगे। बाहरी तौर पर लग सकता है कि मैदान में विधार्थी गप्पे मार रहे हैं। लेकिन यह देखनेवालों का भ्रम है। सुबह पांच से सात और शाम तीन से पांच बजे तक विधार्थी पढ़ाई करने के लिए जुटते हैं। मैदान में करीब एक सौ ग्रुप हैं, जिनके जरिए डेढ़ हजार से ज्यादा विधार्थी जुटते हैं।
     विधार्थियों को खेल मैदान में जुटने की कहानी दिलचस्प है। बताया जाता है कि छह साल पहले कन्हाई नगर के अमित, भटटा के श्रवण, नेहालुचक के भोला जैसे विधार्थियों ने 6-7 साथियों के साथ शांत जगह की तलाश में मैदान के एक कोने में क्वीज शुरू किया था। इसके बाद कई और लोगों ने इसकी शुरूआत की। विधार्थियों को जब सफलता मिलने लगी तब ग्रुप का तेजी से विस्तार हुआ। फिलहाज, 100 से अधिक ग्रुप बन गए हैं। विगत पांच सालों के अंतराल मंे 1500 से अधिक विधार्थियों को जाॅब मिल चुके हैं।

देखे तो, साक्षात क्वीज, स्टार क्वीज, लक्की क्वीज, संवाद क्लासेस, सत्यमेव जयते, कौटिल्य, जय हिंद जैसे गु्रप के नाम है। प्रत्येक ग्रुप में 20-40 सदस्य होते हैं। जय मा सरस्वती गु्रप के नीतीश कहते हैं कि इस ग्रुप के पुराने 22 सदस्यों को जाॅब मिल गई है। उनकी जगह पर 22 नये सदस्य जोड़े गए हैं। नीतीश के अलावा, रमेश, रामाशीष को भी रेलवे में सेलेक्शन हो गया है। प्रक्रिया बाकी है।
        यह किसी एक ग्रुप की स्थिति नही है। हैं। आजाद ग्रुप के 20 सदस्यों में से 17 को जाॅब मिल गई है। आजाद ग्रुप के गौतम कहते हैं कि तीन अन्य साथियों का भी चयन हो चुका है। नीड ग्रुप के रजनीश कहते हैं कि उनके ग्रुप के 30 में 20 विधार्थियों को जाॅब मिल गया है। आर्थिक रूप से लाचार विधार्थियों के लिए गु्रप वरदान जैसा है। सरस्वती ग्रुप के सौरभ कहते हैं कि ग्रुप में जुड़ जाने से कई विषयों की जानकारी एक साथ मिल जाती है। इसमें कोई खर्च नही है। किसी सेट का फोटोकाॅपी कराने में मुश्किल से 100 रूपए माह में खर्च होता है।
बताया जाता है कि ग्रुप के ज्यादातर विधार्थी रेलवे, एसएससी, बैकिंग और सामान्य क्षेत्र के नौकरियों में जाते हैं। हालांकि अब बीपीएसएसी की दिशा में भी सफलता मिलने लगी है। पांच विधार्थियों ने बीपीएसएसी पीटी का एग्जाम भी पास किया है। सफलता का ही नतीजा है कि आसपास के जिला से भी नवादा तैयारी करने आते हैं। जमुई जिले के अलीगंज का मनीष कहता है कि उनके पिता की आर्थिक स्थिति ऐसी नही कि पटना और दिल्ली में प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करा सके। लिहाजा, नवादा की अच्छी रिजल्ट के कारण ग्रुप में जुड़ा हूं।

खेल मैदान ही क्यों?
खेल मैदान में एकत्रित होने की कई वजह है। सबसे बड़ी वजह है कि बगैर कोई बाधा के शांतिपूर्वक आपस में ग्रुप डिस्कशन कर सकते हैं। रजौली के धर्मवीर कहते हैं कि किराया का कमरा महंगा है। मुश्किल से रहने का इंतजाम हो पाता है। कमरा में करना भी चाहें तो मकान मालिक को परेशानी हो सकती है। साथियों के अंदर भी बड़े छोटे का भाव पनप सकता है। लिहाजा, यह मैदान बेहतर जगह है।

सब गुरू सब चेला
ग्रुप की खासियत है कि आपस में सब एक दूसरे के गुरू और चेला हैं। हर रोज कोई नया गुरू होता है बाकी चेला। हर किसी को एक दिन कवीज का सेट बनाकर लाना और लोगों से सवाल जवाब करना उनकी जिम्मेवारी होती है। यही नहीं, प्रश्नोतरी के क्रम का तरीका भी पारदर्शी होता है। धोखाधड़ी करने पर पहले टोका जाता है फिर उनसे किनारा कर लिया जाता है।

कलयुग के दधीचि: औरों को जीवन देने के लिए देहदान करेंगे 11 बुजुर्ग

बुजुर्ग हड्डियों में अब भी जान बाकी है


 
डाॅ. अशोक कुमार प्रियदर्शी
         बात एक साल पहले की है। नवादा नगर के गढ़पर निवासी 70 वर्षीय एलपी सिन्हा ( सामाजिक कारणों से नाम बदल दिया गया है) को बेटे ने घर से बाहर कर दिया था। सिन्हा पर बेटे जमीन और मकान रजिस्ट्री करने का दबाव बना रहे थे। सिन्हा इसके लिए तैयार नही थे। तर्क था कि घर और मकान रजिस्ट्री कर देने से गुजारा कर पाना मुश्किल हो जाएगा। प्रतिक्रिया में बेटे ने घर से बाहर कर दिया। सिन्हा किराए के मकान में रहने लगे। सिन्हा अपनी यह परेशानी बुजुर्ग साथियों को बताया। बुजुर्ग साथियों ने सामूहिक तौर पर प्रशासन से पहल का आग्रह किया। सिन्हा को फिर से घर पर काबिज कराया गया। 
         बिहार के नवादा की यह अकेला घटना नही है। पकरीबरावां के डुमरी गांव निवासी कामेश्वर सिंह (काल्पणिक नाम) का उदाहरण लें। सिंह शिक्षक से रिटायर हुए तब बटों ने पेंशन की राशि के लिए अड़चन पैदा कर दिया। उनकी पत्नी नही थी। बेटे ने उनपर चारित्रिक लांछन लगा दिया था। इस मामले में बुजुर्ग परिवार ने पहल किया। अब नियमित पेंशन भुगतान हो रहा है। 
        रोग दुख में भी बुजुर्ग एक दूसरे के मददगार साबित होते रहे हैं। पार नवादा निवासी अंजनी दीक्षित शब्जी मार्केट में गिर गए थे। उनका दायां टेहुना टूट गया। लोग मूकदर्शक बने थे। तभी शब्जी खरीदने आए एक बुजुर्ग ने उन्हें देखा। फिर कई बुजुर्गों को बुलाया। अस्पताल में इलाज शुरू कराने के बाद परिवार को सूचना दी गई। एक दूसरे बुजुर्ग के मदद की ऐसी कई कहानियां है। रामनगर निवासी ई. धनेश्वर यादव कहते हैं कि रिटायरमेंट का लाभ देने के लिए रूपए की मांग की जा रही थी। लेकिन बुजुर्ग परिवार के पहल के कारण 50 रूपए कागजी खर्च में काम चल गया।
        बुजुर्ग एक दूसरे की सुरक्षा में भी हाथ बंटाते रहे हैं। नगर थाना के बुधौल निवासी 67 वर्षीय गौरीशंकर प्रसाद जमीन की खरीद के लिए बैंक से पैसा निकालकर घर लौट रहे थे। झपटमार उनका पीछा कर रहे थे। एक बार पान की पिरकी फिर कचरा फेंक दिया। तब गौरीशंकर प्रजातंत्र चैक पर ठहर गए, बुजुर्ग साथी को फोन किया। चंद मिनट में कई बुजुर्ग आ गए। उसके बाद झपटमार फरार हो गया।
         युवाओं से भी मुकाबला में भी बुजुर्ग नही हिचकते। फरहा निवासी 72 वर्षीय उमेश प्रसाद की बेटी को दामाद ने छोड़ दिया था। कोर्ट के आदेश के बावजूद दामाद गुजारा भता देने को राजी नही था। ससुर को धमकी दिया करता था। बुजुर्गों ने पहल किया। तब से गुजारा भता दिया जा रहा है। नारदीगंज रोड के रामोतार प्रसाद की जमीन को पड़ोसी कब्जा करना चाहता था। झूठे आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। लेकिन बुजुर्ग परिवार ने पहल किया तब पुलिस माफी मांगी। जमीन को कब्जा मुक्त कर दिया गया। 
       यही नही, बुजुर्गों के पहल पर कई और भी काम हुए हैं। डाॅ ओंकार निराला कहते हैं कि अस्पताल में बेड आरक्षित है। बैंक में भी एक काउंटर है। प्रत्येक तीन माह पर चिकित्सा शिविर आयोजित होते हैं। इसमें निःशूल्क इलाज और दवाइयां दी जाती है। यह सब बुजुर्गों के सामूहिक प्रयास के कारण संभव हो रहा है। करीब एक हजार सदस्यों का बुजुर्ग परिवार है। बुजुर्ग परिवार के मुखिया डाॅ एसएन शर्मा कहते हैं कि परिवार और समाज बुजुर्गों को बेबश समझते हैं। इसलिए उनकी अनदेखी करते हैं। उनपर अत्याचार किए जाते हैं। इसी कड़ी में बुजुर्ग परिवार एक दूसरे को मदद कर रहे हैं ताकि लोग लाचार नही समझे। करीब 60 बुजुर्ग नेत्रदान जबकि 11 बुजुर्ग देहदान की घोषणा कर चुके हैं। बुजुर्ग परिवार के कार्य को जस्टीस रहे एसएन झा, राजेंद्र प्रसाद, पूर्व डीजीपी डब्लू एच खान, पूर्व सीएम जगन्नाथ मिश्रा आदि सराहना कर चुके हैं।
लेकिन बुजुर्गों की यह पूरी तस्वीर नही है। यह एक मिसाल भर है। देश और दुनिया में बुजुर्ग तिरस्कृत जीवन जी रहे हैं। डाॅ शर्मा कहते हैं कि 65 फीसदी बुजुर्ग परिवार के तिरस्कार के शिकार हैं। बुजुर्गों के दुर्व्यवहार के पीछे आर्थिक कारण ज्यादा होते हैं। हेल्पेज इंडिया के नेशनल सर्वे के मुताबिक, 2013 में 23 फीसदी अत्याचार के मामले थे। 2014 में यह 50 फीसदी पहुंच गया है। 41 फीसदी मामले गाली गलौज, 33 फीसदी निरादर और 29 फीसदी बुजुर्गों को नजरअंदाज करते हैं।

दुनिया की तुलना में भारत की स्थिति
दुनिया के 96 देशों में बुजुर्गों की स्थिति को लेकर किए गए आकलन में स्विटजरलैंड बुजुर्गों के लिए बेहतर देश माना गया है। जबकि भारत सबसे खराब जगह में शुमार है। हेल्पेज इंटरनेशनल नेटवर्क ऑफ चैरिटीज द्वारा तैयार ग्लोबल एज वॉच इंडेक्स 2015 में 96 देशों में भारत को 71वां स्थान दिया गया है। बुजुर्गों के सामाजिक और आर्थिक रहन-सहन का आकलन किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत आर्थिक सुरक्षा के पैमाने पर निचले स्तर यानी 72वें स्थान पर रहा। भारत का प्रदर्शन अन्य पैमानों की तुलना में सहयोगी वातावरण के पैमाने पर 52वें स्थान पर, सबसे बेहतर रहा।  सूचकांक में स्विटजरलैंड पहले, नॉर्वे दूसरे,, स्वीडन तीसरे, जर्मनी चैथे और कनाडा पांचवे स्थान रहे हैं। 8वें स्थान पर आने वाले जापान के अतिरिक्त ऊपरी 10 स्थानों पर आने अन्य सभी देश पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका में अग्रणी देश हैं। 

तेजी से बढ़ रहा बुजुर्गों की आबादी
       चीन में 60 साल से अधिक उम्र के लोगों की तादाद 21.2 करोड़ है। 2050 तक भारत में 32 करोड़ से अधिक बुजुर्ग का अनुमान है। भारत की जनगणना 2011 के मुताबिक, 10.38 करोड़ से अधिक है। हेल्पेज इंटरनेशनल नेटवर्क के मुताबिक दुनिया के तमाम देशों में बुजुर्गों का अनुपात बढ़ रहा है। 2050 तक सूचकांक में शामिल 96 में से 46 देशों की 30 फीसदी से ज्यादा आबादी 60 वर्ष से उपर के लोगों की होगी। उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कहा कि बुजुर्गों की जनसंख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ का भी मानना है कि दुनियाभर में जिस आयु वर्ग की जनसंख्या सर्वाधिक तेजी से बढ़ रही है वह 80 वर्ष या उससे ज्यादा आयु का वर्ग है। एक अनुमान के मुताबिक 2050 तक एशिया में रहने वाले हर चार में से एक 60 साल का होगा। बिहार का आकलन करें तो 77 लाख बुजुर्ग हैं। 77 लाख बुजुर्गों में 89 फीसदी बुजुर्ग गांवों में जबकि 11 फीसदी बुजुर्ग शहरों में रहते हैं।

बुजुर्गों के लिए भारत में कानून
      भारत सरकार ने 2007 में बने कानून मेंटेनेंस एण्ड वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एण्ड डिपेंडेंट्स में प्रवाधान किया गया गया है कि बूढ़े माता-पिता की देखभाल की जिम्मेदारी उन बच्चों और रिश्तदारों की होगी जो उनकी जायदाद के वारिस होंगे। लेकिन ऐसा देखा जाता है कि बुजुर्गों से उनकी जमीन जायदाद ले लेने के बावजूद उनके बच्चे और नाते रिश्तेदार बदसलूकी करते हैं। मुश्किल कि अधिकांश बुजुर्गों को इस कानून की जानकारी नहीं है। जिन बुजुर्गों को इसकी जानकारी है भी वह सामाजिक कारणों से अपने संतानों के खिलाफ इसका प्रयोग नही करते हैं।

बुजुर्गों का नया परिवार सोशल साइट्स


डाॅ अशोक कुमार प्रियदर्शी
          बात पांच साल पहले की है। भारतीय सेना में कर्नल के पद से अजय कुमार रिटायर हुए थे। पढ़ाई से नौकरी के दौरान अजय अपने मित्रों से कट चुके थे। परिवार के सदस्य भी जाॅब्स में थे। बड़ी बेटी अंकिता शर्मा मेजर के पद पर ज्वाइन कर चुकी थी। दूसरी बेटी अपूर्वा पूणे जबकि बेटा अंकुर चंडीगढ़ में आइटी सेक्टर में ज्वाइन कर चुके थे। अनुज अभय कुमार असम में डिविजनल इंजीनियर के पद पर कार्यरत हैं। रिटायरमेंट के बाद अजय के साथ सिर्फ उनकी पत्नी थी। इस एकाकी जीवन के दौरान फेसबुक अकाउंट खोले। फिर दोस्तों और परिचितों से जुड़ने का सिलसिला शुरू हुआ। 
       पिछले पांच सालों के अंतराल में फेसबुक पर 1100 सदस्यों का परिवार हो गया। इसमें उनके कई सगे संबंधी भी हैं, जो नौकरी- रोजगार के कारण दूर हो चुके थे। अजय कहते हैं-सोशल साइट्स का नतीजा कि उनके दोस्तों की सूची में पाकिस्तान, वर्मा, भूटान, श्रीलंका, नेपाल, अफगानिस्तान जैसे देशों के लोग उनसे जुड़े हैं। अजय के मुताबिक, पाकिस्तान सेना में बड़े अधिकारी से रिटायर हुए मुस्ताक रहमान उनके फ्रंेडलिस्ट में हैं। सीमा पर एक दूसरे के सामने होते थे। इंसानियत की वजह से अब अच्छे दोस्त हैं। 
        वह कहते हैं कि सोशल साइटस की वजह से सीनियर से भी करीब आ गए हैं। सेना की नौकरी अनुशासित रही है। जेनरल पीसी कटाच उनके सीनियर थे। वह भी उनके फ्रेंडलिस्ट में हैं। विचारधारा के स्तर पर दोनों में फर्क है। लेकिन सीनियर उनकी प्रशंसा करते हैं। सीनियर रहे कर्नल अनिल काॅल, कर्नल एसपी खल्ला जैसे कई लोग सोशल परिवार में है, जिनसे दूरियां कम हुई है। अब अनुभव और फिलिंग्स दोस्तों के बीच शेयर करते हैं।
        अजय कहते हैं -फेसबुक निजी जानकारी बढ़ाने का बेहतर जरिया है। इससें हर विचारधारा के लोग जुड़े हैं। उम्र का भी फासला नही दिखता। हर उम्र के लोगों के अच्छे बुरे अनुभवों से वाकिफ होने का बेहतर प्लेटफाॅर्म है। हालांकि अब प्रोपगंडा फैलाने का जरिया बनता जा रहा है। इससे परहेज करता हूं। प्रोपगंडा फैलानेवालों को हटाने में देर नही करता। 63 वर्षीय अजय बिहार के नवादा जिले के काशीचक प्रखंड के चंडीनावां गांव के रहने वाले हैं। फिलहाल फरीदाबाद में रहते हैं। 

अकेला उदाहरण नही
         तीन साल पहले बिहार के पथ निर्माण विभाग के संयुक्त सचिव पद से रिटायर हुए श्याम बिहारी राय की कहानी भी रोचक है। उनकी तीन बेटियां हैं। दो बेटियां श्वेता और पल्लवी अमेरिका में है। जबकि छोटी बेटी अकंाक्षा नागपुर में रिसर्च कर रही है। राय के अलावा परिवार में उनकी पत्नी उषा शर्मा हैं। राय कहते हैं- पढ़ाई से नौकरी के दौरान कई मित्र थे। लेकिन अलग अलग कार्यक्षेत्र और व्यस्तता की वजह से हमसब दूर हो चुके थे। रिटायरमंेट के बाद सोशल साइट्स के जरिए एक प्लेटफाॅर्म मिला है।
        इस प्लेटफाॅर्म में पुराने सगे संबंधियों के अलावा गैर परिचितों से भी परिचय बढ़ा है। इस साइट्स पर बौद्धिक भूख मिटती है। पढ़ने लायक सामग्री मिल जा रही है। वैसे वह यूपी के वाराणसी के भगवानपुर के रहनेवाले हैं। लेकिन उनके ज्यादातर परिचित बिहार से हैं। वह 28वीं बैच के हैं। उनके बैच के ज्यादातर अधिकारी रिटायर कर गए हैं। जनवरी में राजगीर में उनसबों की मिटिंग्स रखी गई है। लोगों को जोड़ने में फेसबुक महत्वपूर्ण कड़ी का काम किया है।
         महाराजा काॅलेज आरा से रिटायर्ड प्रोफेसर कन्हैया सिन्हा कहते हैं सिर्फ सोये रहने से बुढ़ापा बढ़ता है। 68 वर्षीय सिन्हा कहते हैं वह फुटाव के कार्यकारी अध्यक्ष हैं, फिर भी समय खाली रह जाता है। ऐसे मंे यह सशक्त जरिया है। साइंस काॅलेज के मित्र रहे यूडी चैबे, जो फिलहाल स्कोप के चेयरमैन हैं, फेसबुक के जरिए जुड़े। स्कूल के दोस्त सुभाष चन्द्र भाटिया से 50 साल बाद संपर्क हुआ। सिन्हा के तीन संतानों में दो बेटियां की शादी हो चुकी है, बेटा बंगलोर में पढ़ाई कर रहा है। यही नहीं, पटना विधुत विभाग में संयुक्त सचिव पद से रिटायर हुए रामइकबाल शर्मा कहते हैं कि अखबारों और टीवी से पहले किसी भी बड़ी घटनाएं की सूचनाएं फेसबुक के जरिए मिल जाता है। यह परिचितों से अपडेट रखता है।

80 साल के मुकुटधारी
      इस्टर्न बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष मुकुटधारी अग्रवाल 80 साल के हैं। वह भागलपुर से हैं। इस उम्र में नियमित रूप से दो घंटे फेसबुक, ट्वीटर और व्हाट्सप पर देते हैं। अग्रवाल मानते हैं कि सोशल साइटस 60 पार लोगों का नयार संसार है। एक दूसरे के दुख सुख में अपनी भावना व्यक्त करते हैं। वह कहते हैं कि यह मनोरंजन और ज्ञानवर्द्धन का बेहतर जरिया है। अग्रवाल कहते हैं सोशल साइटस पर दो तरह के लोग हैं। निगेटीव पक्ष के कारण निराशा पनप रही है। हालांकि मैं पाॅजिटीव पक्ष से जुड़े रखने की कोशिश करता हूं। वैसे निगेटीव पक्ष को नकारने के लिए डिलीट, अनफ्रेंड और ब्लाॅक का आप्शंस है। पर यह आखिरी कड़ी है।
बुजुर्गों की बढ़ रही तादाद
 संयुक्त परिवार की व्यवस्था अब खत्म हो रही है। वरिष्ठ नागरिक राम रतन प्रसाद सिंह रत्नाकर कहते हैं कि अब पति-पत्नी और बच्चे तक परिवार सीमित हो गया है। बच्चे के नौकरी और रोजगार में चले जाने से  अभिभावक अकेले हो जाते हैं। जिन अभिभावकों को बच्चों के साथ रहने का अवसर मिलता है, इसमें पारिवारिक कलह के कारण बुजुर्ग निराशापूर्ण स्थिति में जीते हैं। एकाकी जीवन जीनेवाले बुजुर्गों की तादाद बढ़ रही है। ऐसे बुजुर्गों के लिए नया ठौर सोशल साइटस बन रहा है।
         पीइडब्लू रिसर्च सेंटर के मुताबिक, 71 फीसदी व्यस्क फेसबुक यूजर हैं। इसमें बुजुर्गों की तादाद बढ़ रही है। 2012 में 65 पार के 35 फीसदी बुजुर्ग फेसबुक यूजर थे। 2013 में 45, जबकि 2014 में 56 फीसदी पहुंच गया है। 2013 में 50-64 साल के 60 फीसदी लोग थे, 2014 में 63 फीसदी पहुंच गया। इसी तरह, करीब 23 फीसदी व्यस्क टवीट्र यूजर हैं। 2013 में 60-64 साल के 9 फीसदी बुजुर्ग थे, जो 2014 में 12 फीसदी पहुंच गया। यही नहीं, 65 पार लोगों की तादाद 5 से बढ़कर 10 फीसदी पहुंच गया है।

युवा इतिहासकारों के सम्मेलन में सूबे का प्रतिनिधित्व करेंगे डाॅ अशोक प्रियदर्शी, ग्वालियर में आयोजित होगा राष्ट्रीय सम्मेलन

डॉ अशोक कुमार प्रियदर्शी 
        कर्नाटक के मैसूर में इतिहास पुनर्लेखन और गौरवशाली संस्कृति की रक्षा को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर तीन दिवसीय सेमिनार आयोजित हुआ। इतिहासकारों के सम्मेलन में नवादा के पत्रकार और श्रीकृष्ण मेमोरियल काॅलेज के हिस्ट्री डिपार्टमेंट के लेक्चरर डाॅ. अशोक कुमार प्रियदर्शी ने लेक्चर दिया। डाॅ प्रियदर्शी ने रेवरा आंदोलन में महिलाओं की संघर्षपूर्ण भूमिका पर पक्ष रखा। रेवरा गांव में जमींदारों के अत्याचार से पुरूष जब हार मान गए थे तब महिलाएं लाठियां उठा ली थी। इसके लिए डाॅ प्रियदर्शी को यूनिवर्सिटी आॅफ मैसूर के वीसी प्रो केपी रंगप्पा और अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना नई दिल्ली के अध्यक्ष डाॅ सतीश मितल ने सर्टिफिकेट दिया है।
यही नहीं, दो माह बाद मध्यप्रदेश के ग्वालियर में आयोजित हो रहे युवा इतिहासकारों के राष्ट्रीय सम्मेलन में डाॅ अशोक प्रियदर्शी बिहार का प्रतिनिधित्व करेंगे। एबीआईएसवाई के बिहार प्रभारी डाॅ. राजीव रंजन ने कहा कि बिहार से पांच युवा इतिहासकार सिरकत करेंगे, डाॅ प्रियदर्शी इसका प्रतिनिधित्व करेंगे। 
            डाॅ राजीव रंजन के मुताबिक, इतिहास को पुनव्र्याखित करने की जरूरत है। इतिहास पहले जो लिखा गया वह पूर्ण इतिहास नही है। यूरोपियों इतिहासकारों ने भारत के मजबूत पक्ष को नजरअंदाज किया है। गौरवशाली संस्कृति की रक्षा की जरूरत है। बता दें कि इस सम्मेलन में काॅलेज आॅफ काॅमर्स के प्रोफेसर डाॅ. राजीव रंजन, एसकेएम काॅलेज के डाॅ अशोक प्रियदर्शी, नालंदा काॅलेज की प्रो. मंजू कुमारी के अलावा इतिहासकार शैलेश कुमार, अरूण कुमार, हे गोयल, सत्येन्द्र कुमार आदि प्रतिनिधि शामिल हुए थे। 
       गौरतलब हो कि 24-26 दिसंबर को मैसूर में इंडियन कांउसिल फोर हिस्टोरिकल रिसर्च (आईसीएचआर), नई दिल्ली, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना (एबीआईएसवाई), नई दिल्ली और यूनिवर्सिटी आॅफ मैसूर द्वारा संयुक्त रूप से सेमिनार का आयोजन किया गया था। विषय था- वुमेन इन इंडियन कल्चर थ्रो द ऐजेज। सेमिनार का उदघाटन गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने किया। जबकि अध्यक्षता कर्नाटक के राज्यपाल वाजूभाई वाला ने किया। सुरेश जोशी भैयाजी सेमिनार के मुख्य अतिथि थे। इस अवसर पर प्रो.केएस रंगप्पा, डाॅ सतीश मितल, डाॅ बालमुकुंद पांडेय आदि थे।
 






क्या है रेवरा आंदोलन
          रेवरा बिहार के नवादा जिले के काशीचक प्रखंड का एक गांव है। रेवरा में जमींदारों के अत्याचार की कहानी है। स्वामी सहजानन्द ने ‘अपनी जीवन संघर्ष’ नामक पुस्तक में इन कहानियों का जिक्र किया है। किसानों के छप्पर पर जब दो कददू फलते थे, तो उनमें से एक कददू जमींदार का हो जाता था। दो बकरे में एक जमींदार का होता था। गांव के करीब डेढ़ हजार विगहा जमीन को निलाम करवा लिया गया था। 500-600 व्यक्ति चिथरा पहने भूखो मरते थे। लड़कियां बेचीं जा रही थी। जमींदार उससे भी आधे मूल्य जमींदारी और बकाए लगान में वसूल रहे थे। जुल्म सितम का आलम यह था कि-एक बार गांव वालांे से दूध की मांग की गई थी। जब जमींदार के कारिंदे ने कहा कि गांव में दूघ नही है तब जमींदार ने औरतों को दूह लाने का निर्देश दिया था। जमींदारों के अत्याचार से जब पुरूष हार मान गए थे। तब महिलाएं लाठियां उठा ली थीं। आखिर में जमींदारों को समझौता करना पड़ा था।
5 Attachments

Saturday, 21 November 2015

बिहार में काम न आया मोदी का चक्रव्यूह

अशोक प्रियदर्शी
  सोलह माह पहले की कहानी है। लोकसभा चुनाव में पार्टी की खराब प्रदर्शन के कारण जदयू नेता नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिये थे। उनकी जगह तत्कालीन एससीएसटी कल्याण मंत्री जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया गया। संदेश स्पष्ट था कि 2015 के विधानसभा चुनाव में दलित मतों का धु्रवीकरण जदयू के पक्ष में हो सके। मुख्यमंत्री बनने के माह भर के अंतराल में 21 जून को मांझी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दिल्ली में मुलाकात हुई। इसे शिष्ट्राचार मुलाकात बताया गया। मांझी ने कहा कि बिहार के विकास के मसले पर प्रधानमंत्री का रूख सकारात्मक है। जदयू और भाजपा के विरोधाभासी बयानों के बीच मांझी की यह टिप्पणी जदयू को हैरान कर दिया।
      चूंिक मांझी की प्रतिक्रिया पार्टी की रणनीति से अलग थी। क्योंकि गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पीएम उम्मीदवार घोषित किए जाने की प्रतिक्रिया में जदयू नेता नीतीश कुमार ने भाजपा से 17 साल पुराने संबंध तोड़ लिये थे। 2014 का लोकसभा चुनाव वामदल के साथ जदयू लड़ी थी। जदयू 38 में से सिर्फ दो सीटें जीती थी। इस चुनाव में भाजपा को बहुमत मिली थी। लिहाजा, नीतीश मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिये थे। लेकिन नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद मांझी की टिप्पणी पार्टी जनों को हजम नही हो रही थी। पार्टी के अंदर से मांझी की आलोचना की जाने लगी। इसके जवाब में मांझी कहते रहे कि उन्हें मोहरा के रूप में इस्तेमाल किया जाना पसंद नही
      मांझी पार्टीजनों के आलोचनाओं से पीछे मुड़ने के बजाय आगे बढ़ते गए। प्रधानमंत्री और केन्द्रीय मंत्रियों के साथ मांझी सहज दिखने लगे। भाजपा नेताआंे से बढ़ती नजदीकियों का पटाक्षेप करीब साल भर बाद 11 जून 2015 को हुआ, जब मांझी ने भाजपा के साथ मिलकर 2015 का विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा किये। मांझी की नवगठित हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा 20 सीटों पर महागठबंधन (जदयू, राजद और कांग्रेस ) के खिलाफ चुनावी समर में हैं। मांझी खुद मखदुमपुर के अलावा विधानसभा अध्यक्ष उदयनारायण चैधरी के खिलाफ इमामगंज से चुनाव मैदान में हैं। मांझी कहते हैं- नीतीश कुमार को सता से बेदखल करना उनका मुख्य मकसद है।
       दरअसल, नीतीश कुमार के खिलाफ मांझी के मुखर होने के पीछे भाजपा की राजनैतिक चाल रही है। इसके लिए भाजपा एक साल से योजनाबद्ध तरीके से काम कर रही थी। मिसाल के तौर पर 3 फरवरी 2015 को बिहार दौरे के क्रम में केन्द्रीय मंत्री उमा भारती ने कहा कि केन्द्र और राज्य के साथ मिलकर काम करने में मांझी एक आदर्श उदाहरण हैं। जबाव में मांझी ने कहा कि विकास के प्रति उमा भारती का रूख सकारात्मक है। हालांकि जदयू नेताओं के आरोप रहे हैं कि मांझी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के स्क्रिप्ट पर काम कर रहे हैं। लेकिन विरोधाभाषी ब्यानों के कारण दूरियां इस कदर बढ़ गयी कि जदयू ने मांझी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला दिया। तब मांझी के पक्ष में जदयू के बागी सदस्यों के अलावा भाजपा खड़ी दिखी। 
        दरअसल, 16 जून 2013 को भाजपा से जदयू के अलग होने के बाद से ही भाजपा नीतीश कुमार को घेरने की योजना पर काम कर रही थी। 2014 लोकसभा चुनाव के पहले लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान और रालोसपा प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा से गठबंधन किया। कुल 40 सीटों में भाजपा-30, लोजपा-7 और रालोसपा-3 सीटों पर चुनाव लड़ी। इसमें भाजपा 22, लोजपा 6 और रालोसपा 3 सीटें जीतीं। वहीं राजद चार, जदयू और कांग्रेस-दो-दो जबकि राकंपा-एक सीट जीती। लोकसभा चुनाव में नीतीश के विरोधियों को गले लगाने से हुये लाभ के बाद भाजपा ने अपने दायरे को बढ़ा लिया।जैसा कि जानते हैं नीतीश से गतिरोध के बाद कुशवाहा ने रालोसपा का गठन किया था।जबकि 15 सालों से पासवान नीतीश के विरोध की राजनीति करते रहे हैं।             2010 में निर्वाचित लोजपा के तीन विधायकों को जदयू ने शामिल कर लिया था।भाजपा नीतीश के ऐसे दुश्मनों को साधकर नीतीश को घेरने की कोशिश की है। नीतीश को मात देने के लिए मांझी, पासवान और कुशवाहा को अपना गठबंधन में शामिल करने के अलावा भाजपा ने नीतीश के बागी विधायकों को भी गले लगाया है। भाजपा ने पार्टी के 14 विधायकों का टिकट काट दिया। जबकि दूसरे दलों के 11 विधायकों को अपनाया। मांझी भी ज्यादातर नीतीश के बागी विधायकों को उतारा। बिहार के 243 सीटों में भाजपा-160, लोजपा-40, रालोसपा-23 और हम 20 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। 
        ऐसा नही कि भाजपा की व्यूह रचना को नीतीश नही समझ पाये। भाजपा को इसका जवाब देने के लिए नीतीश 20 साल पुराने दुश्मनी को भूलाकर राजद प्रमुख लालू प्रसाद से हाथ मिला लिया। कांग्रेस को भी साझीदार बनाकर महागठबंधन बनाया। 2014 लोकसभा चुनाव के बाद हुये दस सीटों के विधानसभा उपचुनाव में इसका असर भी दिखा। महागठबंधन दस में से छह सीटें जीत गयीं। राजद-तीन, जदयू-दो और कांग्रेस-एक सीटें जीती। वहीं भाजपा अपने कब्जे वाली छह में से दो सीटें गंवा दी। 
      दरअसल, नीतीश और लालू को करीब आने की वजह लोकसभा चुनाव के परिणाम थे। लोकसभा चुनाव में एनडीए (भाजपा, लोजपा और रालोसपा) 38.8 फीसदी मत लाकर 31 सीटें जीत गयी थी। वहीं जदयू, राजद, कांग्रेस और राकंपा 46.28 फीसदी मत लाकर भी हार गये थे। क्योंकि सब अलग अलग चुनाव लड़े थे। जदयू को 16.04, राजद 20.46, कांग्रेस 8.56 और राकंपा को 1.22 फीसदी मत मिले थे। दूसरी तरफ, भाजपा को 29.86, लोजपा 6.50, रालोसपा को तीन फीसदी मत थे। 
      इस गणितीय आकड़े के आधार पर विधानसभा के उपचुनाव में मिली कामयाबी के बाद नीतीश और लालू राष्ट्रीय स्तर पर छह दलों के विलय का एलान कर दिये। समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव इसके अध्यक्ष बनाये गये। ताज्जुब कि 2015 विधानसभा चुनाव से पहले इस महागठबंधन से सपा और राकंपा अलग हो गयी। राकंपा नेता और सांसद तारिक अनवर ने कहा कि महागठबंधन को सिर्फ मुस्लिम मत चाहिए, मुस्लिम टिकट और चेहरा नही। अनवर कम से कम 12 सीटों का दावा कर रहे थे। लेकिन सीट बंटवारे में जदयू -100, राजद-100, कांग्रेस-40 और राकंपा को तीन सीटें दी गयी थी। 
       दूसरी तरफ, सपा ने नाता तोड़कर महागठबंधन को बड़ा झटका दिया है। सपा के महासचिव रामगोपाल यादव ने कहा कि जदयू, राजद और कांग्रेस के गठबंधन से सपा अलग चुनाव लड़ेगी। हम पार्टी के डेथ वारंट पर साइन नही करेंगे। इतना ही नहीं, राजद सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव भी महागठबंधन की मुश्किलें बढ़ायी। पप्पू यादव, तारिक अनवर और पूर्व केन्द्रीय मंत्री नागमणि ने सपा के साथ मिलकर समाजवादी धर्मनिरपेक्ष मोर्चा बनाया है। 
        इस फ्रंट में सपा-85, जन अधिकार पार्टी-64,राकंपा-40, एनपीपी-3,  समरस समाज पार्टी- 28, समाजवादी जनता दल राष्ट्रीय- 23 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। यह फ्रंट भी ज्यादातर नीतीश और लालू के बागियों को तवज्जों दिया है। इस फ्रंट ने 4 विधायक, 32 पूर्व विधायक को जगह दिया है। बता दें कि कुल 70 विधायक बेटिकट कर दिये गये हैं। आल इंडिया मजलिस ए इतेहाज अल मुस्लिमीन (मीम) के सांसद असदुदीन ओवैसी ने सीमांचल में चुनाव लड़ने का फैसला कर महागठबंधन की मुश्किलें बढ़ा दी है।
        जदयू के प्रदेश प्रवक्ता डाॅ. अजय आलोक ने आरोप लगाया कि भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए औवैसी ने सीमांचल में चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। इसके लिए औवैसी और भाजपा के बीच डील हुयी है। हालांकि ओवैसी ने आलोक के आरोप को कड़े शब्दों में खारिज करते हुए चेतावनी दिया कि आरोप लगाने के पहले प्रमाण जुटा लें वरना मामले को कोर्ट में ले जाएंगे। ओवैसी ने अपने तर्क में कहा कि क्या दिल्ली में अभाविप की जीत, झारखंड में बीजेेपी की सरकार उनकी वजह से बनी?
        फिलहाल, वजह जो भी रही हो लेकिन ओवैसी और समाजवादी धर्मनिरपेक्ष मोर्चा के आगतन से महागठबंधन की मुश्किलें बढ़ी है। ओवैसी सीमांचल के चार जिलों के 24 सीटों पर लड़ने का फैसला किया है। किशनगंज मंे 70, अररिया में 42, कटिहार में 41 और पूर्णिया में करीब 20 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। 2010 के विधानसभा में कोसी और सीमांचल के अररिया, किशनगंज, पूर्णिमा, कटिहार, मधेपुरा, सहरसा, सुपौल के 37 सीटों में से 14 सीटें भाजपा जीती थी। 
       लेकिन जदयू के अलग हो जाने के बाद जब 2014 के लोकसभा चुनाव हुये तब भाजपा का प्रदर्शन नरेंद्र मोदी के लहर के बावजूद सीमांचल में खराब रहा। अररिया और मधेपुरा मंे राजद, किशनगंज और सुपौल में कांग्रेस जबकि पूर्णिया में जदयू और कटिहार में राकंपा जीती। पूर्णिया के अमौर में करीब 74.4 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। इस सीट पर भाजपा प्रत्याशी इसलिए जीत गये थे कि मुस्लिम मतों का विभाजन हुआ। बताया जाता है कि भाजपा ऐसे ही मुस्लिम मतों के विभाजन की उम्मीद कर रही है। हालांकि राजद के उपाध्यक्ष डाॅ. रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा कि ओवैसी को महागठबंधन में आना चाहिए इससे धर्मनिरपेक्ष मतों का बिखराव रूकेगा। देखें तो, बिहार में 47 ऐसी सीटें हैं जहां मुस्लिम वोट निर्णायक अवस्था में है। इसमें भाजपा 25 सीटें जीती थी।
      बहरहाल, नीतीश को इस स्तर पर घेरने के पीछे भी भाजपा की सियासी चाल ठहरायी जा रही है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से पप्पू यादव की मुलाकातों को इन घटनाक्रमों से जोड़कर देखा जा रहा है। पप्पू कहते हैं कि सांप्रदायिकता से ज्यादा खतरनाक लालू और नीतीश हैं। ऐसा माना जा रहा है कि भाजपा पप्पू यादव के जरिये यादव वोट बैंक में विभाजन का फायदा उठाना चाह रही है।  दूसरी तरफ, सपा को महागठबंधन से अलग होने के पीछे की वजह ग्रेटर नोएडा के पूर्व चीफ इंजीनियर यादव सिंह का मामला बताया जा रहा है। मुलायम सिंह यादव के भतीजा सांसद अक्षय यादव को एक लाख में तीन करोड़ रूपये का शेयर दिये जाने का आरोप यादव सिंह पर है। यह मामला सीबीआई जांच के दायरे में है। 
        पिछला घटनाक्रम को देखें तो, 30 अगस्त को पटना गांधी मैदान में महागठबंधन की स्वाभिमान रैली हुयी थी। इस रैली में सपा के प्रतिनिधि भी शामिल थे। इसके पहले सीटों का बंटवारा हो गया था। राकंपा की छोड़ी गयी तीन सीटों के अलावा लालू प्रसाद दो और सीटें सपा को देने की बात कही थी। फिर भी आठ दिन बाद सपा ने महागठबंधन से अलग होने का एलान कर दिया। हालांकि महागठबंधन से अलग होने के पहले रामगोपाल यादव के भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और इसके पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलायम सिंह यादव की मुलाकातों के धटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि अक्षय ने ऐसे किसी आरोप को मनगढंत कहा है।
       हालांकि नीतीश कुमार ने कहा है कि सपा पहले भी लड़ते रहे हैं, इसबार भी लड़ें। उन्हें कौन रोक सकता है। सपा का पिछला रिकाॅर्ड देखें तो उत्साहजनक नही है। सपा 1995 में 176 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, जिसमें दो सीटें जीती। 2000 में 122 सीटों पर चुनाव लड़ी, एक भी सीट नही जीती। 118 पर जमानत जब्त हो गयी थी। फरवरी 2005 में 142 में चार सीटें जीती थी। इसमें 131 पर जमानत जब्त हो गयी थी। नवंबर 2005 में 158 सीटों में से दो सीटें जीती थी। जबकि 150 पर जमानत जब्त हो गयी थी। वहीं 2010 में 146 सीटों पर चुनाव लड़ी लेकिन एक भी सीट नही जीती। यही हाल राकंपा का है। 2010 में 171 सीटों पर चुनाव लड़ी लेकिन 168 पर जमानत जब्त हो गयी थी। एक भी सीट नही जीत सकी।
      यही नहीं, इस दफा छह वाम संगठन भी एक साथ उतरी है। सीपीआईएमएल-96, सीपीआई-91 और सीपीएम-38 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। बाकी सीटों पर तीन अन्य संगठन चुनाव लड़ रही है। बसपा भी 243 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। लेकिन पिछला चुनाव परिणाम को देखें तो यह दल नतीजा तक भले ही नहीं पहुंच पाती हो, लेकिन जीत हार के फासले को संघर्षपूर्ण बनाती रही है। मतों का विभाजन महागठबंधन और एनडीए प्रत्याशियों की जीत हार का कारण बन सकती है। 
         2010 के चुनाव में 34 सीटों पर जीत का अंतर 20 हजार से उपर हुआ। जबकि 44 सीटों पर 10 से 20 हजार मतों के बीच था। वहीं 17 सीटों पर 5-10 हजार के बीच, 15 सीटों पर पांच हजार से कम मतों से जीत दर्ज हुयी थी। जबकि सात सीटों पर दो हजार से कम मतों के अंतर से हार जीत हुयी थी। यही नहीं, भाजपा नीतीश कुमार को विशेष राज्य के दर्जे पर चुप करने की कोशिश की है। नरेंद्र मोदी ने सवा लाख करोड़ रूपये का आर्थिक मदद की घोषणा की है। इधर, नीतीश कुमार ने विततंत्री अरूण जेटली को पत्र लिखकर सवा लाख करोड़ के पैकेज को अस्पष्ट बताते हुए विशेष राज्य के दर्जे की मांग की है। जवाब में केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने विशेष दर्जे के नाम पर नीतीश पर सियासत करने का आरोप लगाया है।
       दरअसल, बिहार का चुनाव महागठबंधन और एनडीए के लिए प्रतिष्ठा का विषय बना है। महागठबंधन मंे नीतीश कुमार की पुनर्वापसी का सवाल है। वहीं एनडीए को बिहार की सता पर काबिज होने का सवाल है। यही वजह है कि चुनाव की घोषणा के पहले ही भाजपा की चार बड़ी रैलियां और महागठबंधन की एक बड़ी रैली हो चुकी है। नीतीश कुमार कहते हैं कि नरेंद्र मोदी बिहार को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिये हैं।  दरअसल, भाजपा दिल्ली में हुयी बुरी हार की भरपायी बिहार से करना चाह रही है। इसके अलावा बिहार की जीत में भाजपा की एक बड़ी रणनीति छिपी है। देखें तो, राज्यसभा के 245 सीटों में से 70 सदस्यों का कार्यकाल जुलाई 2016 तक पूरा होनेवाला है। इसमें कांग्रेस के 18 सदस्य हैं। बिहार से राज्यसभा में 16 हैं, इनमें भाजपा से सिर्फ चार हैं। 
         राज्यसभा का आकड़ें देखें तो, कांग्रेस-68, भाजपा-48, सपा-15, जदयू और तृणमूल-12-12, बसपा-10, एआइडीएमके-11, माकपा-9, बीएसपी और एनसीपी-6-6 और बाकी दो-एक सदस्य हैं। बिहार विधानपरिषद में भी भाजपा की स्थिति कमजोर है। 75 सीटों में से 34 जदयू के सदस्य है। भाजपा-22, राजद-5, कांग्रेस-5, माकपा-2, लोजपा-1 , निर्दलीय-4 और भाजपा-जदयू के अध्यक्ष उपाध्यक्ष हैं।
       दूसरी तरफ, नीतीश और लालू ने एनडीए खासकर भाजपा के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए एमवाई कार्ड खेला है। महागठबंधन ने 243 में 97 सीटें एमवाई को दिया है। मुस्लिम को 33 जबकि यादव को 64 सीटें दी गयी है। रामविलास और मांझी को काटने के लिए 37 दलित महादलित को टिकट दिये गये हैं। अतिपिछड़ा को 25 सीटें दी गयी है। उपेंद्र कुशवाहा के हमले को कमजोर करने के लिए कोइरी कुरमी को 38 सीटें दी गयी है। इसके अलावा वैश्य-6 और सवर्ण जाति के 38 उम्मीदवार बनाये गये हैं.   
         जबकि एनडीए एमवाई समीकरण को सवर्णाें के जरिये काटने की कोशिश की है। सर्वाधिक 85 सीटें सवर्णों को दिये गये हैं। हालांकि एनडीए के 29 उम्मीदवार के नाम घोषित नही किए गए हैं। फिर भी एनडीए ने 25 यादव, 23 कोइरी कुर्मी, 18 वैश्य, 32 दलित महादलित, 20 अतिपिछड़ा और 9 अल्पसंख्यक को उम्मीदवार बनाया है। जगजीवन राम शोध संस्थान के जातीय आकड़े के मुताबिक, यादव-14, कोइरी-5, कुर्मी-4, अत्यंत पिछड़ा वर्ग-30, मुस्लिम-16.5, महादलित-10, दलित-6, भूमिहार-6, ब्राहम्ण-5, राजपूत-3, कायस्थ की एक प्रतिशत आबादी है। इस चुनाव में जदयू-101, राजद-101 और कांग्रेस-41 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। 
        देखें तो, सहयोगी राजद से भी नीतीश की मुश्किलें कम नही है। राजद शासन के कथित जंगलराज से तालमेल के जवाब को लेकर नीतीश बार बार विरोधियों के निशाने पर हैं। इन सबके बावजूद महागठबंधन में राजद को ज्यादा सीटंे मिलने की स्थिति में राजद का रवैया क्या रहेगा यह भी नीतीश के लिए चुनौती है। हालांकि लालू ने कहा कि अब नीतीश से कोई डर की बात नही है। नीतीश से भाई भाई का रिश्ता है। बहरहाल, यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि अपनों और विरोधियों के सियासी व्यूह से नीतीश निकल पाते हैं या नही!