Monday, 30 March 2015

कचहरिया-पहले मां-बाप हुए, फिर बेटे और अब बछड़ा हुआ विकलांग

डॉ. अशोक कुमार प्रियदर्शी
 बात 15 दिन पहले की है। नवादा जिले के रजौली के कचहरियाडीह निवासी कारू राजवंशी के गाय ने एक बछड़े को जन्म दिया। लेकिन वह बछड़ा विकलांग पैदा हुआ। दूषित जल के सेवन की भयावहता का यह ताजा कड़ी है। दूषित जल के सेवन से डेढ़ दशक पहले कारू और उसकी पत्नी विकलांग हो गई थी। उनके दो स्वस्थ्य पुत्र पैदा हुए। लेकिन दस साल की उम्र में ही उन्के पुत्र शिवबालक(16 वर्ष) और गोवर्धन (14 वर्ष) विकलांग हो गए। तीन साल पहले कारू ने एक गाय खरीदी थी। लेकिन अब जब गाय ने बछड़े को जन्म दिया तो वह विकलांग पैदा हुआ।
दरअसल, विकलांगता की यह समस्या सिर्फ कारू परिवार तक सीमित नही है। कचहरियाडीह के शत प्रतिशत लोगों की कहानी है, जो विकलांगता का अभिशाप झेल रहे हैं। किसुन भूइयां का 20 वर्षीय पुत्र संतोष विकलांगता के शिकार का मिसाल है। उसका पूरा शरीर टेड़ा और चौकोर हो गया है। उसकी हालत बुढ़ापे जैसी हो गई है। यही नहीं, कपिल राजवंशी, पंकज, विमला, ममता, नरेश, सरोज, पूजा, संगीता, सुशील जैसे दर्जनों ग्रामीण है, जिनका जीवन नारकीय बना है। भयावहता के कारण रामबालक राजवंशी, अमीरक राजवंशी जैसे कई ग्रामीणों ने गांव छोड़ दिया है। 

भयावहता का अंदाजा
तीन दशक पहले सोहदा गांव निवासी इश्वरी यादव कचहरियाडीह गांव में आकर बसे थे। लेकिन 55 वर्षीय ईश्वरी परिवार के पूरे परिवार विकलांगता के शिकार हो गए हैं। ईश्वरी के पिता बुलक यादव, मां सरिता देवी, पत्नी अकली देवी, बेटे राजेश, रूपेश और बेटी सीमा विकलांगता की शिकार हैं। रूपेश की हालत दयनीय हो गई है। वह खाट पर से भी नही उठ पाता है। ईश्वरी कहते हैं कि पटना में इलाज कराया लेकिन स्वस्थ्य नही हो पाया। वह कहते हैं कि बाहर नही जा सकते। दूसरा कोई चारा नही है। विकलांग परिवार का परवरिश बाहर कर पाना संभव नही है।

क्या है वजह
प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ शत्रुधन प्रसाद सिंह कहते हैं कि आमतौर पर पानी में डेढ. फीसदी फलोराइड की मात्रा पाई जाती है। लेकिन जांच में कचहरियाडीह गांव में आठ फीसदी फलोराइड की मात्रा पाई गई है। लिहाजा, ग्रामीण फलोरोसिस नामक रोग के शिकार हो जाते हैं। इस रोग से बच्चों का अंग टेड़ा होने लगता है। हडिया चौकोर होने लगती है। 15-16 साल की अवस्था में ही लोग बुढ़ापा का अनुभव करने लगते हैं। कचहरियाडीह फुलवरिया जलाशय के समीप है। बताया जाता है कि जलाशय में एकत्रित जल के कारण कचहरियाडीह का भूजल स्तर दूषित हो गया है। इसका दूरगामी परिणाम के रूप में यह रोग सामने आया है।

क्या है बंदोवस्त
हालांकि इस रोग से बचाव के लिए हरदिया पंचाचत में पानी टंकी का निर्माण कराया गया है। प्रभावित ग्रामीणों को विस्थापित भी किया गया है। लेकिन गांववालों की परेशानी थमने का नाम नही ले रहा है। लोकस्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग के कार्यपालक अभियंता प्रदुम्न शर्मा कहते हैं कि ग्रामीणों को शुद्ध पानी की व्यवस्था कराई जा रही है। पानी की गुणवता की जांच की जाती है। जरूरत पड़ने पर मीडिया चेंज किया जाता है ताकि ग्रामीणों को नियमित रूप से शुद्ध जल उपलब्ध कराया जा सके।

Sunday, 29 March 2015

सियासी सेहत का राज है कदाचार

डाॅ. अशोक कुमार प्रियदर्शी
मैट्रिक के एक विषय की परीक्षा रदद किए जाने को लेकर राजेश का परिवार काफी दुखी हैं। इस विषय की परीक्षा 9 अप्रैल को निर्धारित किया गया है। सरकार के इस फैसले को लेकर राजेश परिवार को चिंता है। और गुस्सा भी। चिंता इस बात की है कि राजेश की मैट्रिक की परीक्षा में पूरे परिवार ने मेहनत किया। वह बेकार हो गया। किसान पिता ने परीक्षा का खर्च उठाया। उसके भाई ने हफ्ते भर रिस्क लेकर भाई को चिट पहंुचाया था। उसके बहनोई ने एक शिक्षक की मदद से प्रश्नों का जबाव उपलब्ध कराया था। लेकिन एक विषय की परीक्षा रदद होने से राजेश को पास करने पर भी संदेह हो गया है।
गुस्सा मीडिया और सरकार की भूमिका को लेकर है। उनका सवाल है कि मीडिया ने कुछ परीक्षाकेन्द्र में कदाचार की तस्वीरें दिखाई। इसी आधार पर सरकार ने उन केन्द्रों की परीक्षा रदद कर दी। अभिभावकों की शिकायत है कि बिहार का शायद ही ऐसा कोई परीक्षा केन्द्र है, जो कदाचार से अछूता रहा। लेकिन सरकार महज औपचारिकता पूरी कर चंद परीक्षार्थियों की मुश्किलें बढ़ा दी है। सरकार और मीडिया को पठन पाठन की नीतियां और व्यवस्था पर सवाल उठानी चाहिए।
 बिहार के राजेश (बदला हुआ नाम) परिवार की कहानी अकेला नही है। राज्य मंे हजारों छात्र-छात्राओं के परिवारों के समक्ष कदाचार के बारे में ऐसी ही अवधारणा है। अभिभावकों की भूमिका गौर करने लायक है। जिनके बच्चे की परीक्षा नही होती, उनका तर्क होता कि कदाचार से बच्चों के कॅरियर खराब होता है। जिनके बच्चों की परीक्षा होती है वह इसे कॅरियर का सवाल बताते हैं। ठीक वैसे हीं, जैसे बेटी की शादी में दहेज को अभिशाप और बेटे की शादी में शिष्ट्राचार बताते हैं।
दरअसल, कदाचार ‘सामाजिक शिष्ट्राचार’ का स्वरूप ले लिया है। लेकिन सरकार इसपर सख्ती बरतने से परहेज करती रही है। खासकर जब चुनाव का साल हो। शिक्षा मंत्री प्रशांत कुमार शाही की प्रतिक्रिया ऐसा ही संदेश है। शाही ने कहा कि 14 लाख परीक्षार्थी, उनके 4-5 रिश्तेदार। सभी पर अंकुश सिर्फ सरकार नही लगा सकती। इसे रोकने के लिए समाज को आगे आने की जरूरत है। इसके चलते मंत्री को हाइकोर्ट से खरी खोटी सुननी पड़ी। सरकार की सक्रियता जरूर बढ़ी लेकिन कदाचारियों के खिलाफ सख्त टिप्पणी से परहेज किया गया।
 जेडीयू सरकार के सहयोगी दल आरजेडी के प्रमुख लालू प्रसाद ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि उनका वश चले तो परीक्षार्थियों को किताब ले जाने की छूट दे दिया जाता। पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की टिप्पणी भी मंत्री को हटाने तक सिमित रही। विपक्षी दल बीजेपी भी यह कहकर औपचारिकता पूरी कर दी कि इससे बिहार का गलत संदेश जा रहा है। यह किसी एक सरकार की बात नही है। दरअसल, कदाचार मंे सरकारों के सियासत की सेहत का राज छिपा है। लिहाजा, कोई भी सरकार कदाचारियों के खिलाफ मोर्चा खोलकर जोखिम नही लेना चाहती।
ऐसा नही कि कदाचार पर अंकुश लगाना संभव नही है। 1972 में तत्कालीन मुख्यमंत्री केदार पांडे के सख्ती के बाद कदाचार थम गया था। लेकिन समय के साथ यह बड़ा आकार लेता चला गया। नब्बे के दशक में यह सिलसिला बढ़ गया। 1996 मंे पटना हाइकोर्ट जब सख्त हुई तब 12 फीसदी रिजल्ट हुआ था। इसके बाद पठन पाठन का सिलसिला तेज हुआ था। लेकिन धीरे धीरे कदाचार फिर आकार लेने लगा।
लिहाजा, 1997 में 40, 1998 में 45, 1999 में 52 फीसदी लोगों ने पास किया। जबकि बिहार विधानसभा के चुनावी साल 2000 में पास करनेवालों की तादाद 57 फीसदी पहुंच गया। 2005 और 2010 में 70-70 फीसदी परीक्षार्थी उतीर्ण हुए। 2005-10 के बीच 70 फीसदी से नीचे का रिजल्ट रहा। 2015 की परीक्षा में जारी कदाचार को नवंबर में होनेवाले विधान सभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है।
दरअसल, कदाचार के लिए सरकार की नीतियां काफी हद जिम्मेवार रही है। अंक के आधार पर नौकरी में प्राथमिकता, प्रथम श्रेणी के विधार्थियों को आर्थिक मदद और वितरहित संस्थानों में छात्रों की संख्या और श्रेणी के हिसाब से अनुदान जैसी नीतियों से कदाचार को बढ़ावा मिला है। पठन की चरमाई स्थिति, कुशल शिक्षकों का अभाव, बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसे कई वजह है। राज्य के बजट में शिक्षा के लिए सर्वाधिक 22 हजार करोड़ रूपए का प्रावधान किया गया है। लेकिन बजट की बड़ी राशि अनुदान आदि में खर्च कर दिए जाते हैं।
दूसरे प्रदेशों में भी कदाचार सियासी सेहत बना हुआ है। 1992 मंे यूपी की तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह और शिक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नकल विरोधी अध्यादेश लाया था। तब 15 फीसदी रिजल्ट हुआ था। परिणामस्वरूप बीजेपी की सरकार चली गई थी। उसके बाद समाजवादी और बहुजन समाजपार्टी ने इस कानून को निरस्त कर दिया था। हालांकि 1998 में राजनाथ सिंह के अगुआई में जब बीजेपी की सरकार बनी तब उस कानून में संसोधन कर थोड़ी ढ़ील दी गई। कुछ ऐसे ही वजह है जिसके कारण कोई भी सरकार कदाचार के खिलाफ सख्त फैसले लेने से परहेज करती रही है।

Thursday, 12 February 2015

जिन्होंने अंग्रेजों को छक्का छुड़ाया, अंग्रेजों ने उन्हें डकैत का नाम देकर चला गया

डाॅ. अशोक कुमार प्रियदर्शी
जवाहिर और एतवा राजवंशी ने  अंग्रेजों को  पसीना छुड़ाया था।  लेकिन अंग्रेजों ने  उन्हें दिया था डकैत का नाम। ब्रिटिश नीति के कारण गुमनाम रहे नायकों के नाम

         
          भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में नवादा जिलेे के पसई निवासी जवाहिर रजवार और कर्णपुर निवासी एतवा रजवार की उल्लेखनीय भूमिका रही है। नवादा-नालंदा इलाका मंे होनेवाले विद्रोह की हर घटनाओं में दोनों के नाम आ रहे थे। जैसा कि 1857ः भारत की स्वातंत्रता आंदोलन में बिहार झारखण्ड किताब, बिहार सरकार की पत्रिका और जिला प्रशासन के स्मारिका में उल्लेख मिलता है। लेकिन अंग्रेजों की फूट डालों और शासन करो की नीति का खामियाजाना कि गणतंत्र के ये दोनों आजादी के छह दशक बाद भी गुमनाम रहे हैं।
         दरअसल, विद्रोह के दौरान जवाहिर और एतवा ने अंग्रेंजों को नाकोदम कर दिया था। सरकारी कचहरी, बंगले, जमींदार और उसके कारिंदे की सम्पति विद्रोहियों के निशाने पर था। विद्रोहियों को जब मौका मिलता घटना को अंजाम देने से नही चूकते थे। कई जमींदारों ने भी विद्रोहियों को समर्थन देना शुरू कर दिया था। तब अंग्रेज अधिकारियों ने विद्रोह पर काबू पाने के लिए विद्रोहियों को चोर और डकैत जैसा नाम देने लगे थे, ताकि विद्रोहियों से लगाव के बजाय नफरत पैदा हो।
अंग्रेज अपनी इस कुटनीति में काफी हद तक सफल भी रहे। 27 सितंबर 1857 को जवाहिर करीब 300 आदमियों के साथ विद्रोह की रणनीति बना रहे थे। तभी अंग्रेज सैनिकों ने घेर लिया और गोलियां बरसानी शुरू कर दी थी। इस घटना में जवाहिर के चाचा फागू रजवार की मौत हो गई थी। कई जख्मी हो गए थे। फिर जवाहिर की भी मौत हो गई थी। लेकिन 29 सितंबर को तत्कालीन डिप्टी मजिस्ट्रेट वर्सली ने लिखा कि जवाहिर डकैती में मारा गया।
इसके पूर्व 12 सितंबर को एतवा की गिरफ्तारी के लिए अंग्रंेज और जमींदारों की सेना एतवा के गांव कर्णपूर जा रहे थे, तभी सकरी नदी के किनारे भिड़ंत हो गई। इस घटना में एतवा बच निकले, लेकिन उनके 10-12 साथी शहीद हो गए। तब एतवा की गिरफ्तारी के लिए 200 रूपए का इनाम घोषित किया था। कई साल बाद 8 अप्रैल 1863 को करीब 10000 पुलिस, मिलिट्ी और जमींदार की फौज का अभियान चला, लेकिन एतवा बच निकला था।
            दस्तावेज बताते हैं कि एतवा के नेतृत्व में 10 सालों तक छिटपुट विद्रोह चला था। बाद में विद्रोही नेताओं का क्या हुआ कुछ पता नही। लेकिन दुख की बात यह कि ग्रामीणों के बीच जब एतवा और जवाहिर की चर्चा होती है तब उनकी जुबां से अंग्रेजों का दिया नाम निकलता है। गणतंत्र के मौके पर सोचने की जरूरत है कि यह है कि अंग्रेज गए लेकिन उनकी नीति अब भी जिंदा है। यही वजह है एतवा और जवाहिर को सेनानी का दर्जा नही मिल पा रहा है। अब इसकी थोड़ा बहुत चर्चा भी होती है तो वह बहुत छोटे दायरे में राजवंशी समाज के बीच।






अपसढ़ में है नालंदा से प्राचीन विश्वविधालय के अवशेष, लेकिन उसमें बांधे जाते हैं मवेशी

डाॅ. अशोक कुमार प्रियदर्शी
          बिहार के नवादा जिले के वारिसलीगंज प्रखंड के अपसढ़ गांव में नालंदा से भी प्राचीन विश्वविधालय के अवशेष मिल चुके हैं। लेकिन इसकी सुरक्षा भगवान भरोसे हैं। वैसे, मार्च 2011 में बिहार के कला संस्कृति विभाग ने 2.18 एकड़ गढ़, 74. 20 एकड़ तालाब और तीन डिसमील वराह मूर्ति के लिए भूमि को संरक्षित कर दिया है। लेकिन जमीन पर इस दिशा में कोई पहल नही किया जा सका है। लिहाजा, ऐतिहासिक महत्व के पुरातात्विक साक्ष्य का नुकसान हो रहा है।

गढ़ और तालाब का अतिक्रमण हो रहा है। वराह की मूर्ति क्षतिग्रस्त हो रहा है। गांव में सैकड़ों मूर्तियां बिखरी पड़ी है। मूर्तियों में मवेशी बांधे जा रहे हैं। दर्जनों कीमती मूर्तियां गायब कर दी गई है। यही नहीं, गढ़ की भीतियों में रामायण के प्रसंगों का आकर्षक चित्र था, जो संरक्षण के अभाव में नष्ट हो गया है। यही नहीं, सरकारी स्तर पर संरक्षित क्षेत्र को अतिक्रमण किया जा रहा है। अपसढ़ सरोवर के किनारे मनरेगा भवन, आंगनबाड़ी केन्द्र और शौचालय निर्माण करा दिए गए हैं। कई भूमिहीनों को संरक्षित क्षेत्र में जमीन का परचा दे दिया गया है। संरक्षित सरोवर पर मत्स्य विभाग का कब्जा है।

      अपसढ़ विरासत समिति के संयोजक युगल किशोर सिंह ने कहा कि कई दफा जिला प्रशासन से इसकी शिकायत की गई है। कला संस्कृति और युवा विभाग के निदेशक अतुल कुमार वर्मा ने जिला प्रशासन को संरक्षित घोषित अपसढ़ को अतिक्रमण मुक्त करने का पत्र लिखा है। हालांकि जिलाधिकारी ललनजी के मुताबिक, अधिकारी को आवश्यक कार्रवाई के लिए निर्देश दिया जा चुका है। गौरतलब हो कि राज्य सरकार ने अपसढ़ के विकास के लिए एक करोड़ रूपए राशि का प्रावधान भी किया है। लेकिन इस दिशा में पहल नही किया जा सका है।

क्या है अपसढ़ का इतिहास
1970-80  के दशक में कला संस्कृति विभाग के तत्कालीन निदेशक डाॅ प्रकाश शरण प्रसाद के नेतृत्व में की गई खुदाई मंे नालंदा से प्राचीन यूनिवर्सिटी का अवशेष मिला था। इसे धार्मिक महाविहार का अवशेष करार दिया। शाहपुर में प्राप्त मूर्ति में ‘अग्रहार’ का जिक्र मिला था। डाॅ. प्रकाश के मुताबिक, ‘अग्रहार’ शब्द के मुताबिक यह तक्षशिला के समकालीन था। तक्षशिला का जिक्र भी अग्रहार के रूप में मिलता है। मेजर कीटो, कनिंघम, एएम ब्रोडले, बिहार डिस्ट्रिक्ट गजेटियर और एंटीक्यूरीयन रीमेंस इन बिहार में अपसढ़ की चर्चा है। वराह की मूर्ति है, जिसकी तुलना मध्यप्रदेश के एरन में स्थापित मूर्ति से की जाती है।



Friday, 16 January 2015

नालंदा से भी प्राचीन विश्वविद्यालय!

अशोक कुमार प्रियदर्शी | सौजन्‍य: इंडिया टुडे  12 जनवरी 2015 | अपडेटेड: 15:02 IST

      करीब पांच साल पहले तक यह जगह झडिय़ों से पटा हुआ एक बड़ा टीला थी. गंदगी इतनी होती थी कि इधर से गुजरना मुहाल. लेकिन दिसंबर, 2014 में बिहार के नालंदा जिले के एकंगरसराय प्रखंड में तेल्हाड़ा गांव के दक्षिण-पश्चिम में स्थित इस टीले की खुदाई में ऐसे कई अवशेष मिले हैं, जिससे भारतीय इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है.
      इस खुदाई के बाद पुरातत्वविदों का दावा है कि तेल्हाड़ा में नालंदा और विक्रमशिला से भी प्राचीन विश्वविद्यालय के अवशेष हैं. इससे पहले तक इसे नालंदा यूनिवर्सिटी के बाद का महाविहार माना जा रहा था. यहां से मिले अवशेषों के कुषाणकालीन होने का दावा किया जा रहा है. यहां खुदाई से आंगन, बरामदा, साधना कक्ष, कुएं और नाले के साक्ष्य मिले हैं. बड़ी मात्रा में सील और सीलिंग मिली हैं. इसमें ज्यादातर टेराकोटा से बनी हैं. एक सील के ऊपर तप में लीन बुद्ध की अस्थिकाय दुर्लभ मूर्ति भी मिली है.

(तेल्हाहाड़ा में मिली बुद्ध की मूर्ति, बुद्ध के साथ मोगलायन और सरिपुत्र)
बिहार के कला संस्कृति और युवा विभाग के सचिव आनंद किशोर का दावा है, ''तेल्हाड़ा में 100 से ज्यादा ऐसी चीजें मिली हैं, जो साबित करती हैं कि तेल्हाड़ा में प्राचीन विश्वविद्यालय के अवशेष हैं. यहां कुषाणकालीन ईंट और मुहरें मिली हैं, जिनके पहली शताब्दी में बने होने का प्रमाण मिलता है. गौर तलब है कि नालंदा को चौथी और विक्रमशिला को आठवीं शताब्दी का विश्वविद्यालय माना जाता है." राज्य सरकार ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से इसकी खुदाई जारी रखने के लिए अनुमति मांगी है. 2007 में धन्यवाद यात्रा के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तेल्हाड़ा आए थे. तब यहां की  पंचायत के मुखिया डॉ. अवधेश गुप्ता ने इस पुरातत्व स्थल की खुदाई कराने का आग्रह किया था. 26 दिसंबर, 2009 को नीतीश ने खुद फावड़ा चलाकर यहां खुदाई की शुरुआत की थी.





बिहार पुरातत्व विभाग के निदेशक डॉ. अतुल कुमार वर्मा के नेतृत्व में खुदाई शुरू की गई थी. शुरू के दो-तीन साल यहां नालंदा विश्वविद्यालय काल के बाद के अवशेष मिले थे. लेकिन बाद में कुषाणकालीन चीजें मिलने लगीं. तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय का समय-समय पर जीर्णोद्धार होने के भी संकेत मिले हैं. यहां सबसे ऊपर पालकालीन ईंटें मिली हैं. इन ईंटों की लंबाई 32 सेमी, चौड़ाई 28 सेमी और ऊंचाई 5 सेमी है. उसके नीचे 36 सेमी लंबी, 28 सेमी चौड़ी और 5 सेमी ऊंची ईंटें मिली हैं, जो गुप्तकाल में प्रचलित थीं. इसके नीचे 42 सेमी लंबी, 32 सेमी चौड़ी और 6 सेमी ऊंची ईंटें मिली हैं, जो कुषाणकालीन संरचनाओं से मेल खाती हैं.

डॉ. वर्मा का मानना है, ''7वीं से 11वीं शताब्दी में नालंदा और आसपास का इलाका शिक्षा केंद्र के तौर पर मशहूर था. 35-40 किलोमीटर की परिधि में नालंदा और उदंतपुरी के बाद तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय का अस्तित्व इसका प्रमाण है. संभवत: तेल्हाड़ा इस इलाके में पहला विश्वविद्यालय था, जिसका विस्तार बाद में नालंदा विश्वविद्यालय के रूप में किया गया." तेल्हाड़ा को भी तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने नष्ट कर दिया था. खुदाई में अग्नि के साक्ष्य और राख की एक फुट मोटी परत मिली है.

बौद्ध धर्म की महायान शाखा की पढ़ाई के लिए तेल्हाड़ा बड़ा केंद्र माना जाता था. इसका उल्लेख ह्वेनसांग और इत्सिंग के यात्रा वृत्तांत में मिलता है. इसका जिक्र तीलाधक के रूप में मिलता है. चीनी यात्रियों ने इसे अपने समय का श्रेष्ठ और सुंदर महाविहार कहा है. महाविहार में तीन मंजिला मंडप के साथ-साथ अनेक तोरणद्वार, मीनार और घंटिया होती थीं. यहां के अवशेषों से भी इस बात की पुष्टि होती है.1980 के दशक में नवादा जिले के अपसढ़ में खुदाई में भी नालंदा से ज्यादा प्राचीन विश्वविद्यालय के अवशेष मिले थे. तब के पुरातत्व निदेशक डॉ. प्रकाशचरण ने अपसढ़ को तक्षशिक्षा का समकालीन विश्वविद्यालय बताया था.

बिहार विरासत समिति के सचिव डॉ. विजय कुमार चौधरी कहते हैं, ''बिहार में ऐसे पुरातात्विक साक्ष्य भरे पड़े हैं. राज्य में पुरातात्विक स्थलों के सर्वेक्षण में 6,500 साइटें मिली हैं. उनमें कई महत्वपूर्ण महाविहार हैं. तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय का अवशेष उसी कड़ी का हिस्सा है."

और भी... http://aajtak.intoday.in/story/artifact-older-than-nalanda-university-found-in-bihar-1-795020.html





नवादा में जहरीला भोजन खाने से चार की मौत, दो अन्य बीमार

अशोक प्रियदर्शी-Jan 15, 2015, 10:34 AM IST

नवादा: हर 60 घंटे में हादसे में जाती है 1 जान