Sunday 29 March 2015

सियासी सेहत का राज है कदाचार

डाॅ. अशोक कुमार प्रियदर्शी
मैट्रिक के एक विषय की परीक्षा रदद किए जाने को लेकर राजेश का परिवार काफी दुखी हैं। इस विषय की परीक्षा 9 अप्रैल को निर्धारित किया गया है। सरकार के इस फैसले को लेकर राजेश परिवार को चिंता है। और गुस्सा भी। चिंता इस बात की है कि राजेश की मैट्रिक की परीक्षा में पूरे परिवार ने मेहनत किया। वह बेकार हो गया। किसान पिता ने परीक्षा का खर्च उठाया। उसके भाई ने हफ्ते भर रिस्क लेकर भाई को चिट पहंुचाया था। उसके बहनोई ने एक शिक्षक की मदद से प्रश्नों का जबाव उपलब्ध कराया था। लेकिन एक विषय की परीक्षा रदद होने से राजेश को पास करने पर भी संदेह हो गया है।
गुस्सा मीडिया और सरकार की भूमिका को लेकर है। उनका सवाल है कि मीडिया ने कुछ परीक्षाकेन्द्र में कदाचार की तस्वीरें दिखाई। इसी आधार पर सरकार ने उन केन्द्रों की परीक्षा रदद कर दी। अभिभावकों की शिकायत है कि बिहार का शायद ही ऐसा कोई परीक्षा केन्द्र है, जो कदाचार से अछूता रहा। लेकिन सरकार महज औपचारिकता पूरी कर चंद परीक्षार्थियों की मुश्किलें बढ़ा दी है। सरकार और मीडिया को पठन पाठन की नीतियां और व्यवस्था पर सवाल उठानी चाहिए।
 बिहार के राजेश (बदला हुआ नाम) परिवार की कहानी अकेला नही है। राज्य मंे हजारों छात्र-छात्राओं के परिवारों के समक्ष कदाचार के बारे में ऐसी ही अवधारणा है। अभिभावकों की भूमिका गौर करने लायक है। जिनके बच्चे की परीक्षा नही होती, उनका तर्क होता कि कदाचार से बच्चों के कॅरियर खराब होता है। जिनके बच्चों की परीक्षा होती है वह इसे कॅरियर का सवाल बताते हैं। ठीक वैसे हीं, जैसे बेटी की शादी में दहेज को अभिशाप और बेटे की शादी में शिष्ट्राचार बताते हैं।
दरअसल, कदाचार ‘सामाजिक शिष्ट्राचार’ का स्वरूप ले लिया है। लेकिन सरकार इसपर सख्ती बरतने से परहेज करती रही है। खासकर जब चुनाव का साल हो। शिक्षा मंत्री प्रशांत कुमार शाही की प्रतिक्रिया ऐसा ही संदेश है। शाही ने कहा कि 14 लाख परीक्षार्थी, उनके 4-5 रिश्तेदार। सभी पर अंकुश सिर्फ सरकार नही लगा सकती। इसे रोकने के लिए समाज को आगे आने की जरूरत है। इसके चलते मंत्री को हाइकोर्ट से खरी खोटी सुननी पड़ी। सरकार की सक्रियता जरूर बढ़ी लेकिन कदाचारियों के खिलाफ सख्त टिप्पणी से परहेज किया गया।
 जेडीयू सरकार के सहयोगी दल आरजेडी के प्रमुख लालू प्रसाद ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि उनका वश चले तो परीक्षार्थियों को किताब ले जाने की छूट दे दिया जाता। पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की टिप्पणी भी मंत्री को हटाने तक सिमित रही। विपक्षी दल बीजेपी भी यह कहकर औपचारिकता पूरी कर दी कि इससे बिहार का गलत संदेश जा रहा है। यह किसी एक सरकार की बात नही है। दरअसल, कदाचार मंे सरकारों के सियासत की सेहत का राज छिपा है। लिहाजा, कोई भी सरकार कदाचारियों के खिलाफ मोर्चा खोलकर जोखिम नही लेना चाहती।
ऐसा नही कि कदाचार पर अंकुश लगाना संभव नही है। 1972 में तत्कालीन मुख्यमंत्री केदार पांडे के सख्ती के बाद कदाचार थम गया था। लेकिन समय के साथ यह बड़ा आकार लेता चला गया। नब्बे के दशक में यह सिलसिला बढ़ गया। 1996 मंे पटना हाइकोर्ट जब सख्त हुई तब 12 फीसदी रिजल्ट हुआ था। इसके बाद पठन पाठन का सिलसिला तेज हुआ था। लेकिन धीरे धीरे कदाचार फिर आकार लेने लगा।
लिहाजा, 1997 में 40, 1998 में 45, 1999 में 52 फीसदी लोगों ने पास किया। जबकि बिहार विधानसभा के चुनावी साल 2000 में पास करनेवालों की तादाद 57 फीसदी पहुंच गया। 2005 और 2010 में 70-70 फीसदी परीक्षार्थी उतीर्ण हुए। 2005-10 के बीच 70 फीसदी से नीचे का रिजल्ट रहा। 2015 की परीक्षा में जारी कदाचार को नवंबर में होनेवाले विधान सभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है।
दरअसल, कदाचार के लिए सरकार की नीतियां काफी हद जिम्मेवार रही है। अंक के आधार पर नौकरी में प्राथमिकता, प्रथम श्रेणी के विधार्थियों को आर्थिक मदद और वितरहित संस्थानों में छात्रों की संख्या और श्रेणी के हिसाब से अनुदान जैसी नीतियों से कदाचार को बढ़ावा मिला है। पठन की चरमाई स्थिति, कुशल शिक्षकों का अभाव, बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसे कई वजह है। राज्य के बजट में शिक्षा के लिए सर्वाधिक 22 हजार करोड़ रूपए का प्रावधान किया गया है। लेकिन बजट की बड़ी राशि अनुदान आदि में खर्च कर दिए जाते हैं।
दूसरे प्रदेशों में भी कदाचार सियासी सेहत बना हुआ है। 1992 मंे यूपी की तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह और शिक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नकल विरोधी अध्यादेश लाया था। तब 15 फीसदी रिजल्ट हुआ था। परिणामस्वरूप बीजेपी की सरकार चली गई थी। उसके बाद समाजवादी और बहुजन समाजपार्टी ने इस कानून को निरस्त कर दिया था। हालांकि 1998 में राजनाथ सिंह के अगुआई में जब बीजेपी की सरकार बनी तब उस कानून में संसोधन कर थोड़ी ढ़ील दी गई। कुछ ऐसे ही वजह है जिसके कारण कोई भी सरकार कदाचार के खिलाफ सख्त फैसले लेने से परहेज करती रही है।

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