Saturday, 30 January 2016

जिद करो दुनिया बदलो-जिन्हें दो बार दाखिला के लिए लौटा दिया, उन्होंने बनाई दुनिया में पहचान

 अशोक प्रियदर्शी
          बात तीन दशक पुरानी है। बिहार के नवादा जिले के पकरीबरावां प्रखंड के कोननपुर गांव के नरेंद्रपाल सिंह आइएससी पास किया था। वह बैचलर आॅफ फाइन आर्ट इन पेंटिग में दाखिला के लिए पटना यूनिवर्सिटी के काॅलेज आॅफ आर्ट एंड क्राफ्ट में आवेदन किया था। लेकिन तत्कालीन प्राचार्य ने साइंस का विधार्थी रहने के कारण उन्हें दाखिला लेने से इंकार कर दिया था। प्राचार्य का तर्क था कि साइंस के विधार्थी आर्ट के क्षेत्र में ज्यादा दिनों तक नही टिक सकते। आर्टिटस्ट का एक सीट बेकार चला जाएगा। अगला साल फिर नरेंद्रपाल प्रयास किया। लेकिन निराशा हाथ लगी। नरेंद्रपाल कहते हैं कि तीसरे प्रयास मेें उनका दाखिला तब हुआ जब वह जानबुझकर केमिस्ट्री में फेल कर गए। नरेंद्रपाल कहते हैं कि उनका बचपन से चित्रकार बनने का सपना था।  

नरेंद्रपाल का जिद ही था कि आज वह देश के प्रमुख चित्रकारों में हैं। उनके चित्रों भारत के अलावा पांच देशों में प्रदर्शित हो चुकी है। नरेंद्रपाल के चित्रों का प्रदर्शन शिकागो (अमेरिका), बर्लिन (जर्मनी),वार्सिलोना (स्पेन), साउथ कोरिया, इटली में हुआ। पिछले साल चेक गणराज्य के प्राॅग नेशनल गैलरी में ‘ओरिएंटल एंड टेमपररी- दि आर्ट आॅफ एशिया’ की प्रदर्शनी में उनका चित्र शामिल हुआ।  प्राॅग के नेशनल गैलरी में किसी भारतीय के लिए पहला अवसर है। खास कि जिन देशों में नरेंद्रपाल के चित्रों की प्रदर्शनी हुई, उसका खर्च भी आयोजक देशों ने उठाया। नरेंद्रपाल के मुताबिक, मार्च- अप्रैल में इटली में प्रदर्शनी की जाएगी।
         यही नहीं, नरेंद्रपाल की जिद ने प्राचार्य के अवधारणा को बदल दिया। प्राचार्य पांडेय सुरेंद्र जी के रिटायरमेंट के बाद लखनउ में जब नरेंद्रपाल से मुलाकात हुई तब उन्होंने गले लगाकर आर्शीवाद दिया। नरेंद्रपाल कहते हैं कि शिक्षक और अभिभावक के नजरिया भी बदल गया। बचपन में चित्रकारी में लीन रहने के कारण डांट सुननी पड़ती थी।

नरेंद्रपाल के चित्रकारी की खासियत
        नरेंद्रपाल अमूर्तन चित्रशैली की अमिट छाप छोड़ी है। इसमेें संकेत के जरिए चित्रित किया गया है। इसका दृष्टिकोण नाम दिया गया। नरेंद्रपाल ने सर्कस, नायिका, लुकिंग ग्लास जैसे दर्जनों सीरिज के जरिए देश दुनिया में पहचान बनाई। इटली के फ्रेड्रिको फैलिनी पर आधारित ला-डोक्चे-बिटा यानि स्वीट लाइफ पर उनकी चित्रकारी काफी ख्याति दिलाई।
        बहरहाल, नरेंद्रपाल दी रिमेंस आॅफ ऐस्टरडे (कल का अवशेष) सीरिज पर काम कर रहे हैं। नरेंद्रपाल कहते हैं कि देश और दुनिया की विस्मृत हो रही चीजों को चित्र के जरिए बनाये रखने की कोशिश की जा रही है। इटली और मिश्र जैसे देश इस दिशा में प्रयास करती रही है। लेकिन भारत पुरानी चीजों को भूलती जा रही है। ऐसे में उनका प्रयास चित्रकारी के जरिए उसे जीवित रखना है। बैलगाड़ी की विदाई, वट सावित्री पूजा, हैंडमील (जाता), निर्वाण और प्रकृति, मूर्तिकला, बाइस्कोप, नौटंकी जैसे चित्रकारी शामिल है।

सम्मानित
     

पिछले साल बिहार के खेल, युवा और संस्कृति मंत्रालय ने नरेंद्रपाल को वरिष्ठ चित्रकार राधामोहन प्रसाद आवाॅर्ड  से सम्मानित किया है। उन्हें एकरीलिक पेंिटग के लिए नार्थन रिजन अवार्ड मिल चुका है। उन्हें बिहार यंग जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने बिहार श्री का अवार्ड दिया। वह आॅल इंडिया पेंटिंग जज कमेटी के मेंबर रहे हैं। ऐसे सम्मानों की सूची लंबी है।



जिस चित्रकारी के लिए सुनते थे डांट आज वही बनी पहचान

अशोक प्रियदर्शी
          बात तीन दशक पहले की है। बिहार के नवादा जिले के पकरीबरावां प्रखंड के कोननपुर निवासी नरेंद्रपाल सिंह आइएससी पास किया था। वह बैचलर आॅफ फाइन आर्ट इन पेंटिग की पढ़ाई के लिए पटना यूनिवर्सिटी के काॅलेज आॅफ आर्ट एंड क्राफ्ट में दाखिला के लिए आवेदन किया था। तब प्राचार्य उन्हें साइंस का विधार्थी रहने के कारण दाखिला नही लिया।  अगले साल भी नरेंद्रपाल को निराशा हाथ लगी। तीसरे प्रयास में दाखिला तब हुआ जब वह जानबुझकर रसायण में फेल कर गए थे। दरअसल, प्राचार्य को आशंका थी कि दूसरे क्षेत्र में अवसर मिल जाने के बाद नरेंद्र बीच में आर्ट की पढ़ाई छोड़ देगा। लिहाजा, यह  सीट खाली रह जाएगी।
         लेकिन नरेंद्रपाल ने अपने भीतर के चित्रकारी को देश और दुनिया के समक्ष प्रस्तुत कर प्राचार्य के आशंका को भ्रम करार दे दिया। रिटायरमेंट के बाद लखनउ में जब प्राचार्य पांडेय सुरेंद्र से नरेंद्रपाल की मुलाकात हुई तब गला लगाकर आशीर्वाद दिया। नरेंद्रपाल के लिए यह पहला अवसर नही था। मैट्रिक के पहले भी वह चित्रकला के कारण शिक्षक और अभिभावक से डांट सुनते थे।  लेकिन नरेंद्रपाल अडिग नही हुआ। यही वजह है कि आज चेक गणराज्य के प्राॅग नेशनल गैलरी में ‘ओरिएंटल एंड टेमपररी- दि आर्ट आॅफ एशिया’ की प्रदर्शनी में उनकी पेटिंग्स को प्रदर्शित किया गया है। यह प्रदर्शनी पहली अप्रैल से लगी है जो सितंबर तक रहेगी। खास कि प्राॅग के नेशनल गैलरी में किसी भारतीय के लिए पहला अवसर है। 
       नरेंद्रपाल की पांच पेटिंग्स- बैलगाड़ी की विदाई, वट सावित्री पूजा, हैंडमील (जाता), निर्वाण और प्रकृति को शामिल किया गया है। चीन और जापान की तरफ से पुराने मूर्तिकला और पंेटिग्स को प्रदर्शित किया गया है। इतना ही नही, नेशनल गैलरी के कलेक्शन में नरेंद्रपाल के पेंिटग को शामिल किया गया है। इसके पहले भारत के एमएस हुसैन, चित प्रसाद और गायटोंडे के पेटिंग्स शामिल था। 
 विनोद भारद्धाज इस प्रदर्शनी के क्यूरेटर हैं।  
नरेंद्रपाल मानते हैं कि लटुस्का की मैनेजिंग डायरेक्टर सरका लिटनोवा जी के योगदान के कारण यह संभव हुआ है। देखें तो, इसके पहले नरेंद्रपाल अमेरिका के सिकागो, जर्मनी के बर्लिन, स्पेन के वार्सिलोना, साउथ कोरिया के भूसान में प्रदर्शनी लगा चुके हैं। चेक गणराज्य के बाद जापान के ओसाका और क्योटो में प्रदर्शनी लगाने की योजना है।




नरेंद्रपाल की खासियत
       नरेंद्रपाल अमूर्तन चित्रशैली की अमिट छाप छोड़ी है। इसमें सिंबल यानि संकेत के जरिए चित्रित किया गया है। इसका दृष्टिकोण नाम दिया गया। नरेंद्रपाल ने सर्कस, नायिका, लुकिंग ग्लास जैसे दर्जनों सीरिज के जरिए देश दुनिया में अपनी पहचान बनाई है। इटली के फ्रेड्रिको फैलिनी पर आधारित ला-डोक्चे-बिटा यानि स्वीट लाइफ पर उनकी चित्रकारी काफी ख्याति दिलाई। 
       बहरहाल, नरेंद्रपाल दी रिमेंस आॅफ ऐस्टरडे (कल का अवशेष) नाम से सीरिज पर काम कर रहे हैं। नरेंद्रपाल कहते हैं कि देश और दुनिया की विस्मृत हो रही चीजों को चित्र के जरिए बनाने रखने की कोशिश की जा रही है। बदले समय में स्वरूप बदला है लेकिन नींव नही। 

सम्मानित
      नरेंद्रपाल को बिहार के खेल, युवा और संस्कृति मंत्रालय ने वरिष्ठ चित्रकार राधामोहन प्रसाद आवाॅर्ड से सम्मानित करने की घोषणा की है। 2005 में एकरीलिक पेंिटग के लिए नार्थन रिजन अवार्ड मिला। बिहार यंग जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने बिहार श्री का अवार्ड दिया। वह आॅल इंडिया पेंटिंग जज कमेटी के मेंबर रहे हैं। ऐसे सम्मानों की सूची लंबी है।

 


Saturday, 23 January 2016

रूकमिनी साड़ी में छिपाकर बचा ली थी नेता जी का जारी नोट, रूकमिनी परिवार के लिए है बड़ी थाती

अशोक प्रियदर्शी
          
      नेताजी सुभाष चंद्र बोस का सहयोग करने के कारण नवादा जिले के प्रयाग सिंह के कैंटीन को बंद करा दिया गया था। प्रयाग के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया गया था। प्रयाग परिवार को कोलकाता छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया था। यही नहीं, प्रयाग परिवार के साथ अत्याचार किया गया था। धरों की तलाशी ली गई थी। तलाशी में नेताजी द्वारा जारी नोट मिले थे। लिहाजा, प्रयाग दंपति के साथ मारपीट की गई थी। ताज्जुब कि प्रयाग की पत्नी राधा रूकमिनी ने एक हजार रूपए का नोट साड़ी में छिपाकर बचा लीं थी। बांके सिंह दादा प्रयाग सिंह से जुड़ी यादों को साझा कर रहे थे।

          बांके सिंह मानते हैं कि यह नोट देश की आजादी में उनके पुरखों के संघर्ष को दिखाता है। यह उनके परिवार के लिए सबसे बड़ी थाती है। इसे किसी कीमत पर खोना नही चाहते। यह नोट नेताजी के प्रमुख सहयोगी से दादाजी को मिला था। तब यह नोट गुलाम भारत में आजाद भारत की निशानी थी। इसे नेताजी ने जारी किया था। 
दरअसल, प्रयाग सिंह के परिवार पर कोलकाता के सीसीएफ आॅफिस परिसर में ब्रिट्रिश सैनिकों पर बम विस्फोट कराने के लिए जासूसी का आरोप था। आरोप था कि कैंटीन में बम विस्फोट की साजिश रची गई थी। इसमें प्रयाग और उनके भाई महावीर की भूमिका ने अदा की थी। हालांकि बम फेंका गया था, लेकिन विस्फोट नही हो सका। लेकिन ब्रिट्रिश सैनिक बौखला गए। क्योंकि ब्रिट्रिश सेना को आजाद हिंद फौज के हमले से बचाने के लिए फोर्ट बिलियम से हटाकर कोयला घाट स्थित सीसीएफ परिसर में ठिकाना बनाया गया था।

दरअसल, बिहार के नवादा जिले के नरहट प्रखंड के कुशा गांव निवासी प्रयाग सिंह और महावीर सिंह गुड़ का कारोबार करते थे। कारोबार मे मुनाफा नही था। इसलिए कोलकाता चले गए थे। कोलकाता मंे रेलवे मंत्रालय के कोयला घाट में कैंटीन खोला था। प्रयाग सिंह कैंटीन संभालते थे। जबकि महावीर सिंह समुद्री जहाज में चाय पिलाया करते थे। 

        तभी महावीर को रंगून में नेताजी की एक सभा में शामिल होने का अवसर मिला था। उसके बाद से महावीर आजाद हिंद फौज का सक्रिय सेनानी बन गए थे। महावीर अपने भाई के जरिए खुफियागिरी कराते थे। आजाद हिंद फौज के लोग कैंटीन में बैठा करते थे। बाद में महावीर सिंह की लड़ाई के दौरान मौत हो गई थी। लेकिन प्रयाग सिंह जुड़े थे।

        बांके सिंह के मुताबिक, दादा बताया करते थे कि उनपर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया गया था। हालांकि आजाद हिंद फौज बचाओ समिति के अध्यक्ष असरफ अली के नेतृत्व में उग्र विरोध हुआ था। तब मुकदमा उठा लिया गया था। बांके सिंह के पुत्र जीवनलाल चंद्रवंशी कहते हैं कि उनके दादा दादी का यह योगदान उन्हें आज भी साहस प्रदान करता है।
 

Thursday, 21 January 2016

सास जब बहू बनकर सोचती हैं, तब बेटी के रूप में दिखती है बहू



डाॅ.अशोक कुमार प्रियदर्शी
बात एक हफ्ते पहले की है। बहू खाना बना रही थी। सास को स्नान करना था। पानी गरम करने में देर हो गई। सास ने किचन से गुथा हुआ आटा उठाकर पड़ोसी के घर में फेंक दिया। उधर पड़ोसी चिल्लाते हुए निकलती है। प्रतिक्रिया में बहु हाथ जोड़ती हुई निकलती है। पड़ोसी महिला से सासू मां की गलती के लिए बहू माफी मांगती है। शेखपुरा जिले के बरवीघा प्रखंड के तेउस निवासी बीपी सिंह की पुत्रवधू सोनी के लिए किसी एक दिन की घटना नही है। उनकी सास अक्सर कोई न कोई ऐसा हरकत कर दिया करती हैं। लेकिन सासू की गलतियों को उनकी बहु नजरअंदाज कर दिया करती है। उनकी सास विमला कभी शौचालय का नल खुला छोड़ देती हैं। कभी गैस खुला छोड़ देती हैं। कभी पानी की जगह दूध फेंक देती है। 
           दरअसल, विमला की मानसिक हालात अक्सर असंतुलित हो जाया करता है। वह लंबे समय से अस्वस्थ्य हैं। इलाजरत हैं। लेकिन सास की गलतियों को कभी गंभीरता से नही लेती। सोनी सास की हर जरूरतों का ख्याल रखती हैं। लिहाजा, इस अवस्था में भी सास बहू  की जिदंगी खुशहाल तरीके से कट रहा है। बता दें कि सोनी लव मैरेज शादी की थी। लेकिन उनका संस्कार अरेंज मैरेज से कम नही। दुखद कि दो साल पहले सोनी के पति की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई है। लेकिन प्रतिकूल परिस्थिति में भी सोनी अपना कर्तव्य नही भूली है। सोनी कहती है कि उनकी मां अस्वस्थ्य रहती तो क्या उन्हें छोड़ देती। उन्हें भी बेटे और बेटी है। ऐसे में मैं सास के साथ अच्छा बर्ताव नही रखूंगी तो अगली पीढ़ी क्या सिखेगी।


बिजनौर में बहू के हाथों पिटते हुए सास का वीडियो लोगों को झकझोर दिया था। खासकर बहुओं को काफी लज्जित कर दिया था। लेकिन बिहार के सोनी की कहानी उतरप्रदेश के बिजनौर में घटित घटना के प्रतिकूल है। बिजनौर की घटना से इतर भी सास बहू की तस्वीर है। इसे नकारा नही जा सकता। नवादा नगर के नवीननगर निवासी सास धुरोपति देवी और बहू बबीता देवी के मधुर संबंध अनुकरणीय है। बबीता सास को खाना खिलाने के बाद खाना खाती है। वह इसलिए नही कि यह परंपरा है। धुरोपति देवी कहती हैं कि पति की मौत के बाद वह अपनी सेहत का ख्याल रखना छोड़ दी थीं। उनकी तबियत खराब हो गई थी। लेकिन तब से बहू उनका ख्याल रख रही हैं। बहू उन्हें खाना खिलाकर या फिर साथ खाती हैं। यह सिलसिला सालों से चल रहा है। 
           बहू का प्यार एकतरफा नही है। सास भी बहू का काफी ख्याल रखती हंै। बहू को जब बाजार निकलना होता है तब उनके पर्स में पैसे का ख्याल सास रखती हैं। बबीता मानती हैं कि ऐसी सास किस्मतवालों को मिलती है। बता दें कि धुरोपति देवी स्व नागेन्द्र विधार्थी की पत्नी हैं। धुरोपति देवी के तीन बेटे हैं। उन्हें तीन बेटे हैं। बेटी नही है। लेकिन धुरोपति पुत्रवधूओं को बेटियां मानती हैं। उनकी दो पुत्रवधूएं बाहर रहती हैं। बबीता उनके साथ रहती हैं। बबीता के पति मुकेश विधार्थी सामाजिक कार्यकर्ता हैं।
        
एक टाॅफी के होते हैं तीन टुकड़े-
नवादा जिले के पकरीबरावां प्रखंड के कवला गांव निवासी कपिलदेव प्रसाद के दो पुत्र हैं। बड़े पुत्र नवनीत टीचर हैं। जबकि छोटा पुत्र अंटज बिजनेसमैन। पूरा परिवार एक छत के नीचे नवादा में रहते हैं। जहां सास-बहुएं के बीच की कहानी मिसाल है। जयरानी देवी कहती हैं कि उनके किसी बहू को कोई एक टाॅफी देता है तो बहुएं का प्रयास होती है कि उस टाॅफी का एक एक टुकड़ा सभी के मुंह में चला जाय। श्वेता कहती हैं कि उनकी सास उन्हें मां से भी ज्यादा प्यार करती हैं। हर खुशी का ख्याल रखती हैं। उन्हें भी लगता है कि सास को कष्ट नही पहुंचे। तीज में बहुएं को साड़ी का गिफ्ट देते हैं तो जितिया में वेलोग गिफ्त करती हैं।

बहु के बिना नही देखती सिरियल्स 
ये बहू कहां हो! काला टीका सिरियल शुरू हो गया है। आ रही हूं मां। उसके बाद सास और बहू साथ बैठकर सिरियल देखती हैं। राजेन्द्र नगर की गिरिजा देवी और उनकी बहू रेणु देवी की यह रोज की कहानी है। दोनों के बीच उम्र का फासला है। लेकिन काफी सामंजस्य है। सिरियल की कहानी जब टीवी पर नही समझ पाती तो उसे बहू समझाती हैं। खास कि गिरजा और रेणु के बीच यह मधुर रिश्ता टीवी सिरियल्स तक सीमित नही है। गृहस्थ जीवन में भी मिसाल दिया जाता है। शायद ही कोई दिन ऐसा हो जब सास को बहू तेल नही लगाती। यही नहीं, बहू जब बीमार पड़ती है तब सास भी नही चुकती है। 
           बता दें कि गिरिजा के पति  किशोरी प्रसाद बीसीइओ पद से रिटायर हैं। 80 साल के हैं। उनके एक पुत्र चंद्रशेखर प्रसाद यूपी के गुरसहायगंज एसबीआई ब्रांच के मैनेजर हैं, जबकि दूसरे शशिभूषण प्रसाद निजी कंपनी में कार्यरत हैं। गिरिजा कहती हैं कि मैं भी कभी बहु थी। इसलिए बहु को उसी नजर से देखती हूं। उनकी बहु भी उन्हें मां से ज्यादा सम्मान करती हैं। रेणु मानती हैं कि धर में दो सदस्य का परिवार है। इसमें तालमेल नही रखूंगी तो एक पल बिताना भी मुश्किल हो जाएगा।

क्या कहती हैं डॉ मीता-
          पटना इगनू की सहायक क्षेेत्रीय निदेशक डाॅ मीता कहती हैं कि सास बहू के बीच कड़वाहट की वजह जेनरेशन गैप है। दरअसल, विवाद की वजह ट्रेडिशनल और प्रैक्टिल विचारधारा होता है। सास ट्रेडिशनल जबकि बहुएं प्रैक्टिकल। लिहाजा, वैचारिक गतिरोध उत्पन्न होता है। लेकिन जो लोग इन चीजों को एडजस्ट कर लेते हैं उनके घरों में यह परेशानी नही होती। हालांकि किसी एक के बदलाव से यह संभव नही है। दोनों पक्ष को थोड़ा थोड़ा बदलने की जरूरत है। जिन घरों में यह बदलाव आ जाता है उन घरों में सास बहू के रिश्ते मिसाल बन जाते हैं।


Wednesday, 20 January 2016

शिव मंदिर निर्माण नही करा पाने का पश्चाताप , साइकिल से बारह ज्योतिर्लिंग का दर्शन से पूरा कर रहे उदय


अशोक प्रियदर्शी
बात आठ साल पहले की है। बिहार के नवादा जिले के सिरदला प्रखंड के रवियो गांव में खुदाई के दौरान एक शिवलिंग निकला था। ग्रामीणों ने उस स्थल पर मंदिर निर्माण कराने का निर्णय लिया था। इसकी अगुआई के लिए ग्रामीण उदय प्रसाद को चुना गया। ग्रामीणों ने उदय को मंदिर निर्माण में सहयोग करने का आश्वासन दिया था। उदय प्रसाद पूरी निष्ठा और आस्था से मंदिर निर्माण में जुड़ गए थे।
लेकिन कालांतर में ग्रामीण पीछे हटते चले गए। उदय की आर्थिक हैसियत ऐसी नही थी कि वह मंदिर निर्माण का खर्च स्वयं वहन कर सकें। क्योंकि वह साधारण किसान हंै। फिर भी जरूरी खर्च में कटौती कर उदय मंदिर का निचला ढांचा का निर्माण करा सके। लंबे इंतजार के बाद उदय को जब महसूस हो गया कि मंदिर निर्माण कराना अब उनके बस की बात नही।
तब डेढ़ माह पहले उदय ने देश के बारह ज्योर्तिलिंग का दर्शन करने का निर्णय लिया। विगत साल 25 नवंबर को साइकिल से ज्योतिर्लिंग दर्शन के लिए रवाना हुआ। शुरूआत झारखंड के बैजनाथधाम से किया। फिर आंध्रप्रदेश के श्रीशैल पर्वत पर स्थित मलिकार्जुन, तमिलनाडु के रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग का दर्शन किया। 17 जनवरी को उदय महाराष्ट्र के भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग का दर्शन किया है।


कौन है उदय प्रसाद
      45 वर्षीय उदय प्रसाद नवादा जिले के सिरदला प्रखंड के रवियो गांव निवासी राजेन्द्र यादव के पुत्र हैं। वह चार भाई है। उनके संयुक्त परिवार में छह विगहा जमीन है। उनके परिवार में कुल 25 सदस्य हैं। उदय के दो पुत्र और एक पुत्री है। सबसे बड़ी बेटी है जिसका उम्र 13 साल है।

कैसे संभव हो रहा ज्योतिर्लिंग दर्शन-
      उदय प्रसाद के मात्र 8500 रूपए है। उदय का सफर में कोई खर्च नही है। वह साइकिल से सफर कर रहे हैं। उदय का खर्च सिर्फ खाने में है। ज्यादातर मठ मंदिर में ठहर जाते हैं। हालांकि बीच बीच में गांववाले भी उदय को ठहरने और खाने का बंदोवस्त कर दिया करते हैं।

बारह ज्योतिर्लिंग कौन है-
             हिन्दू धर्म पुराणों के अनुसार शिवजी जहाँ-जहाँ स्वयं प्रगट हुए उन बारह स्थानों पर स्थित शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंगों के रूप में पूजा जाता है। सौराष्ट्र प्रदेश (काठियावाड़) में श्रीसोमनाथ, श्रीशैल पर श्रीमल्लिकार्जुन, उज्जयिनी (उज्जैन) में श्रीमहाकाल, ओंकारेश्वर अथवा अमलेश्वर, वैद्यनाथ, डाकिनी नामक स्थान में श्रीभीमशङ्कर, सेतुबंध पर श्रीरामेश्वरम, दारुकावन में श्रीनागेश्वर, वाराणसी में श्रीविश्वनाथ, गौतमी (गोदावरी) के तट पर श्री त्र्यम्बकेश्वर, केदारखंड में श्रीकेदारनाथ और शिवालय में श्रीघुश्मेश्वर। धार्मिक मान्यता है कि जो मनुष्य प्रतिदिन इन बारह ज्योतिर्लिंगों का नाम लेता है उनके सातों जन्म का पाप मिट जाता है।

कहा कहते हैं 
  उदय कहते हैं कि द्वाद्वश ज्योतिर्लिंग के दर्शन के बाद वह गांव लौटेंगे। मंदिर नही बना पाने का पश्चाताप ज्योतिर्लिंग के दर्शन से पूरा करना चाहते हैं।

Saturday, 16 January 2016

हर 32 घंटे में मनहूस खबर लेकर आ रही खूनी सड़क

 

अशोक प्रियदर्शी
         विगत 11 जनवरी को बिहार के नवादा जिले के रजौली थाना के सिमरकोल मोड़ के समीप बस से मोटरसाइकिल की टक्कर हो गई। इस घटना में काजीचक निवासी मुन्द्रिका यादव के पुत्र नीतीश कुमार की मौत हो गई। जबकि लक्ष्मी विगहा निवासी रामस्वरूप यादव घायल हो गया। वहीं सिमरकोल निवासी साइकिल सवार हैदर मियां भी दुर्घटनाग्रस्त हो गया। 
         बिहार के नवादा जिले में सड़क दुर्घटना की यह पहली घटना नही है। इसे आखिरी घटना भी नही कहा जा सकता है। जिले में मौत का यह सिलसिला सालों से जारी है। इसकी तादाद दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। अकेले 2015 में करीब 280 लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं के कारण हुई है। देखें तो, हर चार दिन में तीन लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं के चलते हो रही है। यानि हर 32 घंटे में एक व्यक्ति की जान जा रही है। 
         2014 के आकड़े को भी 2015 पार कर गया है। 2014 में करीब 260 लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं के कारण हुई थी। उससे पहले यह आकड़ा 200 के आसपास रहा है। लेकिन दिनोंदिन सड़क दुर्घटनाओं की तादाद बढ़ती ही जा रही है। हर रोज किसी न किसी परिवार के लिए सड़क दुर्घटना मनहूस खबर लेकर आ रही है। घायलों को जोड़ दें तो स्थिति और भी भयावह है।
          ताज्जुब कि इन घटनाओं से भी लोेग सबक नही ले रहे हैं। हर तरफ लापरवाही देखी जा रही है। आमतौर पर इसे प्रकृति की नियति मानकर लोग भुगतने को विवश हैं। वाहन चालकों की लापरवाही भी कम नही हो रही है। बाइक चालक भी ऐसी घटनाओं से सबक नही ले रहे हैं। सड़क सुरक्षा सप्ताह 10 जनवरी-16 जनवरी के दौरान लोगों को जागरूक किया जाना है। लेकिन यह रैली, सेमिनार और बैठकों तक सिमट कर रह गई है। यही वजह है कि घटनाओं की फेहरिस्त कम नही हो रही है। सरकार, प्रशासन और विभाग औपचारिकताएं निभा रही है।

2015 की प्रमुख घटनाएं
      2015 में एनएच- 31 पर नवादा जिले के मुफसिल थाना के केंदुआ गांव के समीप स्कार्पियों गाड़ी के पलट जाने से एक ही परिवार के आठ बारातियों की मौत हो गई। जबकि तीन अन्य बाराती घायल हो गए। इसी तरह, एनएच-82 पर नारदीगंज थाना के महादेवविगहा गांव के समीप सवारी गाड़ी और ट्रक के बीच टक्कर में चार बारातियों की मौत हो गई, जबकि 11 गंभीर रूप से घायल हो गए। काशीचक के खखरी गांव निवासी किसान संजीत कुमार और कृष्णमोहन सिंह की ट्रेक्टर पलट जाने से मौत हो गई। सिरदला में बाराती बस के पलट जाने से चार की मौत हो गई। यही नहीं, बिहार- झारखंड की सीमा पर नौवामाइल के समीप हुए एक सड़क दुर्घटना में पांच कांवरिये की मौत हो गई , जबकि 15 कांवरिये घायल हो गए। 

बिहार में कुख्यात नवादा
नवादा जिले का अधिकांश पथ दुर्घटनाओं के कारण खूनी हो गया है। खासकर एनएच-31 पटना-रांची , एनएच-82 बोधगया-राजगीर और नवादा-देवघर पथ काफी कुख्यात है। सड़क दुर्घटनाओें के कारण नवादा का इलाका बिहार में कुख्यात हो गया है।

ट्रामा सेंटर नही
सड़क दुर्घटनाओं के लिए कुख्यात नवादा में पीड़ितों के इलाज के लिए एक भी ट्रामा सेंटर नही है। रजौली और हिसुआ में ट्रामा सेंटर बनाए जाने की मांग काफी समय से की जाती रही है। लेकिन इस दिशा में कोई पहल नही किया जा सका है।

कोट-
समाजसेवी डाॅ बुद्धसेन कहते हैं कि विभाग बगैर कोई जांच पड़ताल के लोगों को घड़ल्ले से लाइसेंस जारी करती रही है। यह एक बड़ा कारण है। यही नहीं, लोग यातायात नियमों का भी पालन नही करते। लोगों को जागरूक करने के लिए सरकार भी प्रयत्यनशील नही दिखती। सरकार के लिए ऐसी घटनाएं महज हादसा भर है।

      जिलाधिकारी मनोज कुमार कहते हैं कि चालकों को यातायात नियमों का अनुपालन कराने के लिए अभियान चलाया जाएगा। इसके लिए अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं। यातायात नियमों के पालन से यात्रा सुखद और सुरक्षित होगी। आमलोगों को भी पूरी तरह जागरूक रहने की जरूरत है। 

Tuesday, 12 January 2016

लाचार हुई आनंदी तो परिवार ने छोड़ा, योगा बना सहारा, अब औरों की बनी मददगार

अशोक प्रियदर्शी
         
 आठ साल पहले की बात है। नवादा नगर के गोला रोड की 65 वर्षीया आनंदी देवी शरीर से लाचार हो गई थी। वह गठिया-वाता, कमर दर्द, टयूमर, कब्जियत और पेट फेंकने जैसी कई गंभीर शारीरिक व्याधियों से घिर गई थी। चिकित्सक का नुस्खा भी काम नही आ रहा था। 85 किलोग्राम वजन था। चलना फिरना दुश्वार था। परिवार ने भी लाचार आनंदी से मुंह मोड़ लिया था। तिरस्कृत आनंदी परेशानियों से उबरने के लिए समीप के आर्य समाज मंदिर में जाने लगी थी। 
         तभी उन्हें पटना में आयोजित योग शिविर की जानकारी मिली। पति दीपनारायण प्रसाद के सहयोग से पटना में हफ्ते भर प्राणायाम और योगासन सीखी। उसे वह घर आकर भी बरकरार रखी। 27 मई 2010 में मुहल्ले में निःशुल्क योग शिविर शुरू हुआ। यह शिविर आनंदी के लिए काफी उपयोगी साबित हुआ। वह उस शिविर में 2 अक्तूबर से जाने लगी। आनंदी कहती हैं कि योगाभ्यास के कारण उनके जीवन की दशा और दिशा बदल दी। योगासन और प्राणायाम से 33 किलोग्राम वजन घट गया। बीमारियों से राहत मिली। चलने फिरने लगी। सबसे महत्वपूर्ण कि परिवार ने भी उन्हें अपना लिया।
         बहरहाल, आनंदी अब दूसरों की प्रेरणास्त्रोत बनी है। जो लोग आनंदी को मरनासन्न हाल में देखे थे, उनसबांे के सामने उनका स्वस्थ्य होना लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया। मुहल्ले की मंजू देवी कहती हैं कि आनंदी देवी की हालत देखकर वह सिहर उठती थी। लेकिन अब वह उनकी योग गुरू हैं। उन्हें भी योगासन से काफी लाभ हुआ है। मंजू अकेली महिला नही हैं, जिन्हें योगासन लाभ हुआ है। उर्मिला देवी कहती हैं कि वह योग और प्राणायाम को बेकार की चीजें मानती थी लेकिन आनंदी की प्रेरणा से जब वह योगा से जुड़ी तो पुराना एलर्जी दूर हो गई है।

        मुहल्ले की वीणा देवी, सरिता आर्या, मणिमाला देवी, चंपा देवी, पुष्पा देवी, सविता आर्या, ज्योति देवी, स्टेशन रोड की द्रोपदी देवी, विधा देवी, सकुन्तला देवी जैसी कई महिलाएं हैं, जो आनंदी की प्रेरणा से योगाभ्यास से जुड़ीं। अब उन महिलाओं के लिए आनंदी मददगार बनी है। स्टेशन रोड निवासी गोपालजी कहते हैं कि आनंदी देवी उनके लिए भी प्रेरणास्त्रोत रही हैं। शिविर के संचालक कन्हैया सिंह कहते हैं कि आनंदी जब आयी थी तब वह लाचार थी। लेकिन अब वह लाचार लोगों की मददगार बनी हुई है। वह कहती हैं कि जिन परिस्थितियों से वह गुजरी उन परिस्थितियों से औरों को नही गुजरना पड़े इसलिए दूसरों को योगाभ्यास के लिए प्रेरित करती रहती हूं।