Monday, 10 October 2016

पवन कुमार दीक्षित -जिन्होंने अपनी फीस के लिए कभी हाथ नही फैलाई

डाॅ. अशोक प्रियदर्शी
बात 54 साल पहले की है। साल 1962 में बिहार के नवादा जिले के पार नवादा में सत्येंद्र हाई स्कूल की स्थापना की गई थी। बुंदेलखंड निवासी पवन कुमार दीक्षित इसके संस्थापक सदस्य थे। वह स्कूल के प्रथम टीचर के रूप में योगदान दिया। कई सालों तक प्रिसिंपल रहे। 1969 में राज्य सरकार स्कूल को अधिग्रहण कर लिया। तब स्कूल की जिम्मेवारी अपने सहयोगी को सौंपकर दीक्षित एक नई राह पर चल दिए। वह वकालत शुरू की। पिछले 45 सालों से वह नवादा सिविल कोर्ट में वकालत कर रहे हैं। 82 वर्षीय दीक्षित अपने वकालत पेशे से संतुष्ट हैं। उनकी संतुष्टि की वजह पैसे कमाना नही बल्कि लोगों का प्यार पाना रहा है। 
        स्थानीय अधिवक्ताओं के मुताबिक, वह केस की संख्या पर कभी ध्यान नही दिया, वह मुवकिल की मुश्किलों पर गौर किया। वह ऐसे मामले की पैरवी करने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई, जिन्हंे न्याय की ज्यादा जरूरत थी। दरअसल, दीक्षित वकालत पेशे को रोजगार नही बल्कि सेवा का जरिया माना। लिहाजा, उन्हें रूपए से ज्यादा समाज में प्रतिष्ठा मिली। उन्हें जो दे दिया वह ले लिए। फीस के लिए कभी हाथ नही फैलाई। लिहाजा, उनकी ईमानदार छवि कायम हुई। हालांकि दीक्षित मानते हैं कि ईमानदारी एक लंबी प्रक्रिया है कि कोई अछूता नही रह जाता। वह कहते हैं कि पेशा की अवधारणाएं है जिसका निर्वहन करनी पड़ती है। लेकिन चिंता इस बात कि है कि हमें न्यायाधीश बनकर सोचने के बजाय अपराधी बन गए।
दरअसल, दीक्षित अपने पिता के व्यक्तित्व से काफी प्रभावित थे। उनके पिता पंडित श्रीधर दीक्षित आजादी के समय से सामाजिक जीवन में सक्रिय थे। देश के कई बड़े आंदोलनकारियों से उनका सरोकार रहा। श्रीधर दीक्षित अधिवक्ता थे। उनकी इच्छा थी कि उनका पुत्र भी वकालत करे। पवन दीक्षित कहते हैं कि वह पिता की राह पर चलने की कोशिश की, लेकिन वैसा नही बन पाए। देखें तो, उनके पिता बेहतर फुटबाॅल खिलाड़ी भी थे, तबतक जीवित रहे तबतक उसके कैप्टन रहे। नाटक के एक्टर और डायरेक्टर रहे। वह अच्छे कवि और लेखक भी रहे। अच्छे वक्ता भी रहे।


जब मौका मिला मिसाल प्रस्तुत किया
        पवन दीक्षित को जहां जहां मौका मिला वह मिसाल प्रस्तुत किया। वह चाहते तो सत्येंद्र हाई स्कूल में प्रिसिंपल रह सकते थे। लेकिन अधिग्रहण होते ही रास्ता बदल लिया। राजेंद्र मेमोरियल महिला काॅलेज के संस्थापक सदस्य हैं। वह चाहते तो अंगीभूत होने के समय अपनों को नौकरी दिला सकते थे। लेकिन वह नियत नही बदले। यही कारण है कि जिले में अब भी जब कभी किसी तटस्थ व्यक्ति की याद की जाती है तब पहला नाम दीक्षित का लिया जाता हैं। उन्होंने सामाजिक क्षेत्र में कई उल्लेखनीय काम किया है।
        दीक्षित 1987-91 तक लोक अभियोजक रहे पर वह किसी पक्ष का एक कप चाय तक नही पी। श्रेय इस बात की है कि उस समय किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति ने उनपर दबाव नही बनाया। कई प्रभावशाली लोगों से संपर्क रहे, लेकिन उनसबों ने कभी दखल नही दिया। वह कहते हैं कि हर पेशे में परिवर्तन हो रहा है, इससे वकालत भी अछूता नही है। फिर भी वकालत अच्छा पेशा है। संतोष इस बात की है कि अच्छा से निभ गया। वह जिला उपभोक्ता फोरम के भी पांच साल तक सदस्य रहे। वहां भी अपनी अलग छवि बनाई। वह कहते हैं कि चेयरमैन के पद पर रिटायर पर्सन को नही भेजा जाना चाहिए।

सादगी भरी जिंदगी
दीक्षित की सादगी भरी जिंदगी है। खान पान और रहन सहन साधारण है। उम्र और परिस्थितियों की वजह से दिनचर्या सीमित हो गई है। फिर भी वह हर रोज कैंपस की सफाई करते हैं। पूजा पाठ करते हैं। कोर्ट भी जाते हैं। लौटने के बाद घर पर नियमित रूप से मित्रों के साथ बैठकर बातें करते हैं। 

दीक्षित की पारिवारिक पृष्ठभूमि
       दीक्षित मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड के मूलनिवासी हैं। लेकिन सात आठ पीढ़ी पहले नवादा में आकर बसे थे। लिहाजा, यह इलाका बुंदेलखंड के नाम से जाना जाता है। बुंदेलखंड की रहन सहन, भोजन आदि की परंपरा कायम है। दीक्षित के पांच बेटे और तीन बेटियां हैं। सभी की शादियां हो चुकी है। दीक्षित पुस्तैनी मकान में रहते हैं। जीविका का साधन खेती रहा है। लेकिन बेटे अब नौकरी पेशा में हैं। हालांकि नई पीढ़ी में पुष्प पावन दीक्षित वकालत की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। बाकी चार पुत्रों में प्रफुल पंकज बिजनेसमैन, कमल कोमल लेक्चरर, प्रसून्न टीचर जबकि पीयूष डिफेंस मंत्रालय में कार्यरत हैं। 

सियाराम शर्मा-आजादी के लिए बछड़े का मांस तक खाया, लेकिन पेंशन के लिए हाथ नही फैलाया



डाॅ. अशोक प्रियदर्शी
1942 की बात है। फरहा गांव में अमेरिकन छावनी थी। उस छावनी में करीब 27-28 सिपाही थे। यह पुलिस आंदोलनकारियों को बहुत परेशान कर रही थी। तब पड़ोसी गांव बरेव में सिंघना के बाढ़ो सिंह के नेतृत्व में एक बैठक हुई। इसमें तय हुआ कि पुलिस छावनी को जला देना है। इसके लिए उस छावनी में एक शख्स को नौकर के रूप में शामिल करने का फैसला हुआ। इसके लिए पकरीबरावां के बलियारी निवासी सियाराम शर्मा को चुना गया। चूंिक शर्मा काला थे। लेकिन उन्हें जनेउ पड़ गई थी। लिहाजा, वह जनेउ उतार दिया। और उनका नाम गेनहारी मांझी रखा गया।
         शर्मा ने बताया किया योजना के मुताबिक पुलिस छावनी के आसपास खेलने लगे। चार पांच दिनों के बाद एक अधिकारी ने बुलाया। उसने नाम पूछा और कहा कि कुछ काम करो। यहीं खाना खा लेना। शर्मा बतौर गेनहारी मांझी उस छावनी में काम करने लगे। हर शाम शर्मा बाढ़ो सिंह को पुलिस की गतिविधियों की सूचनाएं दिया करते थे। एक दिन छावनी में बड़ी पार्टी थी। बछड़े का मांस बना था। शर्मा ने कहा कि खाना नही चाहते थे। लेकिन अधिकारी के दबाव में खाना पड़ा।
         पार्टी जब परवान पर थी। तब मौका देखकर पेट्रोल की टंकी में गेहूं के डंठल में आग लगाकर डाल दिया। कई पेट्रोल टंकी था। लहरने लगा। फिर फरार हो गए। बाढ़ो सिंह और साथियों को इसकी सूचना दी गई। नवादा और रजौली में पेड़ काटकर एनएच-31 को जाम कर दिया। पुलिस गेनहारी के नाम से तलाश रही थी। लेकिन फरहा में गेंधारी नाम का कोई शख्स नही था। लिहाजा, फरहा गांव पर सामूहिक जुर्माना कर दिया था। हालांकि कुछ दिन बाद पुलिस छावनी वापस चली गई। लिहाजा, शर्मागिरफ्तार नही किए जा सके।


लेकिन पेंशन के लिए हाथ नही फैलाई
बिहार के नवादा जिले के पकरीबरावां के बलियारी निवासी सियाराम शर्मा शर्मा आर्थिक परेशानियों से जुझते रहे। लेकिन उन्होंने पेंशन के लिए कभी हाथ नही फैलाई। जबकि भारतीय स्वतंत्रता सेनानी संगठन के कार्यकारी अध्यक्ष पं शीलभद्र याजी फाॅरवर्ड ब्लाॅक के उपाध्यक्ष रह चुके थे। इसके बाद पृथ्वी सिंह आजाद अध्यक्ष बने थे। वह भी उन्हें जानते थे। शर्मा कहते हैं कि उन्हें कहा गया कि सिर्फ आवेदन पर हस्ताक्षर कर दीजिए, पेंशन शुरू हो जाएगा। लेकिन उस लड़ाई को चंद रूपए में आंकना मुझे मंजूर नही था। इसलिए दिलचस्पी नही दिखाई।


लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर काफी सम्मान मिला
92 वर्षीय शर्मा रूपए नही कमाए। लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर उन्हें काफी सम्मान मिला। 1975 में बड़ी बेटी कालिंदी की शादी थी। किसी के जरिए इसकी जानकारी तत्कालीन डीएम सीएस प्रसाद को मिली। डीएम तीन बोरा चीनी का परमिट शर्मा के घर भिजवा दिए। शर्मा की बेटी की शादी में दो बोरा चीनी खर्च हुआ। बचा हुआ एक बोरा चीनी का परमिट शर्मा लौटा दिए। 
डीएम ने जब शर्मा से पूछा कि आपने निमंत्रण क्यों नही दिया। तब शर्मा का जवाब था कि शादी में दामाद सबसे बड़ा होता है। लेकिन आप जब आ जाते तब दामाद का कद छोटा हो जाता। लोग आपको देखने लग जाते। यह मुझे मंजूर नही था। दरअसल, शर्मा सैद्धांतिक शख्स रहे हैं। कई सरकारी कमिटियों में रहे। लेकिन सिद्धांतो से समझौता नही किया। शर्मा को तीन बेटे और दो बेटियां है।
स्वामी सहजानंद से रही शर्मा की निकटता
सियाराम शर्मा की स्वामी सहजानंद सरस्वती से भी निकटता रही। 1946 में वारिसलीगंज के मीरविगहा में सभा हुई थी। उसी सभा में स्वामीजी से मुलाकात हुई थी। उसके बाद से स्वामीजी का अनुयायी बन गए थे। स्वामीजी के आखिरी जीवन तक जुड़े रहे। हालांकि शर्मा के पिता बाढ़ो सिंह कलां किसान थे। वह उन्हें पढ़ाना चाहते थे। लेकिन शर्मा राजनैतिक गतिविधियों में सक्रिय थे। इसलिए स्कूल से निकाल दिया था। लिहाजा, उनकी पढ़ाई नही पूरी हुई। 1946 में सीपीआई का सदस्य बने। 1990 तक रहे। सियाराम शर्मा अंचल कमेटी से राज्यस्तरीय कमेटी तक पदाधिकारी रहे। 

साकेत बिहारी प्रसाद सिंह- जिन्होंने दे दी पूरी जवानी, उनका सेनानियों के शिलापट पर नाम तक नही

अशोक प्रियदर्शी
     बात 79 साल पहले की है। साकेत बिहारी प्रसाद सिंह मध्यप्रदेश के खंडवा से मैट्रिक की पढ़ाई के बाद छुट्टी में घर लौटे थे। तब सत्रह साल की उम्र थी। तभी उनके घर के सामने एक तिरंगा झंडा फहर रहा था। ब्रिट्रिश पुलिस उस झंडे को लेकर उनके हवेली को घेर लिया था। टोप से घर को उड़ाने की बात की जा रही थी। तभी साकेत बिहारी के चाचा त्रिवेणी सिंह ब्रिट्रिश अधिकारी के सामने आए। अधिकारी और उनके चाचा से तकरार हो गया। तभी साकेत बिहारी भी उलझ गए। फिर धीरे धीरे बहुत लोग एकत्रित हो गए। उसके बाद अंग्रेज अधिकारी को वापस लौटना पड़ा था।
यह घटना बिहार के नवादा जिले के हिसुआ थाना के मंझवे गांव निवासी साकेत बिहारी का रास्ता बदल दिया। जमींदार परिवार था। परिवार चाहते थे कि वह पढ़ाई करें लेकिन साकेत बिहारी ने आंदोलन का रूख चुना। वह स्वतंत्रता सेनानी चाचा त्रिवेणी सिंह के अनुयायी बन गए। वह अंग्रेज की नीतियों का विरोध करने में जुट गए। कई विवाद हुए। लेकिन पीछे नही हटे। 1942 में महात्मा गांधी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन का नारा दिया था। तब साकेत बिहारी ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिए। बिहारी बताते हैं कि वह साथियों के साथ रेलवे पटरी को नुकसान किया था। हिसुआ थाना मंे उत्पात मचाया। ढ़ाढ़र पुल को क्षति पहुंचाया।

शादी के आठ माह बाद चले गए जेल
साकेत बिहारी की अंग्रेजों ने तलाशी तेज कर दी। काफी दिनों तक फरार रहे। लेकिन उन्हें वजीरगंज के समीप गिरफ्तार कर लिया गया। उसके बाद उन्हें हिसुआ में तत्कालीन एसडीओ एसडीओ पुष्कर झा के सामने लाया गया। तत्कालीन एसडीओ ने उनसे पूछा कि कसूर किया है। साकेत बिहारी कहते हैं कि उन्होंने हां में जवाब दिया। उसके बाद उन्हें हजारीबाग जेल में भेज दिया। हालांकि उनके बड़े भाई अवध बिहारी सिंह माफी मांग ली थी। उन्हें छोड़ दिया था। परिजनों ने उन्हें फटकार भी लगाई। बता दें कि साकेत बिहारी की गिरफ्तारी के आठ माह पहले बृजकुमारी देवी से शादी हुई थी।

हजारीबाग जेल में श्रीबाबू से मुलाकात हुई
साकेत बिहारी करीब छह माह तक हजारीबाग जेल में रहे। उस दौरान बिहार केसरी डाॅ श्रीकृष्ण सिंह से मुलाकात हुई थी। श्रीबाबू उनपर विशेष ख्याल रखते थे। उस जेल में उनके बहनोई पंडित रामनंदन मिश्र और लोकनायक जयप्रकाश नारायण भी साथ रहते हैं। तब साकेत बिहारी ने उनसे मिलने के लिए पत्र भेजा था। लेकिन वह पत्र जेल सुप्रींटेडंेट को हाथ लग गया। वह साकेत बिहारी को सेल बेड़ी में डालने जा रहा था। लेकिन बंदी साथियों ने बीच बचाव किया, उन्हें सेल में नही डाला गया।

नेहरू, गांधी, सुभाष, जेपी, सहजानंद का सानिध्य पा चुके हैं साकेत बिहारी
साकेत बिहारी को महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, स्वामी सहजानंद सरस्वती, जवाहर लाल नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद समेत देश के बड़े बड़े आंदोलनकारियों का सानिध्य पाने का अवसर मिला है। 1944 में जहानाबाद और मसौढ़ी में सांप्रदायिक दंगा हुआ था। तब महात्मा गांधी और अब्दुल गफ्फार खां आए थे। जहानाबाद डाक बंगला में महात्मा गांधी की सेवा में स्वयंसेवक के रूप में साकेत बिहारी भी थे। रामगढ़ सम्मेलन में सुभाषचंद्र बोस से बातचीत करने का अवसर मिला था। पढ़ाई के समय लहेरियासराय में स्वामी सहजानंद सरस्वती से मुलाकात हुई थी। सक्रिय सेनानी के कारण जवाहर लाल नेहरू से भी मिलने का मौका मिला है।

कई दिग्गज पधार चुके हैं उनके घर
साकेत बिहारी की उम्र बीत गई। लेकिन उनकी यादें आज भी ताजा है।  वह कहते हैं कि उनके घर में कई दिग्गज पधार चुके हैं। चाचा त्रिवेणी सिंह की जब तबियत खराब हो गई थी तब राजेन्द्र प्रसाद कई दिनों तक रूके थे। यही नहीं, जेपी जब हजारीबाग से भागे थे तब कई दिनों तक उनके घर में छिपे थे। यही नहीं, महात्मा गांधी के भाई मगन लाल गांधी और उनकी दो लड़कियां राधा बहन और दुर्गा बहन साकेत बिहारी के मंझवे ंिस्थत घर पर काफी समय तक रहे। दोनों परदा तोड़ो और चरखा आंदोलन चला रही थीं। इंदिरा गांधी भी उनके घर आई थीं।

लेकिन शिलापट्ट पर नाम तक नही
मंझवे निवासी 96 वर्षीय साकेत बिहारी का प्रखंड मुख्यालय हिसुआ के शिलापटट पर नाम तक दर्ज नही किया जा सका है। यही नहीं, जिले के कार्यकमों में याद भी नही किया जाता है। हालांकि उन्हें पेंशन का लाभ मिल रहा है। साकेत बिहारी के पुत्र कैलाश बिहारी प्रसाद सिंह उर्फ गोपाल प्रसाद कहते हैं प्रशासन के यह रवैया अपमानजनक है। गया से जिला का दर्जा मिले चार दशक बीत गए। लेकिन साकेत बिहारी को गया जिले का निवासी माना जा रहा है।

पिता की मर्जी के विरूद्ध शिल्पी ने की पढ़ाई, अब उसे मिला यूरोप के सात देशों में रिसर्च का अवसर

अशोक प्रियदर्शी
 एक दशक पहले की बात है। खगड़िया की शिल्पी गुप्ता प्रथम श्रेणी से मैट्रिक पास की थी। वह आगे पढ़ना चाहती थी। लेकिन शिल्पी के पिता राजी नही थे। वह जल्दी शादी कर देना चाहते थे। इसलिए उन्होंने शादी भी तय कर दी थी। लड़केवाले को दिल्ली में शिल्पी को दिखाया गया। लेकिन दहेज की भरपाई नही कर पाए। इसलिए शिल्पी की शादी टूट गई। तब शिल्पी की उम्र बमुश्किल 16 साल थी।
लेकिन शिल्पी अब रिसर्च के लिए यूरोपीय देश जा रही है। यूनिवर्सिटी आॅफ ग्रनाडा ने यूरोपियन मास्टर्स डिग्री इन वोमेन एंड जेंडर स्टडीज जेमा के लिए शिल्पी का चयन किया है। दो साल के अंतराल में 49 हजार यूरो दिए जाएंगे। यह भारतीय मुद्रा करीब चालीस लाख रूपए है। शुरूआत में एक साल स्पेन में स्टडी करेगी। फिर रिसर्च के लिए कई यूरोपीय देश जाएगी। स्पेन, इटली, हंगरी, यूके, पोलैंड, नीदरलैंड और न्यू जर्सी यूनिवर्सिटी आॅफ ग्रनाडा के पार्टनर है।


आसान नही थी शिल्पी की राह
शिल्पी पढ़ाई करना चाहती थी। उसके पिता जल्दी शादी के पक्ष में थे। इसीबीच शिल्पी आइएससी कर ली। वह ग्रेजुएशन जेएनयू का इंट्रेंस एग्जाम दी थी। इसमें सफल हो गई थी। वह जाना चाहती थी। लेकिन पिता राजी नही थे। उसके पिता का मानना था कि बेटी की ज्यादा पढ़ाई के बाद उसकी शादी करना मुश्किल हो जाएगा। घर से बाहर बेटियों के लिए माहौल भी ठीक नही रहता। 
शिल्पी ने बताया कि मां चाहती थी, लेकिन उनके पास पैसे नही थे। इसलिए पिता की मर्जी के विरोध में वह दिल्ली पहुंच गई। स्काॅलरशिप का चार हजार रूपए थे। परिजन मान रहे थे कि पैसे खत्म हो जाएगा तब वापस लौट आउंगी। लेकिन ट्यूशन पढ़ाई। जम गई। तब परिजनों का रूख नरम पड़ा। वह स्पेनिश लैंग्वेज से पीजी तक पढ़ाई की। फिर एम.फील की। तभी यूनिवर्सिटी आॅफ ग्रनाडा ने रिसर्च के लिए विश्व स्तर पर 100 लोगों को चुना। इनमें दस का आखिरी रूप से चयन हुआ, जिसमें शिल्पी भी है।

शिल्पी ने परिवार को दिखाई राह
शिल्पी के परिवार में कोई पढ़ा लिखा नही था। शिल्पी के पिता संजय गुप्ता नाॅन मैट्रिक, मां अनुप्रिया देवी साक्षर, दादा साक्षर जबकि दादी निरक्षर थी। शिल्पी के मुताबिक, बेटियों को इंगलिश स्कूल में भी नही भेजा जाता था। मैट्रिक की पढ़ाई आखिरी था। इसके लिए सिर्फ पापा जिम्मेदार नही थे। सामाजिक परिवेश ऐसा था। लेकिन दादा उनके पक्षधर थे।
      खगड़िया के एसडीओ रोड निवासी शिल्पी ने इस परंपरा को तोड़ी। वह खुद आगे बढ़ी। दो बहनों और एक भाई का भी मददगार बनी। दिल्ली में रहकर शिखा बीएससी, जबकि शिवानी फ्रंेच से ग्रेजुएशन कर रही है। भाई आकाश बंगलोर के निजी कंपनी में एकाउंटेंट है। 
 
शिल्पी की दहेजरहित शादी
2015 में नवादा नगर के गोकुल प्रसाद के पुत्र सुशांत गौरव से दहेज रहित शादी की। शिल्पी और सुशांत का पसंद खुद का था। लेकिन शादी अरैंज मैरेज हुआ। सुशांत भी वेल्लौर स्पेनिश लैंग्वेज के प्रोफेसर हैं। संजय गुप्ता कहते हैं कि बेटी की सफलता पर फक्र है। शिल्पी ने अपने दृढ़ संकल्प से उनकी अवधारणा को निराधार कर दिया। बहनों और भाई के लिए तारणहार बनी। शिल्पी की सास प्रो प्रमिला कुमारी भी खुश हैं। प्रो प्रमिला कहती हैं कि उनकी बहू ने उनके परिवार के मान को बढ़ाई।

Tuesday, 3 May 2016

बिहार: खाक में मिलते नन्हों के ख्वाब


अशोक कुमार प्रियदर्शी | सौजन्‍य: इंडिया टुडे | पटना, 1 मई 2012 | अपडेटेड: 19:57 IST

जमुई में ध्‍वस्‍त चननवर मिडल स्‍कूल में चलती क्‍लास
जमुई जिले के चननवर गांव की रीता सोशल वर्कर बनकर शिक्षा के क्षेत्र में लोगों की मदद करना चाहती है. लेकिन उसके इस अरमान के परवान चढ़ने से पहले ही 17 दिसंबर, 2011 की रात भाकपा माओवादियों (नक्सलियों) ने गांव के मिडल स्कूल को ध्वस्त कर उसके ख्वाबों में खलल डाल दिया. इससे उसकी पढ़ाई तो प्रभावित हुई ही, उसे भी अपने भाई-बहनों जैसा हश्र होने का डर सताने लगा है. उसकी दो बड़ी बहनों को इसलिए कम उम्र में ब्याह दिया गया क्योंकि वे निरक्षर थीं. उसके भाई ने पांचवीं के बाद इसलिए पढ़ाई छोड़ दी क्योंकि आगे की शिक्षा के लिए कोई संस्थान नहीं था.
अब रीता इस उम्मीद के साथ उस टूटी-फूटी इमारत में पढ़ाई कर रही है कि शायद हालात सुधर जाएं. वह सवालिया लहजे में कहती है, ''हमने किसी का क्या बिगाड़ा था जो हमारे अरमानों को मिट्टी में मिला दिया गया.''
रीता अकेली नहीं है, जिसके ख्वाब टूटे हैं. चननवर मिडल स्कूल में नेपाली, बबलू, छोटू और रेणु समेत 235 छात्र हैं, जिनके सामने कमोबेश ऐसे ही हालात हैं. छठी जमात की इंद्रा को ही लें. वह पढ़कर स्कूल टीचर बनना चाहती है मगर स्कूल की हालत ने उसे बेचैन कर दिया है.
ताज्‍जुब यह कि झारखंड के गिरिडीह और बिहार के नवादा जिले की सीमा पर जमुई जिले के इस गांव के बच्चों में शिक्षा हासिल करने की भूख कूट-कूट कर भरी हुई है. आठवीं की छात्रा रेणु कहती है, ''मेरी बड़ी बहन और भाई पढ़ाई नहीं कर सके. मैं इस कमी को टीचर बनकर पूरा करना चाहती हूं.'' गांव में लोग शिक्षा को लेकर जागरूक हुए हैं. मगर नक्सलियों की करतूतों से उनकी उम्मीदों को पलीता लगता नजर आ रहा है.
शिक्षक स्कूल जाने से कतराते नजर आते हैं. ऐसे ही एक शिक्षक विजय कुमार डेपुटेशन पर ब्लॉक में काम कर रहे हैं. खास बात यह है कि नक्सलियों ने ज्‍यादातर उन स्कूलों को उड़ा दिया है, जिनका इस्तेमाल पुलिस कैंप और मतदान केंद्र के रूप में किया गया. जैसा कि चननवर घटना के प्रत्यक्षदर्शी टीचर सुदामा भक्त बताते हैं, ''माओवादियों का आक्रोश स्कूल में पुलिस कैंप को लेकर था. उन लोगों ने गांववालों को यह चेतावनी देकर स्कूल को उड़ा दिया कि यहां दोबारा कैंप न लगे.'' यही नहीं, सुरक्षा कारणों से भी नक्सली दो-मंजिला स्कूल इमारतों को उड़ाते रहे हैं. आर्थिक संसाधनों पर हमले के इरादे से भी स्कूल उनके निशाने पर रहते हैं.
स्थानीय लोग अजीब कशमकश में फंसे हैं. उन्हें नक्सलियों के स्कूल इमारतों को नष्ट करने का विरोध करने पर जान का खतरा है तो पुलिस कैंप का विरोध करने पर नक्सली समर्थक होने का आरोप लगने का डर. इसके चलते वे मूकदर्शक बन सब कुछ होता देखने के लिए विवश हैं. दोनों ही हालात में असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ रहा है. स्कूलों की टूटी-फूटी इमारतों के पुनर्निमाण में प्रशासनिक लाचारगी साफ झलकती है. इसी वजह से ध्वस्त हुई ज्‍यादातर इमारतें ज्‍यों की त्यों पड़ी हैं.
हालांकि सरकार ने स्कूलों में पुलिस कैंप स्थापित न करने का आदेश दे रखा है. मगर स्थानीय लोगों का कहना है कि जब भी नक्सलियों के खिलाफ अभियान चलाए जाते हैं तब व्यवहार में उस निर्देश का पालन नहीं हो पाता. बिहार के पुलिस महानिदेशक अभयानंद ने इंडिया टुडे को बताया, ''अब राज्‍य में कोई भी ऐसा स्कूल नहीं है, जहां पुलिस कैंप है. स्कूलों से पुलिस शिविरों को क्वार्टरों में शिफ्ट कर दिया गया है.''
वहीं वरिष्ठ नागरिक संघ स्कूलों पर हमले का अलग कारण मानता है. संघ के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्रीनंदन शर्मा कहते हैं, ''अशिक्षा और गरीबी ही नक्सलियों का आधार रहे हैं. उन्हें डर है कि जब लोग पढ़-लिख जाएंगे तब क्षेत्र में उनकी पकड़ ढीली पड़ जाएगी. लिहाजा, यह पुलिस से रंजिश के नाम पर बच्चों को शिक्षा से वंचित रखने का कुचक्र है.'' जमीनी हकीकत यह है कि नक्सली हमलों में ज्‍यादा नुकसान उन लोगों का हो रहा है, जिनके वे हितैषी होने का दंभ भरते हैं. पिछले हफ्ते पटना में केंद्रीय गृह सचिव आर.के. सिंह ने भी यही बात कही, ''गरीबों और आदिवासियों की सुरक्षा के नाम पर नक्सलियों ने अब तक सबसे ज्‍यादा उन्हीं की हत्या की है और उन्हें हर तरह से क्षति पहुंचाई है.''
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी इस समस्या से निजात के लिए नक्सल प्रभावित नौ राज्‍यों में 400 एंटी नक्सल पुलिस स्टेशनों की मंजूरी दे दी है. इनमें 85 बिहार के लिए हैं जो दूसरे किसी भी राज्‍य की तुलना में सर्वाधिक है. हर थाने के निर्माण में दो करोड़ रु. खर्च होंगे.
चननवर जमुई का इकलौता ऐसा स्कूल नहीं है. जिले के खैरा ब्लॉक के गढ़ी, सोनो ब्लॉक के भलसुधियां, महेसरी, सरकंडा, चरका पत्थर, बरहट ब्लॉक के चोरमारा और गुरमाहा स्कूल नक्सलियों के हमले का शिकार हो रहे हैं. चननवर के हालात ध्वस्त स्कूलों के बच्चों की मुश्किलों को समझने की बानगी भर हैं. बिहार में पिछले छह साल में जमुई के अलावा बांका, मुंगेर, औरंगाबाद, गया, कैमूर, जहानाबाद, मुजफ्फरपुर, पश्चिमी चंपारण और पूर्वी चंपारण जैसे नक्सल प्रभावित जिलों के 46 स्कूल निशाना बने हैं.
देखा जाए तो औसतन डेढ़ महीने के अंतराल पर एक सरकारी स्कूल को ध्वस्त किया गया है. केंद्रीय गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, 2006 से नवंबर 2011 तक देश के 258 स्कूलों को उड़ा दिया गया, जिसमें बिहार के 46 स्कूल शामिल हैं. नक्सलियों ने इस अवधि में सबसे ज्‍यादा छतीसगढ़ में 131, जबकि झारखंड में 63 और बिहार में 46 स्कूल ध्वस्त कर दिए, बिहार के स्कूलों की संख्या थोड़ी कम जरूर है. लेकिन खास यह कि राज्‍य देश के उन चार नक्सल प्रभावित राज्‍यों छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिसा की कतार में आ गया है, जिनमें इस तरह की घटनाओं में इजाफा हुआ है. ऐसी घटनाओं से उपजी परिस्थितियों से निपटने के लिए उपाय किए जा रहे हैं.
केंद्रीय जनजाति कल्याण कार्य मंत्रालय ने नक्सल प्रभावित और अति पिछड़ा क्षेत्र के अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के बच्चों की शिक्षा के लिए आश्रम स्कूल खोलने का फैसला किया है. इसके तहत राज्‍य के जमुई, रोहतास, भभुआ, मुंगेर, बांका, नवादा और गया में आवासीय सुविधायुक्त स्कूल खोले जाएंगे. लेकिन इसे एक लंबी प्रक्रिया माना जा रहा है, जिसमें समय लगेगा. बिहार पुलिस ने स्कूल से महरूम बच्चों को जोड़ने के लिए फिर से अभियान शुरू किया है, लेकिन उन्हें इमारत विहीन स्कूलों से जोड़ पाना अहम सवाल है.
बहरहाल, कारण जो भी हो, स्कूलों पर नक्सली हमलों की घटना, और उसके बाद की परिस्थितियां यह सोचने को मजबूर करती हैं कि क्या नन्हीं आंखों का सुनहरे ख्वाब देखना गुनाह है.
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Web Title : Bihar dream drown of children 
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Sunday, 1 May 2016

जो है हमारी पहचान, वह बनी है वीरान

अशोक प्रियदर्शी
नवादा जब जिला बना था। तब जन सहयोग से कलाकृतियां एकत्रित की गई थी। कुछ ही दिनों के अंतराल में नारद संग्रहालय में पांच हजार से ज्यादा कलाकृतियां एकत्रित हो गई थी। दुर्लभ कलाकृतियों के लिहाज से यह संग्रहालय महत्वपूर्ण हो गया है। इसका श्रेय नवादा के पहले जिलाधिकारी नरेंद्रपाल ंिसह को जाता है। ऐसा नही कि नवादा में इसके बाद विरासत खत्म हो गई। नवादा के गांव गांव में विरासत बिखरी पड़ी है। लेकिन सरकार और प्रशासन इस दिशा में दिलचस्पी नही दिखा रही। इसके चलते नवादा के विरासत वीरान हो गए हैं।
देखें तो, अपसढ़ गांव अपने आप में विरासत का अनुपम खजाना है। अपसढ़ में धार्मिक विश्वविधालय का अवशेष मिल चुका है। इसे नालंदा से भी प्राचीन यूनिवर्सिटी का अवशेष माना जाता है। गांव में सैकड़ों मूर्तियां बिखरी पड़ी है। यही नहीं, सपीमवर्ती पार्वती गांव भी ऐतिहासिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। यह बौद्ध दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पार्वती को बौद्ध सर्किट में जोड़ने की बात कह चुके हैं। लेकिन बैरिकेटिंग के सिवा कुछ भी नही हो पाया है।
कौआकोल का देवनगढ़ में पाषाणकाल से मध्यकाल तक के अवशेष मिले हैं। यहां 85 एकड़ का गढ़ है। यहां कृष्णलोहित मृदभांड और उतरी कृष्णमार्जित भांड के टुकड़े प्राप्त हुए हैं। यहां से इसवीं सन की प्रथम शताब्दी की बनी बलराम, वासुदेव और एकांशा की मूर्ति प्राप्त हुई है। यही नहीं, कौआकोल प्रखंड का देवनगढ़, बोलता पहाड़, चामुण्डा मंदिर, जेपी आश्रम, हिसुआ का सोनसा, सीतामढ़ी का सीतामढ़ी मंदिर, नारदीगंज का हड़िया सूर्यमंदिर जैसे कई स्थल है जो नवादा की ऐतिहासिकता को दर्शाता है।
यही नहीं, बावन कोठी तिरपन द्वार, कामदार खां का मकबरा, महरथ, ओड़ो, मकनपुर, ठेरा, घनियावां, आंती, समाय, घोसतावां, डुमरावां, मड़ही, पांडेयगंगोट, महरावां, मड़रा, रानीगदर, अरण्डी, गोविन्दपुर, वैजनाथपुर, सप्तऋषि पहाड़ी, हरनारायणपुर, ओढ़नपुर, कहुआरा, मधुवन, छपरकोल, नावाडीह, नेमदारगंज, पहाड़ी बाबा का मजार, नवादा संकट मोचन मंदिर, सूर्यनारायण मंदिर, जैन मंदिर जैसे दर्जनों ऐतिहासिक और पौराणिक विरासत हैं। लेकिन उपेक्षा के कारण वीरान है।
       विरासत बचाओ अभियान, बिहार के संयोजक और युवा इतिहासकार डाॅ अशोक कुमार प्रियदर्शी के मुताबिक, विरासत हमारी पहचान है। लेकिन इस पहचान को लेकर समाज सजग नही है। सरकार की नीतियों में भी नवादा उपेक्षित रहा है। अपसढ़ और पार्वती को लेकर प्रयास भी हुए। लेकिन इसकी गति काफी मंद रही है। जनप्रतिनिधि भी विरासत को बचाने के लिए गंभीरता नही दिखाए। बिहार सरकार के पहल पर एक सर्वेक्षण किया गया है। इस सर्वेक्षण में करीब आठ हजार पुरातात्विक स्थल चिंहित किए गए हैं। बिहार में करीब 6000 पंचायत है। इस लिहाज से हर पंचायत में कोई न कोई विरासत है। लेकिन अभी यह बदहाल स्थिति में गुमनाम पड़ा है।

मगही/अरझी परझी-सेल्फी वाला नयका समाजसेवक

डाॅ अशोक कुमार प्रियदर्शी
मगही लेखक 
  सेल्फी अंगरेजी शब्द हय। एकर मतलब अप्पना से होवो हय। सेल्फी के सेल्फिश से जोड़ो हका। सेल्फिश के मतलब स्वारथी होवो हय। लेकिन जहिया से स्मार्टफोन आउ ओटोमेटिक कैमरा हाथ में आ गेला ह। तहिया से सेल्फी के प्रचलन बढ़ गेला ह। अब जिनखरा देखा उ सेल्फी लेवे में मस्त हका। सवाल उ नय हका।
  सवाल इ हका कि सेल्फी अब नयका समाज सेवक के हथियार बन गेला ह। नयका समाजसेवक समाज से ज्यादा सेलफिये में दिखो हथीन। जे कहियो समाज से सरोकार नय रखलथीन। उहो गरीब आउ लाचार के साथ सेल्फी खिंचाके समाजसेवक नियन अप्पन चेहरा चमका रहलथीन ह। सोशल साइट पर लाइक आउ कमेंट पाके नयका समाजसेवक गदगद हो रहलथीन ह।
      सवाल फोटो खिंचावे के नय हका। सवाल उनखर नीयत पर हय। तोहरा पंचायत चुनाव के उदाहरण देहियो। जे कहियो गांव आउ गरीब से नाता नय रखलथीन। उहो आदमी गांववाला के साथ सेल्फी खिंचाके अप्पन चेहरा चमका रहलथीन।कोय अपराधी हका। कोय माफिया हका। कोय भ्रष्ट्राचारी हका। जे कहियो मानवता से लगाव नय रखलथीन। लेकिन पंचायत चुनाव में अप्पन पत्नी आउ परिवार के जितावे ले गरीब के साथ सेल्फी खिंचा रहला ह। 
      सेल्फी के बाद उ गांववाला कैसे रहो हथीन। इ चिंता उ नय करो हथीन। एतने नय। जे कहियो अप्पन माय बाप के आगे भी हाथ नय जोड़लथीन हल, उ जनता के बीच में हाथ जोड़के सेल्फी खिंचवा रहला ह। एकरा सोशल साइट पर डाल के सेल्फीवाला समाजसेवक बनल हथीन। अइसनका समाजसेवक पंचायत चुनावे तक सीमित नय हथीन। एकर पहिले विधानसभा आउ लोकसभा चुनाव में भी अइसनका सेल्फीवाला समाजसेवक खूब देखल गेला हल।
      चुनाव के पहिले झाड़ू लगाके सेल्फी खिंचैलका। कंबल बांटलका। चिकित्सा शिविर लगइलका। पानी के प्याउं लगइलका। दलित बस्ती में सेल्फी खिंचाके हमदर्दी जतैलका। पइसवावाला अदमिया उहे सेल्फिया के मीडिया में भी भुनैलका। मतलब कि सेल्फी से जनता के दिल में उतरे के बडी कोशिश कइलका। 
      राजनीतिये तक इ बीमारी सिमटल नय हका। सेल्फी खिंचावेवाला समाजसेवक के आउ भी केतना अवतार हका। जे अप्पन व्यापार से जिंदगी भर गाहक आउ करमचारी के खून चूसलका। उनखरों पर सेल्फीवाला समाजसेवक बने के भूत सवार हो गेला ह। मिलावटी समान बेचके पइसा कमा लेलका उहो सेल्फीवाला समाजसेवक बनल हथीन।
       इहे नय। अभिभावक के खून चूसके बड़का बिल्ंिडग बना लेलका। बुतरूयन के किताब में कमीशन खा के मोटा गेला। उ भी दु चार गो कंबल आउ गमछा बांट के सेल्फीवाला समाजसेवक बनल हथीन। इ सब्भ चाहता हल तउ अप्पन व्यापार आउ संस्थान से जनता के मदद करता हल। ओकरा ठीक ठाक मजदूरी देता हल। कम मुनाफा पर समान बेचता हल। एकरा से हजारों लोग के फायदा पहुंचता हल।
       एगो सेल्फी के प्रचलन आउ हो। उ राज्य आउ देश में सम्मान पावे वाला पर नजर टिकैले रहो हका। उनखरा उ सब के बनावे में कोय योगदान नय रहो हका। लेकिन उ जब सम्मान लेके आवो हका तउ उनखा साथे सेल्फी खिंचावे में आगे रहो हका। इ सब्भे पांच छह गेंदा फूल के माला ले ले हका। अधिकारी आउ व्यापारी के बीच जाके एक माला सम्मानित प्रतिभा के पहनावो हका। बाकी माला खुद आउ व्यापारी आउ अधिकारी पहन ले हका। फिर सेल्फी खिंचाके समाजसेवी बन जा हका।
        सेल्फीवाला बीमारी से कोय अछूता नय हका। लेकिन अप्पन सेल्फी तो अप्पन अधिकार हका। काहे कि अप्पने लिए जिंदगिये जीला। लेकिन इ सेल्फी में जब समाज के शामिल करो हका तो समाज से सरोकार भी रखा। ऐकर बाद बतावे के जरूरत नय पड़तो। काहे कि समाज चुप रहो हका। लेकिन वह सब देखो हका। उ सेल्फियनवाला समाजसेवक के पहचानों हका।