Tuesday, 12 January 2016

गिरिराज सिंह के संसदीय इलाका की अथ बीजेपी कथा-जिस जिस ने किया श्रवण को मदद वह हुआ टिकट से बेदखल


अशोक प्रियदर्शी
 भाजपा ने नवादा जिले के चार सीटों पर टिकट का फैसला कर दिया है। भाजपा 2010 से एक सीट ज्यादा सीट पर चुनाव लड़ रही है। लेकिन टिकट वितरण में एक तस्वीर सामने आई है कि जिस किसी ने विधान परिषद के स्थानीय निकाय चुनाव में भाजपा प्रत्याशी श्रवण कुशवाहा के मददगार थे। उनका पता साफ कर दिया गया है। जबकि कुशवाहा से अलग रूख रखनेवालों का बल्ले बल्ले रहा है। बताया जाता है कि विधान परिषद के चुनाव में भाजपा से दो उम्मीदवार श्रवण कुशवाहा और विरेंद्र चैहान थे। 
        कुशवाहा के पक्ष में रजौली विधायक कन्हैया कुमार और भाजपा जिलाध्यक्ष विनय कुमार थे। जबकि विरेंद्र चैहान हिसुआ विधायक अनिल सिंह और केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के चहेते थे। लेकिन प्रदेश इकाई ने श्रवण को टिकट दिया था। लेकिन इस चुनाव में जदयू के सलमान रागीव के मुकाबले 213 मतों के अंतर से श्रवण पराजित हो गए। जबकि बागी होकर निर्दलीय चुनाव लड़े चैहान को 216 मत मिले थे। 
      श्रवण कुशवाहा की हार के बाद भाजपा जिलाध्यक्ष विनय कुमार की अध्यक्षता में एनडीए की बैठक हुई थी। बैठक के बाद विनय कुमार ने जारी बयान में गिरिराज सिंह को मंत्री पद और अनिल सिंह को पार्टी से निष्कासित करने की मांग की थी। पार्टी ने अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए जिला कमेटि को भंग कर दिया। नई कमिटी बना दी गई। विनय कुमार को अध्यक्ष पद से हटा दिया गया। बता दें कि विनय नवादा विधानसभा क्षेत्र के उम्मीदवार थे। 
       बताया जाता है कि विनय का पता साफ करने के लिए भाजपा का परंपरागत नवादा सीट वारिसलीगंज को दे दिया गया। वारिसलीगंज से बाहुबली अखिलेश सिंह की पत्नी अरूणा देवी को उम्मीदवार बनाया गया। यही नहीं, नवादा सीट वारिसलीगंज को देकर एक साथ कई विरोधियों को चीत कर दिया गया है। बाहुबली श्रवण कुमार ने भी श्रवण कुशवाहा के पक्ष में काम किया था। लेकिन निराशा मिली।
यही नहीं, गोविंदपुर सीट भाजपा को दे दी गई।  जबकि इस सीट पर लोजपा के जिलाध्यक्ष अजीत यादव उम्मीदवारी कर रहे थे। अजीत यादव ने भी श्रवण कुशवाहा के लिए काम किया था। लेकिन इस सीट पर छनौन पंचायत की पूर्व मुखिया रंजीत यादव की पत्नी फूला देवी यादव को उम्मीदवारी दी गई है। वहीं रजौली में विधायक कन्हैया कुमार की जगह जिला पार्षद अर्जुन राम को टिकट दे दिया गया। हालांकि कन्हैया ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि उनका टिकट केन्द्र और राज्य के पदाधिकारियों ने नही बल्कि केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कटवाया है।
देखें तो, 1977 में जनता पार्टी की जीत को छोड़ दें तो बाकी चुनावों में गोविंदपुर और वारिसलीगंज में भाजपा ने कभी जीत नही दर्ज की।
जबकि नवादा जनसंघ के समय से भाजपा की सीट रही है। दो दफा जनसंध और एक दफा भाजपा जीत दर्ज की है। जबकि रजौली में एक दफा जनसंघ और तीन दफा भाजपा जीती है। 2010 के चुनाव में कन्हैया कुमार ने राजद के प्रकाशवीर को 14090 मतों के अंतर से पराजित किया था।

बाहुबलियों के आंगन में लड़वइया का हुआ अकाल

              
अशोक प्रियदर्शी
 जिन क्षेत्रों में बाहुबलियों का बोलवाला बड़ा है उन क्षेत्रों में से लड़वइया दूर होने लगे हैं। लिहाजा, लड़वइया का अकाल पड़ने लगा है। नवादा जिले के वारिसलीगंज और हिसुआ विधानसभा की तस्वीर कुछ ऐसी है। हिंसाग्रस्त वारिसलीगंज में आठ और हिसुआ में नौ प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। जबकि नवादा, गोविंदपुर और रजौली सुरक्षित में 12 प्रत्याशी हैं। वारिसलीगंज विधानसभा से बाहुबली अशोक महतो के सहयोगी रहे प्रदीप कुमार जदयू से हैं, जबकि बाहुबली अखिलेश सिंह की पत्नी अरूणा देवी भाजपा से उम्मीदवार हैं। बाकी साधारण पृष्ठभूमि के प्रत्याशी हैं।
 
            

       फिलहाल, प्रदीप कुमार वारिसीगंज एमएलए हैं। प्रदीप के पहले अरूणा देवी एमएलए थीं। विदित है कि करीब एक दशक तक वारिसलीगंज जातीय नरसंहार के कारण सुर्खियों में रहा था। इस दौरान करीब 200 लोगों की हत्या हुई थी। इस जातीय नरसंहार का आरोप अखिलेश सिंह और अशोक महतो पर है। प्रदीप के खिलाफ आठ और अखिलेश पर दर्जन से अधिक गंभीर मुकदमा है। अरूणा पर भी मामले दर्ज हैं। लिहाजा, दो बाहुबली चेहरे के सामने आने से पार्टी कार्यकर्ता चुनाव से विमुख होते जा रहे हैं। 
          ऐसा ही हालात हिसुआ विधानसभा क्षेत्र की है। हिसुआ पहले दो बाहुबलियों का अखाड़ा था। भाजपा विधायक अनिल सिंह और पूर्व मंत्री आदित्य सिंह और उनकी पुत्रवधू नीतू कुमारी चुनावी मैदान में रहे हैं। लेकिन 2015 के चुनाव में एक और बाहुबली का पदार्पण हो गया है। गोविंदपुर के जदयू विधायक कौशल यादव भी हिसुआ से चुनावी मैदान में आ गए हैं। जबकि नीतू कुमारी सपा से मैदान में हैं। तीनों बाहुबलियों पर गंभीर मामले दर्ज हैं। यही कारण है कि इस दफा प्रत्याशियों की संख्या घट गई है। बाहुबलियों के अलावा छह साधारण पृष्ठभूमि के प्रत्याशी हैं 
                                                                    
 देखें  तो स्थिति और भी स्पष्ट हो जाती है। फरवरी 2005 के चुनाव में हिसुआ में 19 और वारिसलीगंज में 14 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे। जबकि गोविंदपुर में 15, रजौली में 12 और नवादा में 21 लोग चुनावी मैदान में थे। वहीं अक्तूबर 2005 में हिसुआ में सात और वारिसलीगंज में 14 प्रत्याशी जबकि रजौली में 10, गोविंदपुर में 9 और नवादा में 19 प्रत्याशी थे। 2010 के चुनाव में हिसुआ और वारिसलीगंज में 13-13 प्रत्याशी थे। लेकिन गोविंदपुर में 14, रजौली में 12 और नवादा में 16 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे। 
       लेकिन इस दफा बाहुबलियों के क्षेत्र में प्रत्याशियों ने दिलचस्पी कम कर दिया है। वरिष्ठ साहित्यकार रामरतन प्रसाद रत्नाकर कहते हैं कि जब से राजनीतिक दलों ने बाहुबलियों को गले लगाना शुरू किया है तब से राजनैतिक कार्यकर्ताओं की रूचि घट गई है। बाहुबलियों के खिलाफ राजनैतिक कार्यकर्ताओं नही टिक पाते हैं।

चक्रव्यूह में नीतीश

अशोक प्रियदर्शी
  सोलह माह पहले की कहानी है। लोकसभा चुनाव में पार्टी की खराब प्रदर्शन के कारण जदयू नेता नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिये थे। उनकी जगह तत्कालीन एससीएसटी कल्याण मंत्री जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया गया। संदेश स्पष्ट था कि 2015 के विधानसभा चुनाव में दलित मतों का धु्रवीकरण जदयू के पक्ष में हो सके। मुख्यमंत्री बनने के माह भर के अंतराल में 21 जून को मांझी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दिल्ली में मुलाकात हुई। इसे शिष्ट्राचार मुलाकात बताया गया। मांझी ने कहा कि बिहार के विकास के मसले पर प्रधानमंत्री का रूख सकारात्मक है। जदयू और भाजपा के विरोधाभासी बयानों के बीच मांझी की यह टिप्पणी जदयू को हैरान कर दिया।
      चूंिक मांझी की प्रतिक्रिया पार्टी की रणनीति से अलग थी। क्योंकि गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पीएम उम्मीदवार घोषित किए जाने की प्रतिक्रिया में जदयू नेता नीतीश कुमार ने भाजपा से 17 साल पुराने संबंध तोड़ लिये थे। 2014 का लोकसभा चुनाव वामदल के साथ जदयू लड़ी थी। जदयू 38 में से सिर्फ दो सीटें जीती थी। इस चुनाव में भाजपा को बहुमत मिली थी। लिहाजा, नीतीश मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिये थे। लेकिन नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद मांझी की टिप्पणी पार्टी जनों को हजम नही हो रही थी। पार्टी के अंदर से मांझी की आलोचना की जाने लगी। इसके जवाब में मांझी कहते रहे कि उन्हें मोहरा के रूप में इस्तेमाल किया जाना पसंद नही
      मांझी पार्टीजनों के आलोचनाओं से पीछे मुड़ने के बजाय आगे बढ़ते गए। प्रधानमंत्री और केन्द्रीय मंत्रियों के साथ मांझी सहज दिखने लगे। भाजपा नेताआंे से बढ़ती नजदीकियों का पटाक्षेप करीब साल भर बाद 11 जून 2015 को हुआ, जब मांझी ने भाजपा के साथ मिलकर 2015 का विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा किये। मांझी की नवगठित हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा 20 सीटों पर महागठबंधन (जदयू, राजद और कांग्रेस ) के खिलाफ चुनावी समर में हैं। मांझी खुद मखदुमपुर के अलावा विधानसभा अध्यक्ष उदयनारायण चैधरी के खिलाफ इमामगंज से चुनाव मैदान में हैं। मांझी कहते हैं- नीतीश कुमार को सता से बेदखल करना उनका मुख्य मकसद है।
       दरअसल, नीतीश कुमार के खिलाफ मांझी के मुखर होने के पीछे भाजपा की राजनैतिक चाल रही है। इसके लिए भाजपा एक साल से योजनाबद्ध तरीके से काम कर रही थी। मिसाल के तौर पर 3 फरवरी 2015 को बिहार दौरे के क्रम में केन्द्रीय मंत्री उमा भारती ने कहा कि केन्द्र और राज्य के साथ मिलकर काम करने में मांझी एक आदर्श उदाहरण हैं। जबाव में मांझी ने कहा कि विकास के प्रति उमा भारती का रूख सकारात्मक है। हालांकि जदयू नेताओं के आरोप रहे हैं कि मांझी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के स्क्रिप्ट पर काम कर रहे हैं। लेकिन विरोधाभाषी ब्यानों के कारण दूरियां इस कदर बढ़ गयी कि जदयू ने मांझी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला दिया। तब मांझी के पक्ष में जदयू के बागी सदस्यों के अलावा भाजपा खड़ी दिखी। 
        दरअसल, 16 जून 2013 को भाजपा से जदयू के अलग होने के बाद से ही भाजपा नीतीश कुमार को घेरने की योजना पर काम कर रही थी। 2014 लोकसभा चुनाव के पहले लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान और रालोसपा प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा से गठबंधन किया। कुल 40 सीटों में भाजपा-30, लोजपा-7 और रालोसपा-3 सीटों पर चुनाव लड़ी। इसमें भाजपा 22, लोजपा 6 और रालोसपा 3 सीटें जीतीं। वहीं राजद चार, जदयू और कांग्रेस-दो-दो जबकि राकंपा-एक सीट जीती। लोकसभा चुनाव में नीतीश के विरोधियों को गले लगाने से हुये लाभ के बाद भाजपा ने अपने दायरे को बढ़ा लिया।जैसा कि जानते हैं नीतीश से गतिरोध के बाद कुशवाहा ने रालोसपा का गठन किया था।जबकि 15 सालों से पासवान नीतीश के विरोध की राजनीति करते रहे हैं।             2010 में निर्वाचित लोजपा के तीन विधायकों को जदयू ने शामिल कर लिया था।भाजपा नीतीश के ऐसे दुश्मनों को साधकर नीतीश को घेरने की कोशिश की है। नीतीश को मात देने के लिए मांझी, पासवान और कुशवाहा को अपना गठबंधन में शामिल करने के अलावा भाजपा ने नीतीश के बागी विधायकों को भी गले लगाया है। भाजपा ने पार्टी के 14 विधायकों का टिकट काट दिया। जबकि दूसरे दलों के 11 विधायकों को अपनाया। मांझी भी ज्यादातर नीतीश के बागी विधायकों को उतारा। बिहार के 243 सीटों में भाजपा-160, लोजपा-40, रालोसपा-23 और हम 20 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। 
        ऐसा नही कि भाजपा की व्यूह रचना को नीतीश नही समझ पाये। भाजपा को इसका जवाब देने के लिए नीतीश 20 साल पुराने दुश्मनी को भूलाकर राजद प्रमुख लालू प्रसाद से हाथ मिला लिया। कांग्रेस को भी साझीदार बनाकर महागठबंधन बनाया। 2014 लोकसभा चुनाव के बाद हुये दस सीटों के विधानसभा उपचुनाव में इसका असर भी दिखा। महागठबंधन दस में से छह सीटें जीत गयीं। राजद-तीन, जदयू-दो और कांग्रेस-एक सीटें जीती। वहीं भाजपा अपने कब्जे वाली छह में से दो सीटें गंवा दी। 
      दरअसल, नीतीश और लालू को करीब आने की वजह लोकसभा चुनाव के परिणाम थे। लोकसभा चुनाव में एनडीए (भाजपा, लोजपा और रालोसपा) 38.8 फीसदी मत लाकर 31 सीटें जीत गयी थी। वहीं जदयू, राजद, कांग्रेस और राकंपा 46.28 फीसदी मत लाकर भी हार गये थे। क्योंकि सब अलग अलग चुनाव लड़े थे। जदयू को 16.04, राजद 20.46, कांग्रेस 8.56 और राकंपा को 1.22 फीसदी मत मिले थे। दूसरी तरफ, भाजपा को 29.86, लोजपा 6.50, रालोसपा को तीन फीसदी मत थे। 
      इस गणितीय आकड़े के आधार पर विधानसभा के उपचुनाव में मिली कामयाबी के बाद नीतीश और लालू राष्ट्रीय स्तर पर छह दलों के विलय का एलान कर दिये। समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव इसके अध्यक्ष बनाये गये। ताज्जुब कि 2015 विधानसभा चुनाव से पहले इस महागठबंधन से सपा और राकंपा अलग हो गयी। राकंपा नेता और सांसद तारिक अनवर ने कहा कि महागठबंधन को सिर्फ मुस्लिम मत चाहिए, मुस्लिम टिकट और चेहरा नही। अनवर कम से कम 12 सीटों का दावा कर रहे थे। लेकिन सीट बंटवारे में जदयू -100, राजद-100, कांग्रेस-40 और राकंपा को तीन सीटें दी गयी थी। 
       दूसरी तरफ, सपा ने नाता तोड़कर महागठबंधन को बड़ा झटका दिया है। सपा के महासचिव रामगोपाल यादव ने कहा कि जदयू, राजद और कांग्रेस के गठबंधन से सपा अलग चुनाव लड़ेगी। हम पार्टी के डेथ वारंट पर साइन नही करेंगे। इतना ही नहीं, राजद सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव भी महागठबंधन की मुश्किलें बढ़ायी। पप्पू यादव, तारिक अनवर और पूर्व केन्द्रीय मंत्री नागमणि ने सपा के साथ मिलकर समाजवादी धर्मनिरपेक्ष मोर्चा बनाया है। 
        इस फ्रंट में सपा-85, जन अधिकार पार्टी-64,राकंपा-40, एनपीपी-3,  समरस समाज पार्टी- 28, समाजवादी जनता दल राष्ट्रीय- 23 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। यह फ्रंट भी ज्यादातर नीतीश और लालू के बागियों को तवज्जों दिया है। इस फ्रंट ने 4 विधायक, 32 पूर्व विधायक को जगह दिया है। बता दें कि कुल 70 विधायक बेटिकट कर दिये गये हैं। आल इंडिया मजलिस ए इतेहाज अल मुस्लिमीन (मीम) के सांसद असदुदीन ओवैसी ने सीमांचल में चुनाव लड़ने का फैसला कर महागठबंधन की मुश्किलें बढ़ा दी है।
        जदयू के प्रदेश प्रवक्ता डाॅ. अजय आलोक ने आरोप लगाया कि भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए औवैसी ने सीमांचल में चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। इसके लिए औवैसी और भाजपा के बीच डील हुयी है। हालांकि ओवैसी ने आलोक के आरोप को कड़े शब्दों में खारिज करते हुए चेतावनी दिया कि आरोप लगाने के पहले प्रमाण जुटा लें वरना मामले को कोर्ट में ले जाएंगे। ओवैसी ने अपने तर्क में कहा कि क्या दिल्ली में अभाविप की जीत, झारखंड में बीजेेपी की सरकार उनकी वजह से बनी?
        फिलहाल, वजह जो भी रही हो लेकिन ओवैसी और समाजवादी धर्मनिरपेक्ष मोर्चा के आगतन से महागठबंधन की मुश्किलें बढ़ी है। ओवैसी सीमांचल के चार जिलों के 24 सीटों पर लड़ने का फैसला किया है। किशनगंज मंे 70, अररिया में 42, कटिहार में 41 और पूर्णिया में करीब 20 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। 2010 के विधानसभा में कोसी और सीमांचल के अररिया, किशनगंज, पूर्णिमा, कटिहार, मधेपुरा, सहरसा, सुपौल के 37 सीटों में से 14 सीटें भाजपा जीती थी। 
       लेकिन जदयू के अलग हो जाने के बाद जब 2014 के लोकसभा चुनाव हुये तब भाजपा का प्रदर्शन नरेंद्र मोदी के लहर के बावजूद सीमांचल में खराब रहा। अररिया और मधेपुरा मंे राजद, किशनगंज और सुपौल में कांग्रेस जबकि पूर्णिया में जदयू और कटिहार में राकंपा जीती। पूर्णिया के अमौर में करीब 74.4 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। इस सीट पर भाजपा प्रत्याशी इसलिए जीत गये थे कि मुस्लिम मतों का विभाजन हुआ। बताया जाता है कि भाजपा ऐसे ही मुस्लिम मतों के विभाजन की उम्मीद कर रही है। हालांकि राजद के उपाध्यक्ष डाॅ. रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा कि ओवैसी को महागठबंधन में आना चाहिए इससे धर्मनिरपेक्ष मतों का बिखराव रूकेगा। देखें तो, बिहार में 47 ऐसी सीटें हैं जहां मुस्लिम वोट निर्णायक अवस्था में है। इसमें भाजपा 25 सीटें जीती थी।
      बहरहाल, नीतीश को इस स्तर पर घेरने के पीछे भी भाजपा की सियासी चाल ठहरायी जा रही है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से पप्पू यादव की मुलाकातों को इन घटनाक्रमों से जोड़कर देखा जा रहा है। पप्पू कहते हैं कि सांप्रदायिकता से ज्यादा खतरनाक लालू और नीतीश हैं। ऐसा माना जा रहा है कि भाजपा पप्पू यादव के जरिये यादव वोट बैंक में विभाजन का फायदा उठाना चाह रही है।  दूसरी तरफ, सपा को महागठबंधन से अलग होने के पीछे की वजह ग्रेटर नोएडा के पूर्व चीफ इंजीनियर यादव सिंह का मामला बताया जा रहा है। मुलायम सिंह यादव के भतीजा सांसद अक्षय यादव को एक लाख में तीन करोड़ रूपये का शेयर दिये जाने का आरोप यादव सिंह पर है। यह मामला सीबीआई जांच के दायरे में है। 
        पिछला घटनाक्रम को देखें तो, 30 अगस्त को पटना गांधी मैदान में महागठबंधन की स्वाभिमान रैली हुयी थी। इस रैली में सपा के प्रतिनिधि भी शामिल थे। इसके पहले सीटों का बंटवारा हो गया था। राकंपा की छोड़ी गयी तीन सीटों के अलावा लालू प्रसाद दो और सीटें सपा को देने की बात कही थी। फिर भी आठ दिन बाद सपा ने महागठबंधन से अलग होने का एलान कर दिया। हालांकि महागठबंधन से अलग होने के पहले रामगोपाल यादव के भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और इसके पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलायम सिंह यादव की मुलाकातों के धटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि अक्षय ने ऐसे किसी आरोप को मनगढंत कहा है।
       हालांकि नीतीश कुमार ने कहा है कि सपा पहले भी लड़ते रहे हैं, इसबार भी लड़ें। उन्हें कौन रोक सकता है। सपा का पिछला रिकाॅर्ड देखें तो उत्साहजनक नही है। सपा 1995 में 176 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, जिसमें दो सीटें जीती। 2000 में 122 सीटों पर चुनाव लड़ी, एक भी सीट नही जीती। 118 पर जमानत जब्त हो गयी थी। फरवरी 2005 में 142 में चार सीटें जीती थी। इसमें 131 पर जमानत जब्त हो गयी थी। नवंबर 2005 में 158 सीटों में से दो सीटें जीती थी। जबकि 150 पर जमानत जब्त हो गयी थी। वहीं 2010 में 146 सीटों पर चुनाव लड़ी लेकिन एक भी सीट नही जीती। यही हाल राकंपा का है। 2010 में 171 सीटों पर चुनाव लड़ी लेकिन 168 पर जमानत जब्त हो गयी थी। एक भी सीट नही जीत सकी।
      यही नहीं, इस दफा छह वाम संगठन भी एक साथ उतरी है। सीपीआईएमएल-96, सीपीआई-91 और सीपीएम-38 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। बाकी सीटों पर तीन अन्य संगठन चुनाव लड़ रही है। बसपा भी 243 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। लेकिन पिछला चुनाव परिणाम को देखें तो यह दल नतीजा तक भले ही नहीं पहुंच पाती हो, लेकिन जीत हार के फासले को संघर्षपूर्ण बनाती रही है। मतों का विभाजन महागठबंधन और एनडीए प्रत्याशियों की जीत हार का कारण बन सकती है। 
         2010 के चुनाव में 34 सीटों पर जीत का अंतर 20 हजार से उपर हुआ। जबकि 44 सीटों पर 10 से 20 हजार मतों के बीच था। वहीं 17 सीटों पर 5-10 हजार के बीच, 15 सीटों पर पांच हजार से कम मतों से जीत दर्ज हुयी थी। जबकि सात सीटों पर दो हजार से कम मतों के अंतर से हार जीत हुयी थी। यही नहीं, भाजपा नीतीश कुमार को विशेष राज्य के दर्जे पर चुप करने की कोशिश की है। नरेंद्र मोदी ने सवा लाख करोड़ रूपये का आर्थिक मदद की घोषणा की है। इधर, नीतीश कुमार ने विततंत्री अरूण जेटली को पत्र लिखकर सवा लाख करोड़ के पैकेज को अस्पष्ट बताते हुए विशेष राज्य के दर्जे की मांग की है। जवाब में केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने विशेष दर्जे के नाम पर नीतीश पर सियासत करने का आरोप लगाया है।
       दरअसल, बिहार का चुनाव महागठबंधन और एनडीए के लिए प्रतिष्ठा का विषय बना है। महागठबंधन मंे नीतीश कुमार की पुनर्वापसी का सवाल है। वहीं एनडीए को बिहार की सता पर काबिज होने का सवाल है। यही वजह है कि चुनाव की घोषणा के पहले ही भाजपा की चार बड़ी रैलियां और महागठबंधन की एक बड़ी रैली हो चुकी है। नीतीश कुमार कहते हैं कि नरेंद्र मोदी बिहार को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिये हैं।  दरअसल, भाजपा दिल्ली में हुयी बुरी हार की भरपायी बिहार से करना चाह रही है। इसके अलावा बिहार की जीत में भाजपा की एक बड़ी रणनीति छिपी है। देखें तो, राज्यसभा के 245 सीटों में से 70 सदस्यों का कार्यकाल जुलाई 2016 तक पूरा होनेवाला है। इसमें कांग्रेस के 18 सदस्य हैं। बिहार से राज्यसभा में 16 हैं, इनमें भाजपा से सिर्फ चार हैं। 
         राज्यसभा का आकड़ें देखें तो, कांग्रेस-68, भाजपा-48, सपा-15, जदयू और तृणमूल-12-12, बसपा-10, एआइडीएमके-11, माकपा-9, बीएसपी और एनसीपी-6-6 और बाकी दो-एक सदस्य हैं। बिहार विधानपरिषद में भी भाजपा की स्थिति कमजोर है। 75 सीटों में से 34 जदयू के सदस्य है। भाजपा-22, राजद-5, कांग्रेस-5, माकपा-2, लोजपा-1 , निर्दलीय-4 और भाजपा-जदयू के अध्यक्ष उपाध्यक्ष हैं।
       दूसरी तरफ, नीतीश और लालू ने एनडीए खासकर भाजपा के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए एमवाई कार्ड खेला है। महागठबंधन ने 243 में 97 सीटें एमवाई को दिया है। मुस्लिम को 33 जबकि यादव को 64 सीटें दी गयी है। रामविलास और मांझी को काटने के लिए 37 दलित महादलित को टिकट दिये गये हैं। अतिपिछड़ा को 25 सीटें दी गयी है। उपेंद्र कुशवाहा के हमले को कमजोर करने के लिए कोइरी कुरमी को 38 सीटें दी गयी है। इसके अलावा वैश्य-6 और सवर्ण जाति के 38 उम्मीदवार बनाये गये हैं.   
         जबकि एनडीए एमवाई समीकरण को सवर्णाें के जरिये काटने की कोशिश की है। सर्वाधिक 85 सीटें सवर्णों को दिये गये हैं। हालांकि एनडीए के 29 उम्मीदवार के नाम घोषित नही किए गए हैं। फिर भी एनडीए ने 25 यादव, 23 कोइरी कुर्मी, 18 वैश्य, 32 दलित महादलित, 20 अतिपिछड़ा और 9 अल्पसंख्यक को उम्मीदवार बनाया है। जगजीवन राम शोध संस्थान के जातीय आकड़े के मुताबिक, यादव-14, कोइरी-5, कुर्मी-4, अत्यंत पिछड़ा वर्ग-30, मुस्लिम-16.5, महादलित-10, दलित-6, भूमिहार-6, ब्राहम्ण-5, राजपूत-3, कायस्थ की एक प्रतिशत आबादी है। इस चुनाव में जदयू-101, राजद-101 और कांग्रेस-41 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। 
        देखें तो, सहयोगी राजद से भी नीतीश की मुश्किलें कम नही है। राजद शासन के कथित जंगलराज से तालमेल के जवाब को लेकर नीतीश बार बार विरोधियों के निशाने पर हैं। इन सबके बावजूद महागठबंधन में राजद को ज्यादा सीटंे मिलने की स्थिति में राजद का रवैया क्या रहेगा यह भी नीतीश के लिए चुनौती है। हालांकि लालू ने कहा कि अब नीतीश से कोई डर की बात नही है। नीतीश से भाई भाई का रिश्ता है। बहरहाल, यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि अपनों और विरोधियों के सियासी व्यूह से नीतीश निकल पाते हैं या नही!

Monday, 11 January 2016

सीनियर बाॅल नही छूने देते थे, लेकिन ज्योति ने रचा इतिहास



अशोक प्रियदर्शी
         बात 22 साल पहले की है। बिहार के नवादा जिले के कन्हाई नगर मुहल्ला निवासी ज्योति कुमार रावत बोकारो में पढ़ाई कर रहे थे। तभी हैंडबाॅल खेलने की इच्छा जगी। लिहाजा, वह हर रोज पांच किलोमीटर दूर कुमार मंगलम स्टेडियम में खेलने के लिए जाया करते थे। सिनियर खिलाड़ी उन्हें हैंडबाॅल नही छूने देते थे। क्योंकि बाॅल गंदा हो जाएगा। लेकिन सिनियर की मनाही उनके हैंडबाॅल खेलने की इच्छा को इरादे में तब्दिल कर दिया। वह ग्राउंड से सिनियर के जाने के बाद पुराने बाॅल से जूनियरों के साथ खेला करते थे। 
        ज्योति के इस हौसले का नतीजा रहा कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पद्र्धा में भाग लिया। करीब तीन-तीन दर्जन गोल्ड, सिलवर और ब्रांउच जीता। ज्योति बोकारो का पहला हैंडबाॅल खिलाड़ी था जिसे खेल कोटे से नौकरी मिला। 36 वर्षीय ज्योति अप्रैल 1997 में सीआइएसएफ में एएसआई में ज्चाइन किया। फिलहाल, वह भिलाई में एसआई है। ज्योति छतीसगढ़ सीआइएसएफ टीम की शान है। ज्योति 1996 में साउथ अफ्रिका में आयोजित काॅमन वेल्थ गेम मंे शामिल हुआ था तब भारत को सिल्वर मिला था। केन्या से दो गोल से भारत हार गया था।
        ज्योति अपना अनुभव बिहार के खिलाड़ियों में बांटना चाहते हैं। ज्योति कहते हैं कि बिहार में हैंडबाॅल टीम की बड़ी संभावना है। लेकिन ट्रेनिंग के अभाव में बिहार के खिलाड़ी आखिरी दौर में पिछड़ जाते हैं। इसलिए उनका मकसद है कि छुटटी के दिनों में हैंडबाॅल खिलाड़ियों को निःशुल्क प्रशिक्षण देना। ताकि कुशल खिलाड़ी तैयार हो सकें। क्योंकि खेल अब कॅरियर भी है।

कामयाबी की कहानी
 ज्योति को सबसे पहले 1993 में सब जुनियर नेशनल हैंडबाॅल चैंम्पियनशिप में बिहार टीम से शामिल होने का मौका मिला था। गोवहाटी में आयोजित चैंम्पियनशिप में बिहार चैथे स्थान पर था। वहीं ज्योति का चयन नेशनल हैंडबाॅल अकादमी भिलाई के लिए चयन कर लिया गया। लिहाजा, 1994 में अकादमी ज्वाइन कर लिया। वहीं से ग्रेजुएशन किया। उसके बाद जुनियर नेशनल में खेला। तब गोल्ड मिला। फिर 1996 में काॅमन वेल्थ में खेलने का अवसर मिला। साउथ अफ्रिका से लौटने के बाद सीआइएसएफ में एएसआई के पद पर चयन कर लिया गया। तब से वह छतीसगढ़ के लिए खेल रहे हैं।

खुशी का पल
     ज्योति गेम की सूचना परिजनों को नही देता था। ज्योति के मुताबिक, परिवार को देखने के बाद उनका कंफिडेंट कमजोर पड़ने लगता था। लेकिन बोकारो में गेम था। सीआइएसएफ भिलाई की ओर से था। उन्हें उस गेम में बेस्ट स्कोरर और बेस्ट प्लेयर का खिताब मिला था। तब पापा और बड़े भाई चुपचाप गेम देख रहे थे। ज्येति की जीत पर ग्रांउड में बधाई दिए थे।

परेशानी का पल
     1997 में इंगलैंड टीम जा रही थी। उन्हें अपनी प्रतिभा पर पूरा भरोसा था। लेकिन जब फाइनल टीम की सूची देखने पहुंचा तो उन्हें निराशा हुई थी। उनके जुनियर और आखिरी दौर मंे अकेेदमी में दाखिल हुए खिलाड़ी का चयन राष्ट्रीय टीम के लिए कर लिया गया था। चयन की यह प्रक्रिया उन्हें झकझोर दिया था।

प्रमुख उपलब्धियां-
1993-सब जुनियर नेशनल चैम्पियनशिप, गोवहाटी-चैथा स्थान
1995-1997-जुनियर हैंडबाॅल नेशनल चैंम्पियनशिप-तीन गोल्ड
1995-2015 तक- सिनियर नेशनल हैंडबाॅल चैंम्पियनशिप,
1997-2015 तक- वेस्टर्न जोन आॅल इंडिया चैम्पियनशिप,
1997-2015 तक- आॅल इंडिया पुलिस कैंप चैंम्पियनशिप,
1998-2015 तक- फेडरेशन कप, (-2015 में आध्र प्रदेश में फेडरेशन कप में सिल्वर मिला
-2015 में नोएडा में आयोजित वेस्टर्न चैम्पियनशिप में गोल्ड।)
(टीम को ज्यादातर खेलों में गोल्ड, सिलवर और ब्राउंच मिला है)

सांसद आदर्श ग्राम योजना का हाल: सांसदों ने गांवों को गोद तो लिया मगर पालना भूल गए

मधुरेश, 
साथ में नवादा से अशोक प्रियदर्शी 
     अपने महान भारत में बेहतरी से जुड़ी कोई चीज कितनी ज्यादा प्रचारित होती है और फिर कैसे उसे सबके सामने, सबके द्वारा मिलकर मार दिया जाता है, ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’, सिस्टम के इस विरोधाभास की खुली गवाही है। दैनिक भास्करने गांवों की सूरत बदलने वाली इस बहुप्रचारित योजना को खंगाला; उन गांवों को देखा, जिसे सांसदों ने गोद लिए थे। सभी पहले की तरह अनाथ से नजर आए। आप भी देखिए और तय कीजिए कि आखिर जिम्मेदार कौन है? चिंतन की प्रक्रिया यह बताने की हैसियत में होगी कि सबकुछ क्यों, कहां और कैसे ठहर जाता है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 अक्टूबर 2014 को सांसद आदर्श ग्राम योजना शुरू की। इसके बारे में जो कहा गया, यह जैसे प्रचारित हुआ, लगा कि सबकुछ बदल जाएगा। गांवों के देश भारत का हर गांव बारी-बारी से आदर्श हो जाएगा। मगर नौबत भ्रूण हत्या जैसी है। गांव, गोद तो ले लिए गए। बड़ी-बड़ी बातें हुईं। ग्रामीण विकास मंत्रालय की 40 पृष्ठों वाली पुस्तिका …, अहा, कितनी सुंदर है! लेकिन गोद लिए गए गांव? साल भर से ज्यादा हो गए। गांवों में शायद ही कुछ बदला। असल में माननीयों ने गांव, गोद तो ले लिए लेकिन उसे पालना भूल गए।

यही होता है। यही सिस्टम का दुर्भाग्य है। और यही चरित्र 21 वीं सदी में भी यहां की बहुत बड़ी आबादी को रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतों को लगातार तड़पा रहा है। जो फीडबैक है, गांवों की सूरत क्या बदलेगी, गोद लेने वाले ज्यादातर माननीय तो इन गांवों में जाते भी नहीं हैं। इस आदर्श व्यवस्था में भी राजनीति की भरपूर गुंजाइश तलाश ली गई है। बड़ा सवाल यह भी है कि पहले से चल रही प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना को किनारा देने की क्या जरूरत थी? योजना पर योजना, लेकिन काम…?

सांसद आदर्श ग्राम योजना यह भी बताता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पार्टी यानी भाजपा के सांसद भी अपने को प्रधानमंत्री के अरमानों का वाहक साबित नहीं कर पा रहे हैं। कई केंद्रीय मंत्रियों ने सांसद के रूप में गांवों को गोद लिया हुआ है। यहां भी कुछ नहीं हुआ है। हद है। हां, कुछ नहीं हो सकने की तहकीकात के दौरान कई व्यावहारिक दिक्कतें सामने आईं हैं। योजना को मुकाम देना है, तो इनका समाधान करना ही होगा। इस योजना का मकसद था, गोद लिए गए गांव के लोगों में उन मूल्यों को स्थापित करना, जिससे वे स्वयं के जीवन में सुधार कर दूसरों के लिए एक आदर्श गांव बने। दूसरे गांवों के लोग उनका अनुकरण उन बदलावों को स्वयं पर भी लागू करें। योजना की लंबी-चौड़ी मान्यताएं हैं, उद्देश्य हैं-बुनियादी सुविधाओं में सुधार, उच्च उत्पादकता, मानव विकास में वृद्धि करना, आजीविका के बेहतर अवसर, असमानताओं को कम करना, अधिकारों और हक की प्राप्ति से लेकर व्यापक सामाजिक गतिशीलता तक। दिखा कि कई सांसद तो इसे समझ भी नहीं पाए हैं। वे सीधे फंड की बात करने लगते हैं।
इन्होंने नहीं चुना गांव
पवन कुमार वर्मा, के सी त्यागी
रामचंद्र प्रसाद सिंह (तीनों जदयू के हैं)
योजना की मान्यताएं
> लोगों की भागीदारी से समस्याओं का समाधान
> समाज के सभी वर्गों का ग्रामीण जीवन से संबंधित सभी पहलुओं से लेकर शासन से संबंधित सभी पहलुओं में भाग लेने की गारंटी
> गांव के सबसे गरीब और सबसे कमजोर व्यक्ति को जीवन जीने के लिए सक्षम बनाना
> लैंगिक समानता व महिलाओं के लिए सम्मान
> सामाजिक न्याय की गारंटी 
> श्रम की गरिमा व सामुदायिक सेवा को स्थापित करना
> सफाई की संस्कृति को बढ़ाना
> पर्यावरण संरक्षण
> स्थानीय सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण, प्रोत्साहन
> आपसी सहयोग, स्वयं सहायता और आत्मनिर्भरता का निरंतर अभ्यास करना 
> शांति और सद्भाव को बढ़ाना
> सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता
> स्थानीय स्वशासन की भावना विकसित करना।


गोद में रहते हुए भी अनाथ है जीरादेई
सीवान का जीरादेई भारत के पहले राष्ट्रपति देशरत्न डा.राजेन्द्र प्रसाद का पैतृक गांव है। सीवान के भाजपा सांसद ओमप्रकाश यादव ने इसे गोद लिया है। ग्रामीण महात्मा भाई कहते हैं-हमने भी अखबार में पढ़ा था कि हमारा गांव गोद लिया गया है। मगर काम कहां कुछ हुआ? लोग बताते हैं-सांसद यहां तीन बार आए। साथ में डीएम साहेब भी। मीटिंग हुई। बात इससे आगे नहीं बढ़ी। एक पीसीसी सड़क बनी है। जलनिकासी ठप है। सिंचाई व्यवस्था चौपट। बिजली का पोल नहीं लगा। छठ घाट का शिलान्यास होकर रह गया। तालाब को सुंदर बनाने के काम में घटिया सामग्री का इस्तेमाल हो रहा है। आयुर्वेदिक औषधालय का भवन जर्जर। श्मशान घाट पर शेड तक नहीं। पीने लायक पानी नहीं।
राष्ट्रकवि के गांव के सपने तब परवान चढ़े थे, अब ...
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का गांव है सिमरिया। जब इसे गोद लिया गया, तब लोगों के सपने परवान चढ़े थे। लेकिन अभी तक यह गांव आदर्श बनने की दिशा में एक कदम भी नहीं बढ़ा है। लोग निराश हैं। सांसद ने ग्रामीणों के साथ दो बार बैठक की। लोगों ने 45 सूत्री पत्र सांसद को सौंपा लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। 1983 में भी तत्कालीन मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे ने इस गांव को आदर्श ग्रमा घोषित किया था। 2008 में इसे निर्मल ग्राम का पुरस्कार भी मिला। अभी चौतरफा गंदगी दिखती है। अस्पताल है। कई मुहल्लों में बिजली के खंभे नहीं हैं। रामधारी सिंह दिनकर स्मारक उच्च विद्यालय को उत्क्रमित कर प्लस टू का दर्जा दे दिया गया। दो साल से नामांकन भी हो रहा है। लेकिन शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हुई।
श्रीबाबू की जन्मस्थली पर बस 100 सोलर चरखा 
केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने नवादा के खनवां गांव को गोद लिया हुआ है। साल भर बाद भी गांव के विकास के लिए नया कदम नही उठाया गया। हां, मंत्री जी के प्रयास से सोलर चरखा और मशरूम की खेती जरूर शुरू हुई है। वैसे मशरूम की खेती में हुए नुकसान से किसान इससे किनारा भी करने लगे हैं। गांव में 100 सोलर चरखा लगाए गए हैं। महिलाएं सूत काटने का काम सीख रही है। खनवां, बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉ.श्रीकृष्ण सिंह की जन्मस्थली है। ग्रामीण संजय बिहारी बताते हैं-मंत्री जी चार दफा आए। खनवां पंचायत के पैक्स अध्यक्ष सतीश कुमार कहते हैं-मंत्री जी, खनवां को गोद लेने के बाद इसे भूल गए। खबर है कि गांव में सोलर चरखा का शेड के लिए एक एकड़ जमीन राज्य सरकार से मांगी गई है। राज्य सरकार के अधिकारी दिलचस्पी नही दिखा रहे।
लोकनायक के गांव में बहुत कुछ की दरकार

लोकनायक जयप्रकाश नारायण का गांव है। इसे छपरा के सांसद व केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूडी ने गोद लिया हुआ है। आदर्श ग्राम योजना घोषित होने के बाद यहां सांसद की ओर से हर घर में नल लगाने के लिए पैसा स्वीकृत किया गया है। श्री रूडी ने लाला टोला में चौपाल लगाकर तमाम व्यवस्थाओं को क्रमश: ठीक करने के लिए कहा। पठन-पाठन, वृद्धा, विधवा, विकलांग पेंशन, स्वास्थ्य व्यवस्था, साफ-सफाई, घाघरा नदी का कटाव के मसले से लेकर बिजली, सड़क तक की बातें। अफसर भी थे। इस चौपाल में काम का जो लक्ष्य निर्धारित था, यह पूरा नहीं हो पाया है। बेशक, कुछ काम हुए हैं लेकिन अब भी बहुत कुछ की दरकार है। सड़कें नहीं बदलीं। साफ-सफाई का कार्य उसी दिन चलता है जिस दिन कोई अधिकारी यह अभियान चलाते है। सिताबदियारा पंचायत को ई-पंचायत बनाने की योजना है। मुख्यालय के लिए सीधी बस सेवा चाहिए। किसानों की अधिकांश जमीन घाघरा नदीं निगल चुकी है। इंदिरा आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली …, जरूरत के बड़े मोर्चे हैं





प्यार मुझसे और शादी किसी और से

अशोक प्रियदर्शी
प्यार का दिखावा। फिर यौन शोषण। और जब लड़की मुसीबत में आ  जाय तो पीछे हट जाना। आमतौर पर ऐसी परिस्थिति में लड़कियां हार मान जाती है। लेकिन नवादा की चंपा ने साहस का परिचय दी है। शादी से मुकर रहे लड़के से जबरन शादी रचाकर चंपा ने ऐसे लड़कों के लिए कड़ा संदेश दी है। हुआ यूं कि जिले के वारिसलीगंज थाना के अब्दालपुर निवासी राजेन्द्र महतो की बेटी चम्पा और हिसुआ के सिंघौली निवासी रामदेव महतो के बेटे नरेश कुशवाहा उर्फ अमरजीत के बीच पिछले दो सालों से प्रेम प्रसंग था। चंपा के मुताबिक, अमरजीत ने शादी का वायदा किया था। शादी के नाम पर उसका यौन शोषण भी किया। लेकिन जब भी वह शादी का प्रस्ताव देती थी तब लड़का टाल देता था। 
          गुरूवार को चंपा ने फोन कर लड़का को मिलने के लिए बुलाई। उसे शादी का प्रस्ताव दिया। तब लड़का फिर टालने लगा। आखिर में कहा कि कोर्ट में शादी करेंगे। पर कोर्ट में जब दोनों की शादी की शपथ पत्र की औपचारिकताएं की जा रही थी। तभी लड़का धोखे से निकल गया। लेकिन चंपा ने उसे पकड़ लिया। उसने कहा-तुने मेरी इज्जत के साथ खेला है अब भागते कहां हो। भागने नही दूंगी। प्यार मुझसे दिखाओगे और शादी किसी और से। यह कैसे संभव है। 
          तब शादी की औपचारिकताएं पूरी की गई। हालांकि अमरजीत ने कहा कि मैं चंपा से प्यार करता हूं, लेकिन शादी बाद में करना चाहते थे। लेकिन चंपा के भाई सुलेन्द्र कुशवाहा ने कहा कि लड़का उसकी छोटी बहन के साथ दो साल से धोखा दे रहा था। इसलिए उसकी बहन ने ऐसी कदम उठाई है। बहन का कदम सराहनीय है। बता दें कि चंपा की बड़ी बहन कंचन की शादी अमरजीत के चचेरे भाई से हैं। इसी रिशते के कारण चंपा और अमरजीत के बीच नजदीकियां बढ़ी थी। अमरजीत ग्रेजुएशन में पढ़ रहा है जबकि चंपा इंटरमीडिएट पास है। 

Sunday, 10 January 2016

कैलेंडर गर्ल में हिरोइन की माँ बनकर आ रही बड़ी ठकुराइन

डॉ अशोक कुमार प्रियदर्शी
कलरस चैनल पर प्रसारित बैरी पिया की बड़ी ठकुराइन को सिरियल के दर्शक बखूबी जानते हैं। लेकिन बड़ी ठकुराइन कहां की है यह उनके मुहल्ला के लोग भी नही जानते। जाननेवाली बात है कि टीवी स्क्रीन पर दिखनेवाली बड़ी ठकुराइन कोई दूसरी महिला नही है। वह वही कं्राति भटट् हैं, जो ढाई दशक पहले नवादा की सड़कों पर शोभा दी रंग संस्था के बैनर तले शषिभूषण सिन्हा के निर्देशन में -औरत- नुक्कड़ नाटक का मंचन किया करती थी।
 फर्क यही है तब वह अपने उपनाम क्रांति भटट् के नाम से पहचानी जाती थी लेकिन अब वह असली नाम आसिमा भटट से जानी जाती हैं। अब वह मसहूर फिल्म निर्माता मधुर भंडारकर की फिल्म कैलेंडर गर्ल में एक्ट्रेस के रूप में सामने आ रही हैं। यह फिल्म 2015 में रीलिज हो रही है। यही नहीं, वह मेघना गुलजार की फिल्म में भी काम कर रही हैं। लेकिन आसिमा की अतीत पर गौर करें तो उसे अभिनय से लगाव जरूर था, लेकिन इसमें कॅरियर के बारे में नही सोचीं थी। वह पटना में पढ़ाई की। पत्रकारिता में सक्रिय थीं। 
             
तभी परवेज अख्तर के निर्देशन में रक्त कल्याण में शानदार भूमिका ने रूख मोड़ दिया। कई मंचों पर नाटकों का मंचन की। आसिमा की तुलना फिल्म अभिनेत्री रेखा से किया जाने लगा था। इसका असर यह हुआ कि आसिमा अभिनय की ओर रूख की। 14 साल पहले दिल्ली एनएसडी से पास की। पुणे से फिल्म अभिनय का कोर्स की। 
पिछले साल 26 जनवरी को जिस लघु फिल्म अंधविश्वास (बलाइंड फेथ) के निर्देशन को लेकर महेश बी पाटिल को कर्नाटक सरकार ने सम्मानित किया, उसमें अभिनय आसिमा ने ही की थी। अंजान औरत का खत नाटक में आसिमा की बिल्कूल अलग पहचान है। आसिमा कहतीं हैं कि दिल्ली में जब कभी इस नाटक का मंचन हुआ तब लेखक राजेन्द्र यादव (अब नही रहे) देखा करते थे। यही नहीं, लोगों को भी कहने से नही चूकते थे कि इस नाटक के बिना नाटक की चर्चा पूरी नही होती। 
यही नहीं, आसिमा टीवी सिरियल और लघू फिल्म में अपनी मजबूत पहचान बनाई है। दूरदर्शन और निजी चैनल्स पर प्रसारित दर्जनों सिरियलस में शानदार उपस्थिति दर्ज कराई हैं।  आसिमा के पिता सुरेश भटट जानेमाने समाजसेवी थे। हालांकि अब वे नही रहे। हालांकि आसिमा परिवार से जुड़ी रही हैं। अपने पिता के जीवन पर किताब निकाल रही हैं। वह कहती हैं कि अभिनय की दुनिया में आने की वजह फिल्मों जैसी रही, लेकिन फिल्मी ही सही परन्तु अच्छी है।

आसिमा का प्रमुख अभिनय
नाटक- एक अंजान औरत का खत, द्रोपदी, शहर के नाम, मीरा नाची, नजिम हिकमत की कविताएं, अलेक्जेंडर पुस्किन का प्रेम कविताएं जैसे 100 से ज्यादा नाटक
सिरियलस- दूरदर्शन पर प्रसारित आत्मजा, अखण्ड, कलर्स चैनल पर मोहे रंग दे, बैरी पिया, सोनी टीवी पर रिश्तों से बड़ी प्रथा, लाइफ ओके पर तुम देना साथ मेरा जैसे दर्जनों सिरियल्स।
लघु फिल्म-हिन्दी की लघु फिल्म बिटिया (सेव गर्ल चाइल्ड), डोमस्टिक वाइलेंस, ये ब्लाइंड फेथ, स्पॉट ब्याय, डायरेक्टर्स लव, ओह लॉर्ड, पोस्टर ब्यॉय और बंगला का एकला समेत अनेक लघु फिल्में। 
फिल्म- अमेरिकन डेलाइट (इंगलिश), महोत्सव (हिंगलिश) और हिन्दी फिल्म स्ट्राइकर, राहत काजमी का देख भाई देख, अलंकरिता का टर्निंग-30 और बैडलक गोविन्दा जैसे फिल्म में किरदार रहीं।