Tuesday, 11 October 2016

राधे श्याम यानि राॅयल स्टेग...., रामचंद यानि राॅयल चैलेंज....इंद्र भगवान यानि इम्पेरियल ब्लू....

डाॅ. अशोक प्रियदर्शी
      राधे..राधे, राधे...श्याम, राम...चंद्र, इंद्र भगवान, राम राम जैसे शब्द साधु संतों की जुबान से सुनने को मिलती रही है। लेकिन बिहार में शराबबंदी कानून लागू होने के बाद शराबियों की जुबां से ऐसे शब्द सुनने को मिलने लगे हैं। लेकिन इसका मतलब यह कदापि नही कि शराबियों का शराब से मोह भंग हो गया। बल्कि वह अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए शराब के विभिन्न ब्रांडों का नाम का ही भगवानीकरण कर दिया है। ताकि ऐसे शब्दों का प्रयोग बड़े ही सहजता से किया जा सके। लोगों को इसकी भनक तक नही लग सके।
      बिहार में शराबियों, दलालों और घर घर शराब पहुंचानेवालों के बीच यह नाम काफी लोकप्रिय है। भगवान के नाम पर शराबों की व्यापक पैमाने पर तस्करी हो रही है। दरअसल, शराबियों की जुबान से भगवान का नाम सुनने को मिलने लगी तब उत्सुकता जगी क्या शराबियों ने सचमुच में भक्ति का मार्ग अपना लिया है। इस बारे में जब जानकारी जुटाई तब पता चला भगवान का नाम शराब तस्कर अपना कवच के रूप मंे इस्तेमाल कर रहे हैं। इन शब्दों का प्रयोग कर शराबियों और कारोबारियों के बीच शराब के कारोबार किए जा रहे हैं।

शराब के किस ब्रांड का किस भगवान के नाम पर हो रहा प्रयोग
       आमतौर पर शराबियों और कारोबारियों के बीच बातचीत की शुरूआत राधेकृराधेकृसे होती है। उसके बाद शराब के ब्रांडों के लिए भगवान के नाम का जिक्र किया जाता है।  राधे श्याम यानि राॅयल स्टेग, राम चंद्र यानि राॅयल चैलेंज, इंद्र भगवान यानि इंपेरियल ब्लू, राम यानि रम के नाम से बात की जाती है। यही नहीं, बिहार पुलिस का नाम भी शराब के ब्रांड के तौर पर लिया जा रहा है। बिहार पुलिस यानि ब्लेंडर प्राइड। ऐसे कई नाम है जो शराबियों के बीच मशहूर है।

कैसे चल रहा कारोबार
       दरअसल, शराबबंदी के बाद बिहार में अवैध शराब का कारोबार तेजी से पनप रहा है। बिहार की सीमाई इलाका झारखंड, यूपी और नेपाल से व्यापक पैमाने पर शराब की तस्करी हो रही है। शराब की तस्करी में कोई परेशानी नही हो इसलिए इस तरह का नाम दिया गया है। बताया जाता है कि बाहर से आनेवाले शराबों की बिक्री दोगुणा और तीगुणा दामों पर की जा रही है। घर पर डिलीवरी करने के लिए अतिरिक्त 50-100 रूपए अधिक भुगतान करना पड़ता है। बाजार में फिलहाल राॅयल स्टेज, इम्पेरियल ब्लू, राॅयल चैलेंज, ब्लेंडर प्राइड, मैकडाॅयल नम्बर वन, बैग पाइपर की तस्करी चरम पर है। रम की बिक्री कम बतायी जा रही है। चूकिं इसकी खपत जाड़े में ज्यादा होती है।

पुलिस सख्ती के बाद भी नही थम रही शराब की कारोबार
       पांच माह मंे 85171 छापेमारी हुई है। अप्रैल से अगस्त तक कुल 13190 मामले दर्ज किए गए हैं। इसमें 13839 गिरफ्तारी हुई है। जबकि 13805 को जेल हुई है। सरकारी आकड़े के मुताबिक, 92291 लीटर देसी शराब, 26524 लीटर स्प्रीट, जबकि 11679 लीटर विदेशी और 9763 लीटर बीयर जब्त किया गया है।

बातचीत का अंश..
राधे श्याम यानि राॅयल स्टेग...
शराबी- राधे राधे, क्या हाल है? आपके राधे श्याम (राॅयल स्टेग) जी मुलाकात करना चाहते थे, कैसे होगा!
कारोबारी- ठीक ठाक हैं। समय बताइए, कब मिलना है, कहां मिलना है। भेज देंगे।
शराबी- पांच बजे शाम में। घर पर ही रहेंगे।
कारोबारी- ठीक हैं भेज देंगे। 

इंद्र भगवान यानि इमपेरियल ब्लू ...
शराबी-क्या हाल है। कैसा मौसम है। इंद्र भगवान बरस रहे हैं। 
कारोबारी- यहां इंद्र भगवान की पूरी कृपा है। जलमग्न हैं। आप कहें तो आपको भी इंद्र भगवान से दर्शन करा दें।
शराबी- इस सुखाड़ में इंद्र भगवान का दर्शन हो जाता तब बढिया था। 
कारोबारी- ठीक है। आप भी इंद्र भगवान का मजा लीजिए। भेजते हैं उनको।

राम चंद्र यानि राॅयल चैलेंज..
शराबी- राधे राधे। क्या हाल है आपके दुकान का। कौन कौन भगवान की मूर्ति है? मैं भी घर के लिए एक भगवान की मूर्ति मंगवाना चाह रहा हूं।
कारोबारी - सभी भगवान हैं। रामचंद्र हैं। इंद्र भगवान हैं। राधे श्याम हैं। जिस भगवान के बारे में बताइए। पूजारी को भेज देंगे।
शराबी- राम चंद्र जी की मूर्ति भेज दीजिए।
कारोबारी- ठीक है। 

बिहार पुलिस यानि ब्लेंडर प्राइड...
शराबी- इंसपेक्टर साहब प्रणाम। आपके बिहार पुलिस का क्या हाल है। मुलाकात करना था। कुछ काम है। 
कारोबारी (इंसपेक्टर के रूप में)- ठीक है। भेज देते हैं। बात कर लीजिएगा।
शराबी-ठीक है इंतजार करेंगे।

रम चाहिये तो 'राम' बोलो और रॉयल स्टैग के लिए 'राधेश्याम'

4-मिनट में पढ़ें  |   07-09-2016
     
      राधे-राधे, राधे श्याम, राम चंद्र, इंद्र भगवान, राम राम जैसे शब्द साधु संतों की जुबान से सुनने को मिलते रहे हैं. लेकिन बिहार में शराबबंदी कानून लागू होने के बाद शराबियों की जुबां से ऐसे शब्द सुनने को मिलने लगे हैं. इसका मतलब यह कदापि नही कि शराबियों का शराब से मोह भंग हो गया. बल्कि वह अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए शराब के विभिन्न ब्रांडों का नाम का ही भगवानीकरण कर दिया है. ताकि ऐसे शब्दों का प्रयोग बड़ी ही सहजता से किया जा सके. लोगों को इसकी भनक तक नही लग सके.
      बिहार में शराबियों, दलालों और घर घर शराब पहुंचाने वालों के बीच यह नाम काफी लोकप्रिय है. भगवान के नाम पर शराबों की व्यापक पैमाने पर तस्करी हो रही है. दरअसल, शराबियों की जुबान से भगवान का नाम सुनने को मिलने लगी तब उत्सुकता जगी क्या शराबियों ने सचमुच में भक्ति का मार्ग अपना लिया है. इस बारे में जब जानकारी जुटाई तब पता चला भगवान का नाम शराब तस्कर अपने कवच के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं. इन शब्दों का प्रयोग कर शराबियों और कारोबारियों के बीच शराब के कारोबार किए जा रहे हैं.
ब्रांड एंबेसडर भगवान
    आमतौर पर शराबियों और कारोबारियों के बीच बातचीत की शुरुआत राधेकृष्ण राधेकृष्ण से होती है. उसके बाद शराब के ब्रांडों के लिए भगवान के नाम का जिक्र किया जाता है. राधे श्याम यानि रॉयल स्टैग, राम चंद्र यानि रॉयल चैलेंज, इंद्र भगवान यानि इंपीरियल ब्लू, राम यानि रम के नाम से बात की जाती है. यही नहीं, बिहार पुलिस का नाम भी शराब के ब्रांड के तौर पर लिया जा रहा है. बिहार पुलिस यानि ब्लेंडर प्राइड. ऐसे कई नाम है जो शराबियों के बीच मशहूर है.
ऐसे चल रहा कारोबार
    दरअसल, शराबबंदी के बाद बिहार में अवैध शराब का कारोबार तेजी से पनप रहा है. बिहार के सीमाई इलाकों, झारखंड, यूपी और नेपाल से व्यापक पैमाने पर शराब की तस्करी हो रही है.
शराब की तस्करी में कोई परेशानी न हो इसलिए इस तरह का नाम दिया गया है. बताया जाता है कि बाहर से आनेवाले शराबों की बिक्री दो गुणा और तीन गुणा दामों पर की जा रही है.
पहले खुलेआम, अब भगवान के नाम पर...
घर पर डिलीवरी करने के लिए अतिरिक्त 50-100 रुपए भुगतान करने पड़ते हैं. बाजार में फिलहाल रॉयल स्टैग, इम्पीरियल ब्लू, रॉयल चैलेंज, ब्लेंडर प्राइड, मैकडॉवेल नम्बर वन, बैग पाइपर की तस्करी चरम पर है. रम की बिक्री कम बतायी जा रही है, चूंकि इसकी खपत जाड़े में ज्यादा होती है.
पुलिस सख्ती के बाद भी
पांच माह में 85171 छापेमारी हुई है. अप्रैल से अगस्त तक कुल 13190 मामले दर्ज किए गए हैं. इसमें 13839 लोगों की गिरफ्तारी हुई है. जबकि 13805 को जेल भेजा जा चुका है. सरकारी आंकड़े के मुताबिक, 92291 लीटर देसी शराब, 26524 लीटर स्प्रिट, जबकि 11679 लीटर विदेशी और 9763 लीटर बीयर जब्त किया गया है.
सौदे की बातचीत
[1]
शराबी - राधे राधे, क्या हाल है? आपके राधे श्याम जी मुलाकात करना चाहते थे, कैसे होगा?
कारोबारी - ठीक ठाक हैं. समय बताइए, कब मिलना है, कहां मिलना है? भेज देंगे.
शराबी - पांच बजे शाम में. घर पर ही रहेंगे.
कारोबारी- ठीक हैं भेज देंगे.
[2]
शराबी - क्या हाल है? कैसा मौसम है? इंद्र भगवान बरस रहे हैं.
कारोबारी - यहां इंद्र भगवान की पूरी कृपा है. जलमग्न है. आप कहें तो आपको भी इंद्र भगवान से दर्शन करा दें.
शराबी - इस सुखाड़ में इंद्र भगवान का दर्शन हो जाता तब बढ़िया था.
कारोबारी - ठीक है. आप भी इंद्र भगवान का मजा लीजिए. भेजते हैं उनको.
[3]
शराबी - राधे राधे. क्या हाल है, आपके दुकान का. कौन कौन भगवान की मूर्ति है? मैं भी घर के लिए एक भगवान की मूर्ति मंगवाना चाह रहा हूं.
कारोबारी - सभी भगवान हैं. रामचंद्र हैं. इंद्र भगवान हैं. राधे श्याम हैं. जिस भगवान के बारे में बताइए. पुजारी को भेज देंगे.
शराबी - राम चंद्र जी की मूर्ति भेज दीजिए.
कारोबारी - ठीक है.
[4]
शराबी - इंसपेक्टर साहब प्रणाम. आपके बिहार पुलिस का क्या हाल है. मुलाकात करना था. कुछ काम है.
कारोबारी (इंसपेक्टर के रूप में) - ठीक है. भेज देते हैं. बात कर लीजिएगा.
शराबी - ठीक है इंतजार करेंगे.
इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.कॉम या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.
लेखक
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं


त्रिपुरारी शरण नही रहे, लेकिन अब उनकी परिकल्पणा हो रही साकार

अशोक प्रियदर्शी, सेखोदेवरा आश्रम (नवादा)
आठ साल पहले की है। बिहार के नवादा जिले में करीब 5000 परंपरागत चरखा चलता था। इसमें अकेला 1500 चरखा कौआकोल में चलता था। इस चरखा में आठ घंटे मजदूरी के बाद मुश्किल से 40 रूपए की आमदनी होती थी। लिहाजा, लोग धीरे धीरे परंपरागत चरखा से विमुख होने लगे थे। गांव गांव से चरखा लौटकर सेखोदेवरा आश्रम में लौटने लगा। सेखोदेवरा आश्रम स्थित ग्राम निर्माण मंडल की खादी संस्था घाटे में पहुंच गई। 
       तभी आश्रम के संरक्षक त्रिपुरारी शरण (अब जीवित नही) ने एक चरखा का माॅडल विकसित किया। यह आठ, सोलह और बतीस तकुए का था। यह परंपरागत चरखा की तुलना में सहज और अधिक उत्पादन करनेवाला है। 2009 में त्रिपुरारी शरण ने इस चरखे को पेटेंट कराया।  इसका नाम त्रिपुरारी माॅडल चरखा रखा गया।
        2011 में त्रिपुरारी शरण बिहार सरकार को एक प्रस्ताव भेजे थे। इसमें त्रिपुरारी माॅडल चरखा को परंपरागत चरखा के वैकल्पिक रूप में अपनाने के लिए आग्रह किया गया था। प्रस्ताव में सरकार को अवगत कराया गया कि त्रिपुरारी माॅडल चरखा खादी उत्पादन को बढ़ावा देने में मददगार साबित होगा। इस चरखा से कई गुणा अधिक आमदनी होगी। 


खादी बोर्ड के आदेश पर हो रहा पहल
करीब पांच साल बाद 2014-15 में त्रिपुरारी माॅडल चरखा को बिहार सरकार ने कैबिनेट से मंजूरी प्रदान कर दी। इसके लिए 44 करोड़ रूपए स्वीकृत किया गया। इस फैसले को अब बिहार राज्य खादी ग्रामोधोग बोर्ड ने लागू करने की पहल शुरू कर दी है। बोर्ड ने सेखोदेवरा आश्रम को एक हजार चरखा वितरित करने की जिम्मेवारी दी है। सेखोदेवरा आश्रम के प्रधान मंत्री अरविंद कुमार ने बताया कि एक हजार चरखा का निर्माण कर लिया गया है। बोर्ड की सूची के मुताबिक, बिहार के प्रत्येक जिलों में त्रिपुरारी माॅडल चरखा उपलब्ध कराया जाना है।

कौन थे त्रिपुरारी शरण
त्रिपुरारी शरण लोक नायक जयप्रकाश नारायण के अनुयायी थे। जेपी द्वारा सेखोदेवरा आश्रम में स्थापित ग्राम निर्माण मंडल संस्था के प्रधान मंत्री और संरक्षक रहे। बाद में वह बिहार राज्य खादी ग्रामोधोग बोर्ड के अध्यक्ष भी बने। बिहार सरकार ने 2009 में त्रिपुरारी शरण को खादी पुरूष का पुरस्कार दिया गया था। दो लाख रूपए और प्रशस्ति पत्र दिया गया था। यह राशि संस्था के विकास में दे दिए थे। यही नहीं, झारखंड सरकार ने उन्हें खादी रत्न से सम्मानित किया। हालांकि 26 जून 2013 को उनका निधन हो गया। लेकिन उनका सपना अब साकार हो रहा है।

प्रयोग के तौर पर 400 चरखा चल रहा था
बिहार के नवादा और औरंगाबाद जिले में करीब 400 त्रिपुरारी माॅडल चरखा प्रयोग के तौर पर पहले से संचालित किया जा रहा था। नवादा के झीलार, कपसिया, सिंघना, रतोई, नवाजगढ़, पार्वती, लालविगहा में करीब 200 चरखा का संचालन सफल रहा है। वहीं औरंगाबाद में 200 चरखा संचालित किया जा रहा है। बता दें कि सेखोदेवरा आश्रम से प्रत्येक साल करीब एक करोड़ रूपए का खादी कपड़े तैयार किए जा रहे हैं। त्रिपुरारी माॅडल चरखा की कीमत 16 हजार रूपए है। जबकि परंपरागत चरखा की कीमत 2200 रूपए है। 

      सेखोदेवरा आश्रम के प्रधान मंत्री अरविंद कुमार ने कहा कि संस्था का करीब  एक करोड़ 51 लाख 18 हजार 700 रूपए सरकार का बकाया है। त्रिपुरारी माॅडल चरखा के अपनाए जाने से आश्रम की आर्थिक तंगहाली दूर होगी। साथ ही खादी कपड़े की बुनाई का अस्तित्व कायम रहेगा। बुनकरों की कई गुणा आमदनी बढ़ जाएगी।

Monday, 10 October 2016

आइने में अपना चेहरा देखने से भी डरता है मिथुन



अशोक प्रियदर्शी

           ग्यारह साल पहले की बात है। बिहार के नवादा जिले के नारदीगंज थाना के ननौरा पंचायत के तिलकचक गांव निवासी रामजी चैहान के पांच वर्षीय पुत्र मिथुन के गाल पर फूंसी हो गया था। फूंसी के दर्द से मिथुन काफी परेशान था। रामजी चैहान ने पड़ोसी गांव गोतराईन के एक ग्रामीण प्रैक्टिशनर से इलाज कराया। उस ग्रामीण प्रैक्टिशनर ने मिथुन को दो दवाएं दी थी। तीन दिन तक खिलाने के लिए कहा था। उन तीन दिनों के अंतराल में मिथुन का चेहरा विकृत हो गया। पूरा शरीर लाल हो गया। ग्रामीणों ने बताया कि मिथुन को माताजी हो गया है। कुछ दिनों तक ठीक होने का इंतजार किया गया। झार फूंक कराया। फिर भी स्वस्थ्य नही हुआ।
           उसके बाद मिथुन के पिता ने नवादा सदर अस्पताल में दिखाया। तब चिकित्सक ने बताया कि दवा रियेक्शन कर गया है। इसके चलते ऐसी हालत हुई है। उसके बाद काफी दिनों तक इलाज कराया, फिर भी ठीक नही हुआ। दिनों दिन शरीर और भी भयावह हो गया। अब उसकी हालत इतनी भयावह है कि उसे देखते ही लोगांे के रेंगटे खड़े हो जाते हैं। बड़े तो धीरे धीरे अभ्यस्त हो गए हैं। लेकिन बच्चे सामने आने से डरते हैं। छोटे बच्चे तो चिल्लाने लगते हैं। रात में मिथुन का घर से बाहर निकलना दुश्वार है। रात में अचानक मिथुन का चेहरा देखते ही कई लोग भूत मानकर डर गए हैं। लिहाजा, परिवार के लोग अब रात में मिथुन को घर से नही निकलने देते हैं। मिथुन अपना चेहरा भी आइने में देखने से डरता है। मिथुन ठीक से बोल भी नही पाता है




मिथुन का दाखिला कराने गए पिता तब उन्हें निराश लौटना पड़ा
16 वर्षीय मिथुन जब आठ साल का था तब उसके पिता ने गांव के प्राइमरी स्कूल में दाखिला के लिए ले गए थे। लेकिन मिथुन को देखते ही स्कूल के बच्चे चिल्लाने लगे। भूत-भूत कहने लगे। लिहाजा, स्कूल टीचर ने दाखिला लेने में लाचारी व्यक्त किया। लिहाजा, दोनों वापस लौट आए। उसके बाद से मिथुन की पढ़ाई का रास्ता भी बंद हो गया। मिथुन ज्यादातर घर में रहता है। मिथुन बताते हैं कि बचपन में जो उनके साथ खेला करते थे आज वह उन्हें देखकर भागते हैं। वह डरते हैं। वह कहता है कि वह घुटन और तकलीफदेह जीवन जीने को बाध्य है। घर में मन नही लगता है तब खेतों की तरफ बकरी चराने के लिए निकल जाते हैं।
परिवारिक पृष्ठभूमि
तिलकचक निवासी रामजी चैहान के पांच बेटे मनोज, जितेन्द्र, दीपा, मिथुन, आजाद कुमार हैं। चार भाई ठीक है। लेकिन मिथुन की हालत दयनीय बनी है। वैसे काफी प्रयास के बाद मिथुन को 11 जनवरी 2015 को विकलांग सर्टिफिकेट बना। लेकिन अबतक किसी तरह की राशि नही मिली है। मिथुन को अन्य सरकारी मदद भी नही मिला है। मिथुन के पिता भी बीपीएल परिवार में हैं। लेकिन इस परिवार को भी आवास आदि की सुविधा नही मिली है। प्रत्येक माह राशन किरासन भी नही मिल पाता है। रामजी चैहान कहते हैं कि अपनी क्षमता के मुताबिक मिथुन का नवादा के अलावा  गया और पटना के अस्पतालों में इलाज कराया लेकिन ठीक नही हुआ। बड़े अस्पतालों में जाने की क्षमता नही है। उनके पास सिर्फ दस कटठा जमीन है। मजदूरी से जीवन चलता है।

रेवरा आंदोलन की सफलता की कहानी, बुजुर्गों की जुबानी

डाॅ. अशोक प्रियदर्शी
         बिहार के नवादा जिले के काशीचक प्रखंड में एक गांव है रेवरा। रेवरा किसान आंदोलन का तीर्थस्थल रहा है। लेकिन इसकी खूबियों से बहुत कम लोग वाकिफ रहे हैं। समय के साथ रेवरा सत्याग्रह की कहानी गुम पड़ती जा रही है। उस दौर के ज्यादातर लोग गुजर गए। लेकिन अब भी कुछ लोग जीवित हैं, जिनकी जुबां पर रेवरा की कहानियां जीवंत है। आज भी रेवरा सत्याग्रह कई मायने में महत्वपूर्ण है। प्रतिकूल परिस्थिति में ग्रामीणों की एकजुटता समाज को प्रेरणा देता है। महिलाओं के हौसले समाज को झकझोरता है। आइए जानते हैं रेवरा आंदोलन की सफलता की कहानी रेवरा के बुजुर्गों की जुबानी।




    
प्रतिकूल परिस्थिति में ग्रामीणों ने संयम नही खोया
बच्चू नारायण शर्मा, उम्र- 80 साल
    जमींदार के अत्याचार के कारण रेवरा के ग्रामीणों के समक्ष भूखों मरने की नौबत थी। गांव के कुछ लोग जीविका के लिए पलायन कर गए थे। बाकी बचे लोग बैलगाड़ी चलाकर गुजारा करते थे। 80 वर्षीय बच्चू नारायण शर्मा कहते हैं कि उसी दौर में उनका जन्म हुआ था। लेकिन होश संभालने के बाद जमींदारों का अत्याचार खत्म हो चुका था। लेकिन बुजुर्ग बताया करते थे कि छप्पड़ पर दो कददू फलता था उसमें एक कददू जमींदार का, दो बकरे में एक जमींदार का हो जाता था। 
     ईख की खेती होती थी। कोलसार में ईख की पेराई होती थी। लेकिन जमींदार के कारिंदे रातभर उसकी निगरानी करते थे। ऐसी कई प्रतिकूल परिस्थितियां थी। ताज्जुब कि अत्याचार के उस दौर में ग्रामीणों ने संयम नही खोया। कोई चोर और डाकू नही बना। संघर्ष का रास्ता अख्तियार किया। यही वजह है कि जमींदार के अत्याचार से मुक्ति मिली और रेवरा एक मिसाल बना।


रेवरा का कोई किसान मजदूर नही बचा था भूमिहीन

काशी पंडित, उम्र-100 साल
    रेवरा निवासी काशी पंडित मजदूर परिवार से हैं। उनके परिवार में करीब एक एकड़ जमीन है। करीब 100 वर्षीय काशी पंडित कहते हैं कि वह रेवरा आंदोलन के समय स्वामी सहजानंद सरस्वती के अनुयायी थे। वह जूल्मी जमींदार के खिलाफ गीत गाते थे। झंडा लेकर स्वामीजी के साथ घुमते थे। इस आंदोलन की खासियत कि मजदूर और किसान सभी भागीदार थे। 
    खेतों के बंटवारे में भी किसान और मजदूरों की भागीदारी रही। काशी पंडित के मुताबिक, रामधन सिंह और लखपत सिंह परिवार में सवा-सवा सौ विगहा जमीन थी। लेकिन उन परिवारों ने करीब 50-50 विगहा जमीन किसान और मजदूरों को दे दिय था। करीब 300 विगहा जमीन किसान और मजदूरों को बांटा गया था। रेवरा का कोई भी किसान और मजदूर भूमिहीन नही था। रेवरा सत्याग्रह सामाजिक न्याय का भी अनूठा उदाहरण रहा है। 

    
एकजुटता लाई थी रंग, आठ माह के आंदोलन में मिली सफलता
रामचंद्र सिंह, रेवरा, नवादा, उम्र-90
      वैसे तो, रेवरावासियों के संघर्ष की कहानी लंबी है। पर असल आंदोलन आठ माह की है। 90 वर्षीय रामचंद्र सिंह बताते हैं कि 1938-39 के आठ माह के किसान आंदोलन के आगे जमींदार को झुकना पड़ा था। स्वामीजी की अगुआई में रेवरा में सत्याग्रह हुआ था। देशभर से करीब 25 हजार किसान जुटे थे। खास कि आंदोलन के लिए भोजन की व्यवस्था भी आंदोलनकारी खुद जुटाते थे। इस आंदोलन में गांव का एक एक व्यक्ति साझीदार था।
       रामचंद्र सिंह कहते हैं कि महिलाएं भी रेवरा आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाईं। पुरूष जब कमजोर पड़ने लगते थे तब महिलाएं आगे आने के लिए उन्हें प्रेरित करती थी। यही नहीं, जमींदार के कारिंदे और ब्रिट्शि अधिकारियों का अत्याचार जब बढ़ गया, पुरूष भागने को मजबूर हो गए तब महिलाएं लड़ाई में कूद गईं। आखिर में ब्रिट्रिश अधिकारियों और जमींदार के कारिंदे पीछे लौटने पर मजबूर हो गए थे।

क्या है रेवरा आंदोलन,
          रेवरा के ग्रामीण जमींदार और उनके कारिंदे के अत्याचार से त्रस्त थे। स्वामी सहजानन्द ने ‘अपनी जीवन संघर्ष’ और ‘किसान कैसे लड़ते हैं’ नामक पुस्तक में जमींदारों के अत्याचार की कहानियों का जिक्र किया है। गांव के करीब 1500 विगहा जमीन को साम्बे के स्थानीय जमींदार रामेश्वर प्रसाद सिंह बगैरह ने नीलाम करवा ली थी। लिहाजा, गांव के पांच छः सौ व्यक्ति चिथरा पहने भूखो मरते थे। जमींदार मनमाना लगान वसूल रहे थे। लिहाजा, किसानांे की जमीन नीलाम हो गई थी। 
          जमींदारों के जुल्मांे सितम से परेशान रेवरावासी जमींदार, मजिस्ट्रेट, मंत्रियों और लीडरो के पास दौड़ लगाते थक गए थे। किसी ने मदद नही की। तब किसानों ने पंडित यदुनन्दन शर्मा का हाथ पकड़ा। फिर स्वामीजी का साथ मिला। उसके बाद आंदोलन व्यापक आकार ले लिया था। इसमें राहुल सांकृतायन, ब्रह्मचारी बेनीपुरी ने किसानों का पूरा साथ दिया था। आखिर में तत्कालीन कलक्टर हिटेकर को समझौता करना पड़ा था। करीब डेढ़ सौ विगहा छोड़कर बाकी जमीन किसानों और मजदूरों में बांट दी गई थी। किसानों के सत्याग्रह के कारण रेवरा देश के अन्य किसानों का प्रमुख तीर्थ बना था।

डाॅ. दिवाकर-बचपन में दिनकर का ऐसा चढ़ा फीवर की जो बुढ़ापे में भी नही उतरा

डाॅ.अशोक प्रियदर्शी      
बात 1957 की है। दिवाकर आठवीं कक्षा में थे। तभी दिवाकर के पैतृक गांव बेगूसराय के शोकहरा ग्राम पुस्तकालय में कवि सम्मेलन आयोजित हुआ था। तब विष्णुदेव आर्क ने उस सम्मेलन में रामधारी सिंह दिनकर को आमंत्रित किया था। दिनकर करीब तीन घंटे तक कवि सम्मेलन का हिस्सा रहे। दिनकर ने राष्ट्र, समाज और राजनीति पर केन्द्रित कई कविताएं सुनाई। दिनकर की कविताएं श्रोता के रूप में मौजूद दिवाकर के जीवन पर अमिट छाप छोड़ दिया। डाॅ. दिवाकर कहते हैं कि उसने तभी तय कर लिया था कि वह हिंदी साहित्य का अध्ययन करेंगे।
        दिवाकर साइंस के अच्छे स्टूडेंट थे। लेकिन जब मैट्रिक पास किए तब आर्ट्स से पढ़ाई करने का निर्णय लिया। इसपर परिवार वाले नाराज हो गए। परिजनों ने फटकार लगाई कि हिंदी साहित्य पढ़कर भूखे मरेंगे। लेकिन दिवाकर ने फैसला नही बदला। वह जीडी काॅलेज बेगूसराय से हिंदी में ग्रेजुएशन और पटना यूनिवर्सिटी से पीजी किया। यही नहीं, हिन्दी नाट्य उद्भव और विकास विषय पर पीएच.डी किया। इसके बाद वह अस्थाई तौर पर बरौनी के एपीएसएम काॅलेज में ज्वाइन किया।
       फिर वह 1973 में मगध यूनिवर्सिटी के अंगीभूत इकाई केएलएस काॅलेज नवादा में हिंदी लेक्चरर के रूप में ज्वाइन किया। 2002 में रिटायर किया। इस दौरान वह हिंदी साहित्य से जुड़े गतिविधियां चलाते रहे। वह दृष्टि नामक एक पत्रिका का प्रकाशन किया। पत्रिका में दिनकर, नेपाली, बेनीपुरी, महादेवी, द्विज, निराला, राहुल सांस्कृताय जैसे महान विभूतियों का विशेषांक प्रकाशित किया।
  लेकिन इतना से हिंदी साहित्य का फीवर उतरा नही। वह दिनकर का कर्जदार मानते हैं। लिहाजा, दिनकर के लिए कुछ खास करना चाह रहे थे। लेकिन अध्यापन काल में समय की आपाधापी में उसे पूरा नही कर पाए। लिहाजा, रिटायरमेंट के बाद दिनकर पर काम शुरू कर दिया। इसके तीन चार माह बाद सितंबर 2002 में 640 पेज की पुस्तक प्रकाशित कराया। यह दिनकरनामा, भाग-एक के नाम से आया। इसे प्रकाशित करने का तरीका भी खास था। जनसहयोग से किताब का प्रकाशन किया। इसके बदले में सहयोगकर्ता को पुस्तक उपलब्ध कराया। सहयोग करनेवालों का नाम भी किताब में जिक्र किया।
   डाॅ. दिवाकर यही नहीं रूके। अगस्त 2007 तक दिनकरनामा का पांच भाग प्रकाशित कर दिया। यह दिनकर के जीवन पर केन्द्रित है। 2008 में छठा खंड प्रकाशित हुआ, जो दिनकर के काव्य पाठ पर केन्द्रित है। डाॅ.दिवाकर का मानना है कि उनके जीवन और कविता का अंत नही है। उनपर दस खंड भी कम पड़ेगा। वह कहते हैं कि उनमें इतनी ताकत नही कि वह दिनकर के बारे में इतना लिख सके। दरअसल, दिनकर जी का भूत था जिसका वह माध्यम बने। इसके लिए वह दिन और रात में फर्क नही महसूस किया। भूख मिट गया। इसके लिए पत्नी की डांट भी सुननी पड़ती है।
         अब भी दिनकर के प्रति लगाव कम नही हुआ है। नियमित रूप से नवादा रेलवे स्टेशन के समीप एक चाय दुकान में बैठते हैं, जहां उनके परिचित साहित्यप्रेमी जुटते हैं। ज्यादातर लोगों की चाय फीकी बनती है, लेकिन दिनकर की कविताओं और उनके संधर्षों की कहानियों से स्वाद मिठी लगती है।

किताब लिखने के पहले दिनकर की जाति नही देखी
डाॅ दिवाकर कहते हैं कि जब मैंने पद्मभूषण राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की किताब लिखनी शुरू की थी तब उनकी जाति नही देखी थी। लेकिन ताज्जुब कि जब जब दिनकर की किताब प्रकाशित हुई तब तब उनके कई प्रिय साथियों ने दिनकर की जाति बताई। अहसास कराया कि आप वैश्य यानि तेली समाज से हैं। दिनकर भूमिहार (ब्राहम्ण) समाज से थे। वैश्य समाज के भी कई ख्याति प्राप्त साहित्यकार थे। उनपर किताबें लिखते।
डाॅ. दिवाकर कहते हैं कि इस सवाल का जवाब समझाने में विफल रहा। दिवाकर कहते हैं कि मैं अपने शुभचिंतकों को कैसे समझाउं कि दिनकर जब कविता कह रहे थे तब श्रोताओं की जाति नही पूछी थी। मैं जब सुन रहा था तब उनकी जाति नही देखी थी। तब वक्ता और श्रोता का संबंध था। उसी रूप में उनका अनुयायी बनने का फैसला किया। वह मेरे लिए आदर्श रहे। प्रेरणा स्त्रोत रहे।

परिवारिक पृष्ठभूमि
नवादा नगर के मिरजापुर निवासी डाॅ. दिवाकर बेगूसराय जिले के बरौनी के शोकहरा गांव के रहनेवाले हैं। फिलहाल, नवादा नगर के मिरजापुर में रहते हैं। उनके दो पुत्र बचनेन्द्र कुमार दीपम और पियूष शुभम है। दो पुत्रियां  यामिनी प्रीतम और मंगलम इत्यलम हैं। पत्नी गायत्री कुमारी आरएमडब्लू काॅलेज में समाजशास्त्र की प्रोफेसर थी। लेकिन उनका देहांत हो गया है।

डाॅ. दिवाकर पर शोध
        डाॅ. दिवाकर के जीवन और साहित्य पर शोध किया गया है। काॅलेज आॅफ काॅमर्स, पटना के हिन्दी विभाग के डाॅ. विनोद कुमार मंगलम के निर्देशन में नरेश प्रसाद ने यह शोध किया है। नरेश ने शोध के विषय प्रवेश में लिखा है कि डाॅ. दिवाकर पर शोध के बहाने उनके साहित्यिक क्रिया कलापों और कृतियों पर प्रकाश डालने का प्रयास किया जा रहा है। ताकि लोग उनके कठिन साहित्यिक श्रम साधना और त्याग के मूल्य को समझ सके।

मम्मी पापा ने खुशबू को घर में कैद कर दिया था, पर वह वियतनाम में धूम मचाई

अशोक प्रियदर्शी
         तीन साल पहले की बात है। खुशबू बिहार महिला हैंडबाॅल की कप्तान थी। लेकिन खुशबू को उसके मम्मी पापा ने खेल मैदान जाने से रोक दिया। घर की चहारदीवारी में कैद कर दिया गया। खुशबू सात दिनों तक रोयी थी। खुशबू के मुताबिक, वह कई माह तक खेल मैदान नही गई। बड़ी मुश्किल से बंदिशों से आजादी मिली। वही खुशबू आज 24 सितंबर से 3 अक्तूबर तक वियतनाम में आयोजित पांचवीं एशियन बीच गेम्स में भाग ली है। खुशबू बिहार की अकेली खिलाड़ी है, जो इंडियन वुमेनस बीच हैंडबाॅल टीम की हिस्सा बनी।

          हालांकि पांच माह पहले हैंडबाॅल फेडरेशन की ओर से पाकिस्तान में आयोजित गेम के लिए भी खुशबू को भारतीय महिला टीम में शामिल किया गया था। लेकिन आखिरी दौर में वीजा देने की त्रृतिपूर्ण प्रक्रिया के कारण वह पाकिस्तान जाने से वंचित रह गई थी। लेकिन इसके पहले 2015 में बांगलादेश के चिटगांव, ढाका मेें आयोजित हैंडबाॅल प्रतियोगिता में खुशबू इंडियन टीम का हिस्सा थी। यही नहीं, फरवरी 2016 में पटना में भारतीय खेल प्राधिकार के तहत आयोजित राजीव गांधी खेल अभियान के नेशनल वुमेन स्पोर्टस चैम्पियनशिप में बिहार को जीत दिलाई।

बंदिशों से मुक्ति के बाद मिली कामयाबी
       

बिहार के नवादा जिले के पटेलनगर की खुशबू की कामयाबी घर की बंदिशों से आजादी के बाद मिली है। दरअसल, तीन पीढ़ियों के बाद अनिल सिंह की दो बेटियां खुशबू और सोनी थी। खुशबू के दादा को मंजूर नही था कि लड़कियां खेल मैदान में जाएं। लड़कों के साथ खेलें। दूसरे जगह खेलने जाय। हालांकि दादा की जानकारी के बगैर खुशबू को उसके मम्मी पापा खेल मैदान भेजा करते थे। लेकिन खुशबू की उपलब्धियां जब छपा करती थी तब दादा एतराज किया करते थे।
       खुशबू के मम्मी पापा बताते हैं कि घर के बाहर भी पास पड़ोस के लोग भी तरह तरह के उलाहना से उनसबों को जीना मुहाल कर दिया था। आर्थिक तंगी के बावजूद खुशबू को खेलने के लिए भेजा करते थे। फिर भी सामाजिक उलाहना के कारण खुशबू को खेल मैदान जाने से रोका गया था। लेकिन फिर खुशबू ने भरोसा दिलाई कि अपनी उपलब्धियों से सबका मुंह बंद कर दूंगी। यह सच साबित हुआ। उसने मेडलों से धर भर दिया। बोलनेवालों की जुबां पर ताला लग गया।
       खुशबू की उपलब्धियों से उसके मम्मी पापा बेहद खुश हैं। मम्मी प्रभा देवी और पापा प्रभा देवी कहते हैं कि किस माता पिता को बेटी की खुशी अच्छा नही लगता। लेकिन समाज बेटियों के बारे में धारणा ठीक नही रखती। इसके चलते गरीब परिवार की बेटियों को आगे बढ़ने में ऐसी परेशानियां आती है। दरअसल, खुशबू का पैतृक गांव नारदीगंज प्रखंड का परमा है। बच्चों के परवरिश के लिए नवादा शहर में रहते हैं। आटा चक्की मील चलाकर परिवार का परवरिश करते हैं। खुशबू कहती हैं कि मम्मी पापा के दबाव के बाद आगे बढ़ने की लालसा बढ़ गई। उसका नतीजा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भाग लेने का अवसर मिलने लगा।

शानदार रहा है खुशबू का प्रदर्शन 
     देखें तो, खुशबू को खेलने से तब रोक दिया गया था जब वह राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी थी। बिहार के खेलों में लगातार 2014 तक नवादा को गोल्ड मेडल मिला है। यही नहीं, 2008 से लगातार हैंडबाॅल वुमेन टीम की कैप्टन है। खुशबू को लगातार बेस्ट खिलाड़ी का अॅवार्ड मिलता रहा है। खुशबू अपनी मेहनत से मेडलों और प्रशस्ति पत्र का अंबार लगा दी है। खुशबू का चयन भी जिला पुलिस बल में हो गया है। 
     खुशबू की बहन सोनी बीएसएफ मेें हेड कंास्टेबल है। भाई दीपक गे्रजुएशन कर रहा है। देखें तो, खुशबू को इस हैंडबाॅल खेल में आन की कहानी दिलचस्प है। 2008 में नवादा में 54वीं नेशनल स्कूल गेम आयोजित हो रहा था। हैंडबाॅल का गल्र्स टीम नही थी। तभी नवादा प्रोजेक्ट स्कूल के आठवीं की छात्रा खुशबू का चयन हैंडबाॅल खिलाड़ी के रूप में किया गया था। खुशबू के नेतृत्व में बिहार टीम जीती। उसके बाद से खुशबू हैंडबाॅल में जुड़ गई। तब से खुशबू का शानदार प्रदर्शन रहा है।